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"आओ हम सब गुलाम बने " भाग-4

​                ब्रिटेन के द्वारा जो अर्थव्यवस्था भारत में लाई गई वह पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है साम्यवादी नहीं । जबकि भारत में जो अर्थव्यवस्था विकसित हुई थी, वह साम्यवाद का पोषण करती है पूंजीवाद का नहीं। इसलिए यहां वस्तुओं का निर्माण साझेदारी द्वारा होता था। व्यापार में प्रतिस्पर्धा नहीं था।            भारत के साम्यवाद में आपके परिश्रम पर आपका पारिश्रमिक तय था पूंजीवाद की तरह परंतु परिश्रम करने का अवसर सबको एक जैसा प्राप्त था। अर्थात आप जिस क्षेत्र में भी चाहे उस क्षेत्र में परिश्रम कर सकते हैं यह आपकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर निर्भर करता था और परिश्रम करने का अवसर आप स्वयं ढूंढ सकते हैं । भारत की अर्थव्यवस्था में कोई बाध्यता नहीं था ।            मतलब स्पष्ट है कि जंगल में रहने वाला एक डाकू परिश्रम करके ऋषित्व को प्राप्त कर एक महाकाव्य लिख सकता है। एक नास्तिक व्यक्ति अपने मंतव्य को दर्शनों के रूप में व्यक्त कर सकता है चार्वाक की तरह । जबकि यूरोप में बड़े-बड़े चिंतकों को जेलों में ठूंस...

"आओ हम सब गुलाम बने" भाग-3

​                पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को बल देने के लिए बैंकों का निर्माण हो चुका था। अब इन बैंकों में पूजी का एकीकरण होने लगा। पूजी का प्रयोग कहां हो इसके लिए औद्योगिक क्रांति शुरू हुआ। औद्योगिक क्रांति के लिए पूंजी निवेश अनिवार्य है इस पूंजी निवेश के लिए पूजी प्राप्त हो सके इसलिए बैंकों को लाया गया भारत शुरू से ही उद्योग प्रधान देश रहा है। भारत का उद्योग पशुओं और मनुष्यों पर आधारित था लेकिन अब मशीनी कल कारखानों का प्रयोग करना था इसलिए पूजी चाहिए थी और भारत की मनुष्यों और पशुओं पर आधारित उद्योगों को बंद करना था इसलिए भारत में प्रचार किया गया कि भारत कृषि प्रधान देश है भारत में कृषि व्यवहारिक जीवन पद्धति है लोगों को इससे बाहर निकालकर उद्योगों में लगाना था इसलिए भारत को कृषि प्रधान देश कहना जरूरी था ताकि लोग धीरे-धीरे उद्योगों की ओर अग्रसर हो और ब्रिटेन से लाई गई उद्योग भारत में फल फूल सके। उद्योगों को संचालित करने के लिए जमीन की जरूरत थी इसलिए रानी का सरकार बनने के बाद, भारत में भूमि अधिग्रहण कानून बनाया गया। इंडियन फॉरेस्ट एक्ट, जंगल ...

आओ हम सब गुलाम बने भाग -2

​                बाहुबल का प्रयोग करके आप गुलाम बना सकते हैं परंतु वे मजबूत होकर अपनी स्वतंत्रता को पुनः प्राप्त कर सकते है। आप बहुत लंबे समय तक किसी को गुलाम नहीं बना सकते परंतु अगर सदा के लिए आप उन्हें गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं तो इसका सबसे सरल और आसान तरीका है । उनके व्यापार के केंद्र में प्रयोग किए जाने वाले विनिमय के संसाधन को ही अपने अधिकार में कर लें । ताकि उसका संपूर्ण व्यापारिक तंत्र आपके अधीन हो जाए । उसके व्यापार में प्रयोग किए जाने वाले संसाधन आपके द्वारा उत्पादित की जाए और आपसे लेकर वह अपना व्यापार चलाएं । अगर यह आपने कर लिया तो समझ लीजिए सदा सदा के लिए वें आपके गुलाम हो ही जाएंगे ।              अपने देश भारत में वस्तु विनिमय हेतु   सोने - चांदी के सिक्के का प्रयोग लंबे समय तक होता रहा । उन सोने - चांदी के सिक्के अलग-अलग रियासतों का अपना-अपना अलग-अलग होता था  जिसके मूल्य भी आपस में भिन्न होते थे।               चुकी देश को गुलाम बनाना था इसल...

लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy(भाग-1)

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  -:ओ३म्:-                           लोकतंत्र में राजतंत्र ( भाग-1 ) Monarchy in democracy                                 "जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन" लोकतंत्र की एक नई परिभाषा गढ़ी गई । एक के बाद एक विभिन्न अलग-अलग देशों पर ब्रिटेन ने अपना साम्राज्य धीरे-धीरे स्थापित करता गया । जब उन सभी देशों में क्रांति की लहर जगीे । उन्होंने स्वतंत्र होना चाहा तब ब्रिटेन, लोकतंत्र का हवाला देकर वहां के राजतंत्र को समाप्त किया और उन सभी देशों में धीरे-धीरे लोकतंत्र स्थापित किया ।  लोकतंत्र लाने के लिए राजतंत्र की अनेकों बुराइयां आम जनता के सामने परोसी गई । दूसरी ओर जनता खुद मालिक होना चाहती थी परिणाम यह हुआ क्रांतिकारी विचारधारा के लोग लोकतंत्र में नेता बनकर उभरे हालांकि वें सभी नेता अंग्रेजों द्वारा चलाए गए शिक्षा तंत्र से ही पढ़ कर निकले थे । अब आप सोच सकते हैं कि अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था से निकले हुए लोग देश को किस द...

शतरंज , Chess

स्वामी जी के दर्शन के लिए एक दिन केदारनाथ खत्री, गुरुसहायमल के साथ पाठशाला में पहुंचे।  स्वामी जी भांप गये, गुरुसहायमल से बोले इन्हें कह दो यहां शतरंज नहीं है ।           उत्साह से खत्री जी, मैं अभी लिये आता हुं। अब स्वामी जी क्या करते ? खत्री जी शतरंज लाए ।  स्वामी जी ने आठ प्रकार के भिन्न-भिन्न शतरंजों के विषय में बताया।           फिर नयनसुख ( एक नगर वासी रत्नाकार  जो स्वामी जी मिलने आता रहता था ) को निर्देश दिए - नयनसुख देखो तुम दो काम करना , जो मोहर मैं कहूं वह चलना और लाला (खत्री जी ) जो मोहर चलें वह मुझे बता देना।  नयनसुख - हां जी   स्वामी जी - अब बादशाह का प्यादा चलो।  नयनसुख, चल दिया, महाराज ।  स्वामी जी, लाला क्या चले हैं ?  नयनसुख, वह भी बादशाह का प्यादा ही चले हैं।                     इस प्रकार नयनसुख स्वामी जी के आदेशानुसार उनके मोहरे चलाते रहे। कुछ समय पश्चात् खेल समाप्ति पर था।  स्वामी जी ने कहा अब तक हम द...