"आओ हम सब गुलाम बने " भाग-4

            ब्रिटेन के द्वारा जो अर्थव्यवस्था भारत में लाई गई वह पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है साम्यवादी नहीं । जबकि भारत में जो अर्थव्यवस्था विकसित हुई थी, वह साम्यवाद का पोषण करती है पूंजीवाद का नहीं। इसलिए यहां वस्तुओं का निर्माण साझेदारी द्वारा होता था। व्यापार में प्रतिस्पर्धा नहीं था।

           भारत के साम्यवाद में आपके परिश्रम पर आपका पारिश्रमिक तय था पूंजीवाद की तरह परंतु परिश्रम करने का अवसर सबको एक जैसा प्राप्त था। अर्थात आप जिस क्षेत्र में भी चाहे उस क्षेत्र में परिश्रम कर सकते हैं यह आपकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर निर्भर करता था और परिश्रम करने का अवसर आप स्वयं ढूंढ सकते हैं । भारत की अर्थव्यवस्था में कोई बाध्यता नहीं था ।
           मतलब स्पष्ट है कि जंगल में रहने वाला एक डाकू परिश्रम करके ऋषित्व को प्राप्त कर एक महाकाव्य लिख सकता है। एक नास्तिक व्यक्ति अपने मंतव्य को दर्शनों के रूप में व्यक्त कर सकता है चार्वाक की तरह । जबकि यूरोप में बड़े-बड़े चिंतकों को जेलों में ठूंस दिया गया बाइबल से बाहर आप नहीं सोच सकते । इस देश में कर्ण को भी दुर्योधन राजा बना सकता है जिसके पूर्वज शासक नहीं थे। एक दासी पुत्र महामंत्री बन सकता है । और एक ऋषि के कहने पर चक्रवर्ती सम्राट पल भर में अपने राज्य का त्याग कर सकता है राजा हरिश्चंद्र।
            जंगल में मिला अनाथ बालक शिक्षा प्राप्त करके हस्तिनापुर का कुल गुरु बन सकता है कृपाचार्य और एक अनाथ बालिका कृपी को द्रोणाचार्य जो ब्राह्मण है अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर सकते हैं।
            भारत में शिक्षा और कला अर्थात् कारीगरी सीखने का सुअवसर सब को एक समान प्राप्त होता रहा इसमें कभी भी भेदभाव नहीं रहा । परंतु गुरु अपने योग्य शिष्य की परीक्षा अपने हिसाब से ले सकते थे और भारत में बहुत कठिन परीक्षाओं के बाद गुरुकुलों में उच्च शिक्षाओं के लिए बच्चों का प्रवेश होता रहा है कठिन परिश्रम, परीक्षाओं में जो बच्चे उत्तीर्ण हो जाते थे । उन्हीं को गुरु अपने ज्ञान के योग्य समझते थे। कई लोग एकलव्य के विषय में प्रश्न पूछ सकते हैं इस विषय में मैं अलग से एक लेख लिख चुका हूं आप वहां पढ़ ले तो उचित रहेगा । http://vaidicsuprabhat.blogspot.com/2022/02/4.html
         पुनः हम अपने विषय पर आते हैं हमारी बात अर्थव्यवस्था को लेकर चल रही थी।
         ब्रिटेन के द्वारा जो अर्थव्यवस्था भारत में लाई गई । उसने हमें एक चीज सिखा दिया । काम कोई भी करें उसमें लाभ होना चाहिए । वह लाभ किसी भी तरह से हो हिंसा करके, अनैतिकता से, भ्रष्टाचार से, प्रकृति का नाश करके हो किसी भी तरह से हो बस लाभ होना चाहिए।
         भारतीय अर्थव्यवस्था में भी लाभ की बात कही गई है परंतु यहां लाभ शब्द से पूर्व एक शब्द है शुभ मतलब कभी भी लाभ , शुभ होना चाहिए अर्थात "शुभ-लाभ" यह भारतीय अर्थव्यवस्था का मूल मंत्र है । दीपावली में अक्सर व्यापारी अपने दुकान के आगे इस प्रकार के पत्रक (पोस्टर) लगाते हैं और लक्ष्मी जी गणेश जी की पूजा करते हैं लक्ष्मी से तात्पर्य लाभ से है और गणेश का तात्पर्य शुभ से है। यहां शुभ का तात्पर्य नैतिकता से है, प्रकृति संरक्षण से है, शास्त्रों की नीतियों से है, धर्म से है, भारतीय सभ्यता- संस्कृति से है, मतलब आप हिंसा करके लाभ नहीं कमा सकते, भ्रष्टाचार करके लाभ नहीं कमा सकते, अनैतिक वस्तुओं को बेचकर लाभ नहीं कमा सकते। शास्त्र कहता है इस प्रकार के आमदनी करने से जो शुभ नहीं है उससे घर में कलह् उत्पन्न होगा, अशांति होगी, जीवन में दुख-कष्ट आएंगे, कुल में वर्णसंकर उत्पन्न होंगे । प्रकृति का दोहन होगा । जिसके लिए शास्त्र मना करता है।
