लोकतंत्र में राजतंत्र भाग-20 ("फूट डालो राज करो" भाग-4)
बहुत लोगों का यह आरोप होता है कि महाभारत काल में द्रोणाचार्य एकलव्य को केवल इसलिए उन्होंने अपना धनुर्विद्या नहीं सिखाया ताकि अर्जुन का कोई प्रतिद्वंदी खड़ा न हो सके। दूसरा एकलव्य स्वयं शूद्र जाति के थे और आचार्यद्रोण एकलव्य को शूद्र होने के कारण धनुर्विद्या नहीं सिखाए। हालांकि एकलव्य के नाम के पीछे कोई जाति सूचक शब्द नहीं है फिर भी वह शूद्र जाति के थे ऐसा लोग मानते हैं इसका आधार क्या है पता नहीं । तत्कालीन समाज में वर्ण व्यवस्था थी । जाति व्यवस्था उस समय नहीं था
खैर जो भी हो एक संस्कृति जब दूसरी संस्कृति पर हावी होती है तो वह सेंध मारने के लिए जरूर कोई न कोई उपाए ढूंढती है, खोजती है, और किसी भी प्रकार से वह चाहती है कि हम उस पर हावी हो जाए इसके लिए वह तरह-तरह का उपाय ढूंढते है।
अब आइए उस समय के तत्कालीन परिस्थिति को वर्तमान से घटाकर देखते हैं कि आचार्यद्रोण कितने दोषी थे। कृपाचार्य हस्तिनापुर के कुल गुरु थे और उनकी बहन का विवाह द्रोणाचार्य से हुआ था ।
द्रोणाचार्य जी जिस गुरुकुल के संचालक थे । वह गुरुकुल हस्तिनापुर के अधीन था । हस्तिनापुर का संबंध मगध के राजा जरासंध से ठीक नहीं था । क्योंकि जरासंध उस समय का सबसे दुष्ट राजाओं में उसकी गिनती होती थी । इसलिए हस्तिनापुर के साथ जरासंध का संबंध ठीक नहीं था। जरासंध की दुश्मनी हस्तिनापुर के साथ-साथ मथुरा साम्राज्य से भी था । जरासंध की दोनों बेटियों का विवाह मथुरा के राजा कंस से हुआ था और कंस भगवान श्री कृष्ण द्वारा मारा जा चुका था। मतलब आपस में इनकी दुश्मनी थी ।
अब मैं आपसे पूछता हूं क्या भारत सरकार के रक्षा मंत्री को पाकिस्तान के लोगों को सैन्य ट्रेनिंग देनी चाहिए । कमेंट में जरूर बताएं ।
अगर द्रोणाचार्य दुश्मन राज्य के किसी व्यक्ति को धनुर्विद्या तत्कालीन समय में देंते तो क्या उस समय उनके ऊपर राजद्रोह का मुकदमा नहीं चलेगा ? । कमेंट में जरूर बताएं ।
दूसरी ओर आचार्य द्रोणाचार्य उस राज्य की प्रजा भी है और हस्तिनापुर राजकुल के संबंधी भी।
अब एक दूसरे उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं ।
बिहार यूनिवर्सिटी के साइंस फैकेल्टी का कोई कंप्यूटर साइंस का विद्यार्थी जो बिहार यूनिवर्सिटी में पढ़ता है । क्या वह विद्यार्थी सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर लैब में जाकर काम कर सकता है ? बिल्कुल नहीं । किसी भी विश्वविद्यालय का जो भी संसाधन है वह संसाधन उस विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के लिए ही है । अन्य किसी दूसरे विश्वविद्यालय का कोई विद्यार्थी अपने विश्वविद्यालय को छोड़कर किसी दूसरे विश्वविद्यालय में अगर कुछ अध्ययन- अध्यापन करना चाहता है तो इसके लिए यह उसका अपना कोर्स (पाठ्यक्रम) उसको अनुमति देगा । इंटर्नशिप पर जाने के लिए वह भी नियत समय के लिए 6 महीना या 3 महीना के लिए और उसे ऑफीशियली जाना पड़ेगा । वह भी तब जब इन दोनों यूनिवर्सिटी के कुलपति का आपस में कोई झगड़ा न हो तो ।
जिस प्रकार दिल्ली यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी दुनिया के कई कोने में जाते हैं इंटर्नशिप के रूप में । लेकिन यह तब जब वह आपस में मित्र राष्ट्र हो अन्यथा नहीं ।
अब आप मुझे यह बताएं कि द्रोणाचार्य किस नाते अपने गुरुकुल में दुश्मन राज्य के विद्यार्थी को धनुर्विद्या सिखाते ?
