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प्रेम

      रात्रि हो गई , अंधकार चतुर्दिक व्याप्त हो गया। वह कुआं जिसमें थंगल और मौलवी ने कत्ल कराके सैकड़ों हिन्दू फेंक दिए थे , मानो आकाश की ओर निहार रहा था। अंधकार बढ़ता गया , मध्य- रात्रि हो गई। जिस प्रकार बैठे-बैठे झपकियाँ लेने लगता है , उसी प्रकार कुएँ को खोलकर अंधकार भी मानों गहरी नींद में खर्राटे भरने लगा था । उसके पेट में भयंकर पाचन क्रिया जारी थी। उस कुएँ में पड़े हुए अनेक अर्धजीवित और मरणासन्न हिन्दुओं की आहें और कराहें , जो बीच-बीच में मुनाई पड़ रही थीं उस अन्धकार के पेट में होती हुई गड़गड़ाहट-सी प्रतीत होती थी !       वह कुआं , उसमें धकेली गई लाशों , धड़ों , धड़विहीन सिरों , टूटे हुए हाथों के टुकड़ों , मांसपिंडों से आकंठ भरा हुआ था। इस कुएं की एक दीवार में एक वृक्ष फूटकर निकला हुआ था । अतः अनेक हिन्दुओं के जो शव , मांस आदि के टुकड़े फेंके गए थे वे इसमें अटक गए थे और इसकी शाखाएँ भी झुक गई थीं। इसी की एक शाखा में एक कोमल-कंठ से निःसृत आवाज उस घायल हिन्दू को सुनाई पड़ी। वह कह रही थी ' भाई , तू कहाँ है ? मुझे भय लग रहा है , अपना हाथ पकड़ा द...

क्या बनें मालिक या नौकर - 6 ?

जब युद्ध तय हो गया तो 21 जून 1757 को सिराजउद्दौला फ़ौज लेकर हुगली के पूर्वी तट पर कीचड़ मिट्टी के साथ कई नालों को पार करता हुआ प्लासी पहुँच गया। नाला पार करते समय ही उसकी सेना के हालत पस्त हो गया था। उसकी फ़ौज में उसके दो विश्वासपात्र मीर मदन 5,000 घुड़सवार और मोहन 7,000 पैदल सेना लेकर चले। तीन विश्वासघाती सेनापति मीरजाफ़र व लुत्फ़ खान 15,000 घुड़सवार और रॉय दुर्लभ 30,000 पैदल सेना के साथ पहुँचे। एक फ़्रांसीसी जो इनकी ओर से लड़ रहा था तोपख़ाना लेकर पहुँचा।             दूसरी ओर कलकत्ता से क्लाइव 3,000 कुल सैनिक जिसमें 800 अंग्रेज़ और 2,200 हिंदुस्तानी सेना लेकर 200 नाव में रसद गोला बारूद लेकर चला। साथ में एडमिरल वाटसन 50 नेवी सिपाहियों के साथ ०ट से चला और 20 जून को कटवा के क़िले पर तैनात किलेदार को भगाकर क़ब्ज़ा कर लिया। कटवा से वह हुगली के पश्चिमी किनारे- किनारे 22 जून 1757 को उस जगह पहुँचा। सिराजूदौला के साथ 53 भारी तोप और क्लाइव के पास 8 हल्की तोप और 2 हेविट्जर थीं। दोनो सेनाएँ युद्ध के लिए तैयार थीं।         क्लाइव और मीर जाफ़र के बीच...