             भारतीय अर्थव्यवस्था में कला संगीत गुण हुनर बेची नहीं जाती, विद्या का कोई मोल नहीं होता, भारतीय सभ्यता-संस्कृति में जिसके पास भी जो हुनर है वह उसे अपने स्वजातीय को वह कला, हुनर दे सकता है, सिखा सकता है । भारतीय सभ्यता-संस्कृति में यह मान्यता है कि इस प्रकार का जो कोई भी बौद्धिक गुण मनुष्य के पास है वह उसका अपना नहीं है। देवताओं द्वारा प्राप्त है, ईश्वर प्रदत्त है। ईश्वर से जो हमें प्राप्त है उसको अगली पीढ़ी में पहुंचा देना चाहिए यही हमारा धर्म है। और जो चीज ईश्वर से प्राप्त होती है उसका कोई मोल नहीं होता बस देने वाला गुरु इस बात का ध्यान रखे कि सामने वाला उसका द्रुपयोग न करें। सदुपयोग करें ।
            यही कारण है कि भारत में जमीन को बेचने की परंपरा नहीं थी। बीज नहीं बेचे जाते थे। पानी, दूध बेचने की चीज नहीं थी । गाय - कन्या आदि बिल्कुल नहीं।
              एक पिता अपने पुत्र को अपना गुण हुनर आसानी से दे सकता था।
            ब्रिटेन के द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून लाया गया। जमीन को खरीद-बेचने की परंपरा शुरू हुई। भारतीय जन मानस का पैसा भारत में ही घुमता रहा। बेचने वाले और खरीदने वाले दोनों से सरकार टैक्स (कर) लेना शुरू किया।  क्योंकि अंग्रेजों को पैसे की जरूरत थी उन्हें अपने कर्मचारियों को वेतन देना था हर महीना वो सारा पैसा ब्रिटेन गया सोना के रूप में, बैंक के माध्यम से। इस कानून के आने से पूर्व भारतीय जनता पैसा कमा तो रही थी पर जब सारी जरूरतें पुरी हो जाए तो उस पैसे का वो करे क्या ? बस एक ही रास्ता था सोना खरीदो और सोना इकट्ठा करो। परिणाम यह हुआ कि भारतवर्ष में पिछले कई हजार सालों से सोना इकट्ठा होता रहा और देश बहुत उच्च कोटि तक धनी देश बन गया। जो पूरी दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र बना। मंदिरों को खूब अधिक से अधिक दान मिला उन मंदिरों से बड़े-बड़े गुरुकुल का निःशुल्क संचालन हुआ। परिणाम यह हुआ कि भारत विद्या के प्रत्येक क्षेत्र में सिरमौर बना। प्रकृति का कोई भी ऐसा ज्ञान क्षेत्र नहीं बचा जिसमें भारतीय उच्च स्तर तक न पहुंचे हो । वह ज्ञान लौकिक हो या पारलौकिक। भारत में अभी भी बहुत ऐसी संरचनाएं खड़ी है जिसमें आधुनिक विज्ञान अपने आप को बौना महसूस करता है।
           इस प्रकार के संपूर्ण विकास का मूल केंद्र केवल भारतीय अर्थव्यवस्था का ही रहा। परंतु जब से अपने देश भारत में बैंक के साथ-साथ कुछ कानूनी व्यवस्था बरतानिया सरकार द्वारा लाई गई। तब से इस देश में कुछ भी ऐसा नहीं बजा जो बाजार में बिका न हो ।
           हमने जमीन बेचा,मकान बेचा, गाय बेचा, गाय का दूध बेचा, पानी बेचा, बीज बेचा, हुनर बेचा, हमने रिस्तों को भी बेच, बेटियों को बेचा, कुर्सी बेचा, पद बेचा, प्रमाण पत्रों को बेचा ।
          आरक्षण के नाम पर हमने अपने स्वाभिमान को भी बेचा।
         परंतु आप दुखी न हो हम 1947 में ही स्वतंत्र हो चुके हैं उनके द्वारा दी गई श्वेत पत्र पर आधारित बनाई गई संविधान का हम अक्षरस: पालन करेंगे। चाहे देश भाड़ में जाए।  चाहे हम खुद बिक क्यों न जाये।  सब कुछ बिकता ही क्यों न रहे। देश की प्राकृतिक संपदा पर कोई भी शासन क्यों न करें। हम उनकी बनाई हुई नीतियों का पूरा पालन करेंगे आप ध्यान देना
         चाहे  हमारे पूर्वजों ने देश की अस्मिता के लिए अपना सर ही क्यों न कटाया हो। परंतु हम आधुनिक है महात्मा जी सिखा के गये है सत्याग्रह करते रहेंगे और अपना सर झुकाते रहेंगे ।


       शेष क्रमश: आगे
         वैदिक सुप्रभात
          उत्तम प्रकाश
        9416044828
         

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