लोकतंत्र में राजतंत्र भाग-20 ("फूट डालो राज करो" भाग-4)
बहुत लोगों का यह आरोप होता है कि महाभारत काल में द्रोणाचार्य एकलव्य को केवल इसलिए उन्होंने अपना धनुर्विद्या नहीं सिखाया ताकि अर्जुन का कोई प्रतिद्वंदी खड़ा न हो सके। दूसरा एकलव्य स्वयं शूद्र जाति के थे और आचार्यद्रोण एकलव्य को शूद्र होने के कारण धनुर्विद्या नहीं सिखाए। हालांकि एकलव्य के नाम के पीछे कोई जाति सूचक शब्द नहीं है फिर भी वह शूद्र जाति के थे ऐसा लोग मानते हैं इसका आधार क्या है पता नहीं। जबकि दूसरी ओर एकलव्य स्वयं आचार्यद्रोण को अपना परिचय इस प्रकार दे रहें है " ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः । एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह ॥" "हे महाराज! उसके बाद निषादराज हिरण्यधनुष का पुत्र एकलव्य द्रोणाचार्य के पास आया।" ( महाभारत, आदिपर्व, सम्भवपर्व, १३२ / ३१) तत्कालीन समाज में वर्ण व्यवस्था थी। जाति व्यवस्था उस समय नहीं था खैर जो भी हो एक संस्कृति जब दूसरी संस्कृति पर हावी होती है तो वह सेंध मारने के लिए जरूर कोई न कोई उपाए ढूंढती है,...