लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy (भाग-10)

   -:ओ३म्:-
लोकतंत्र में राजतंत्र भाग-10


                          भारत के  तत्कालीन संपूर्ण रियासतों को लोकतंत्र का हवाला देते हुए 1947 में प्रशस्ति पत्र बांट कर पूंजीवादी भारतीयों के लिए एक नये गणराज्य का स्वरूप  बना भारत ।  
                        15 अगस्त 1947 के बाद का भारत रियासत कालीन भारत नहीं था । अब यह भारत नेताओं का था । जिन्हें देश को अब गति देनी थी और प्रगति के मार्ग पर ले जाना था । अब इस भारत में प्रगति का मार्ग वह नहीं था जो रियासत कालीन था । विकास की नई परिभाषा गढ़ी गयी । विकास मतलब सड़क ,बिजली ,चिकित्सालय और स्कूल । मतलब हर गांव, हर शहर में यह होना ही चाहिए ।  अगर यह है तो वह क्षेत्र विकसित है अन्यथा नहीं । 
                        यहां स्कूल का मतलब गुरुकुल से नहीं था । स्कूल का सीधा मतलब मैकाले द्वारा लाई गई शिक्षा व्यवस्था को अधिक से अधिक विस्तृत करना और धीरे-धीरे भारतीयों को अंग्रेजों के अनुकूल बनाना था । भारतीय जनमानस की अपनी जो कला ,संस्कृति ,भौगोलिक तकनीकी ,पशुओं पर आधारित उद्योग की पैतृक समझ एवं ज्ञान में बाधा उत्पन्न करके, कंपनी, अंग्रेजी सभ्यता-संस्कृति को धीरे-धीरे भारतीय जनमानस में उतारना था । जिसमें डिग्री का बहुत ज्यादा महत्व था और इन्हीं स्कूल, विद्यालयों से प्राप्त डिग्रियों के आधार पर नौकरी देने की व्यवस्था की गई । इन स्कूल एवं विद्यालयों में जो पढ़ाई गई वह आपके एवं आपके भौगोलिक परिस्थिति के कितना अनुकूल है इससे इस शिक्षा व्यवस्था को कोई मतलब नहीं था । 
                         भौगोलिक दृष्टिकोण से भारतवासी बहुत ही धनी रहे हैं । यहां 6 रस, 6 ऋतु, वर्ष में चार प्रकार के फसल, ऋतु अनुकूल सामग्री, भोज्य पदार्थ, सालों भर सूर्य का प्रकाश,  कृषि कार्य करने हेतु पालतू पशु इस देश में पर्याप्त रहे हैं । देश के किसी भी कोने में चले जाएं । देश के हर हिस्से में जमीन पर भरपूर औषध का स्वतः ऊपज होता ही रहता है । जहां आयुर्वेद का बहुत अधिक विकास हुआ है उस देश में जबरन यूरोप से मेडिकल साइंस लाया गया । और भारतीय परंपरागत् पैतृक चिकित्सीय ज्ञान जो आयुर्वेद था । उसे डिग्रियों में बांधकर उस ज्ञान में बाधा उत्पन्न किया गया ताकि वह ज्ञान लुप्त हो जाए । डिग्रियों में बंधी हुई यूरोपीय मेडिकल साइंस को बहुत अधिक सरकारी फंड प्रतिवर्ष दिया गया ताकी उसका विकास होता रहें पर आयुर्वेद डिग्रियों में बंध कर संकुचित हो कर रह गया। इसको तो फंड भी कम प्राप्त हुआ दूसरा पैतृक ज्ञान में बाधा उत्पन्न होने से यह धीरे-धीरे भारतीय जनमानस के दिल-दिमाग से दूर भी होता चला गया । आयुर्वेद में सबसे बड़ा लाभ यह था कि भारतीय जनमानस को उसका ज्ञान प्राप्त होने पर औषध वह खुद से बना कर अपना इलाज कर सकते थे । पर यूरोपियन मेडिकल साइंस एमबीबीएस में आप किसी भी समस्या हेतु दवा के लिए विदेशी कंपनियों पर अर्थात् बाजार पर निर्भर है । जिससे उनकी आमदनी का एक अच्छा स्रोत बनता है । अगर आपके पास चिकित्सा हेतु ₹10 लाख रुपया है । तो कौन सी बीमारी है केवल इसको पता करने में आपका ₹5 लाख खत्म हो जाएगा । 