जबकि दूसरी ओर एकलव्य जरासंध की सेना में जरासंध के प्रतिबंधी राजाओं के प्रति पूरी जिंदगी युद्ध करता रहा । द्रोणाचार्य तब दषी माने जाते जब एकलव्य पांडव या कौरव के साथ युद्ध में भाग लेता ।
हमें पता है कि तत्कालीन समय में गुरु परशुराम से दानवीर कर्ण धनुर्विद्या प्राप्त किए । परशुराम जी किसी भी क्षत्रिय को अपना धनुर्विद्या सीखने को तैयार नहीं थे देवव्रत के बाद । कर्ण क्षत्रिय है यह बात तत्कालीन समय में केवल तीन ही लोगों को पता था उनकी जननी महारानी कुंती को, दूसरा भगवान श्री कृष्ण को और तीसरा भीष्म पितामह को । अगर उस समय जातिगत भेदभाव देखकर विद्या देने की प्रथा होती तो भगवान परशुराम कर्ण को कभी भी धनुर्विद्या नहीं सिखाते और जब स्वभाव से उन्हें यह अनुभव हुआ कि कर्ण जरुर किसी क्षत्रिय कुल से है तो उसी समय तत्काल ही उन्होंने उन्हें श्राप दे दिया । तुमने मुझसे छल पूर्वक विद्या प्राप्त किया है । जब तुम्हें इस विद्या की सबसे नितांत आवश्यकता होगा तब यह तुम्हारे काम नहीं आएगी । कर्ण की मां राधा कोई क्षत्रिय कुल की महारानी नहीं थी ।
जातिगत भेदभाव अगर तत्कालीन समाज में होता । तो संदीपनी मुनि के आश्रम में कृष्ण और सुदामा एक साथ विद्या अध्ययन नहीं करते ।
एक दासी पुत्र को हस्तिनापुर राजकुल में महामंत्री का पद प्राप्त नहीं होता । वह उनके बुद्धि और कौशल का ही प्रताप था कि वे उस कुल में महामंत्री पद को सुशोभित कर रहे थे । उनके ही कथन के कारण पांचो ज्ञान इंद्रियों में अक्षम होने पर महाराज धृतराष्ट्र को राजगद्दी प्राप्त न हो सका उनके छोटे भाई पांडु को राजा बनाया गया ।
जब पांडवों से ईर्ष्या बस दुर्योधन महावीर कर्ण को अंगदेश का राजा बनाता है । तो ऐसा करने पर दुर्योधन का विरोध कोई नहीं करता है अर्थात किसी भी अन्यत्र जो राजा बनने योग्य है उसे उस समाज में राजा बनाया जा सकता था ।
उस समाज में अगर जातिगत भेदभाव होता तो भगवान श्री कृष्ण भोजन के लिए जब दुर्योधन उन्हें निमंत्रण देते है तो भगवान श्रीकृष्ण उनके निमंत्रण का त्याग करके महात्मा विदुर के घर जाकर साग रोटी खाते हैं ।
एक दिन अचानक ही महाराज शांतनु को जंगल में दो नवजात शिशु प्राप्त होते हैं । जिनका नाम कृप और कृपी रखा गया । जिनका गोत्र और कुल का नाम किसी को पता नहीं था यही कृप बाद में कृपाचार्य बनते हैं और वह हस्तिनापुर राजकुल के राजगुरु बनते हैं । मतलब स्पष्ट है कि कृपाचार्य उस राजकुल के राजगुरु तब बने होंगे जब उसके पास वह योग्यता रही होगी और उनके पूर्व के राजगुरु उन्हें राजगुरु के पद सौंपे होंगे । और इस पर किसी की कोई आपत्ति नहीं रही होगी ।
आज का तत्कालीन समाज न जाने किन भावनाओं से ग्रसित है कि वह द्रोणाचार्य पर यह दोष लगाते हैं कि एकलव्य को उन्होंने ज्ञान नहीं दिया और बदले में अंगुठा भी कटवा लिए दक्षिणा के रूप में जबकि द्रोणाचार्य अंगुठा कटवाने के बाद बिन अंगुठा के कैसे धनुष चलाया जाए यह एकलव्य को सिखाए ।
इन सभी उदाहरणों से मतलब स्पष्ट है कि उस समय तत्कालीन समाज में किसी भी प्रकार का कोई जातिगत भेदभाव नहीं होता था ।
शेष क्रमशः आगे
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9460 44 828
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