                        अब मैं यहां मेडिकल साइंस का एक बहुत बड़ा फ्रॉड आप लोगों से बताना चाहता हूं । हमारा अपना शरीर बाहर से विभिन्न प्रकार की साग-सब्जियों, दाल-चावल आदि विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों को खा कर । शरीर से ही शरीर को बनाने की प्रक्रिया इसके अंदर है । अर्थात् रिप्लिकेशन, ट्रांसक्रिप्शन एवं ट्रांसलेशन की प्रक्रिया मानव शरीर में स्वतः है । जिसके कारण एक छोटा बच्चा 1 फुट से 6 फुट का हो जाता है । मतलब यह प्रोटीन लेकर उसको एमिनो एसिड में परिवर्तित करके पुनः उसी एमिनो एसिड से अपनी आवश्यकता के हिसाब से यह प्रोटीन बना लेता है । कार्बोहाइड्रेट्स लेकर उसको अलग-अलग सुगरस् में तोड़ कर के अपनी जरूरत के हिसाब से वह ओलिगो या पोली सेकेराईटस् बना लेता है । तो क्या यह रो मटेरियल को ले करके अपनी आवश्यकता के हिसाब से दवा खुद नहीं बना सकता । तो बाहर से दवा बनाकर शरीर में पहुंचाने की क्या जरूरत है ? आयुर्वेद में विभिन्न अलग-अलग प्रकार की प्राकृतिक औषधि को उचित मात्रा में रो मटेरियल के रूप में हम अपने शरीर को देते हैं । शरीर उस रो मेटेरियल को प्राप्त करके ही अपनी आवश्यकता के हिसाब से दवा बना लेती है और यह संपूर्ण औषधि स्वतः जमीन पर उग जाता है। यह इलाज कितना सरल और आसान था । परंतु इस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने अपने उद्योगों को बहुत ज्यादा आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने यूरोपियन मेडिकल साइंस को बहुत ज्यादा आगे बढ़ाया और आयुर्वेदिक ज्ञान को दिन प्रतिदिन ध्वस्त किया । 
                       मतलब एक ही था पूजीवादी व्यवस्था को बल मिले । हम आधुनिक विकास के पथिक इस बात को समझ नहीं पाए ।
                      भारतीय प्राचीन जीवन शैली में बिजली का कोई ज्यादा महत्व नहीं था । परंतु धीरे-धीरे हम बिजली से संबंधित चीजों पर निर्भर होते चले गए । पूजीवादी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना था इसके लिए उन्होंने बिजली को धीरे-धीरे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का आधार बनाया । परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे गांवीये लघु-उद्योग जो पशुओं पर आधारित थे समाप्त होते चले गए । अब आज हमारा व्यक्तिगत जीवन शैली बिजली पर निर्भर हो चुकी है । प्रारंभ में यह बिजली भारत सरकार बना कर आम जनता एवं कंपनियों को दे ती थी जो सस्ता होता था । पर जब हम उसके आदि हो गए । तो अब प्राइवेट कंपनियां बिजली उत्पादन कर रही हैं और अपने स्वयं के बिजली का खर्च भी उन्हीं लोगों से बिजली बेचकर पूरा कर लेती है । यह कंपनियां बिजली बनाती है ईख के खुज्जे एवं प्वालादि से । जबकि इन्हीं चीजों का प्रयोग करके प्रत्येक गांव में व्यक्तिगत बिजली  बनाई जा सकती थी एवं गाय के गोबर से भी हम बिजली बना सकते थे । पर इस प्रकार की तकनीकी को इस देश में बल नहीं दिया गया परंतु कंपनी को बिजली मिल सके हमेशा । इसके लिए व्यवस्था की गई अर्थात पूंजीवादी अर्थव्यवथा को ही बल दिया गया । 
                     गांव-गांव में सड़क बनाए गए ताकि गांव का विकास हो सके । पर हुआ उल्टा जैसे-जैसे गांव में सड़कों का विकास हुआ उतना ही गांव से रो मेटेरियल कंपनी में पहुंचता रहा । और बाजार से कचरा माल अर्थात् जो हमारे जीवन शैली का भाग नहीं था वह भी हमारे जीवन में प्रवेश करता गया । शहरों की फालतू चीजें जिसका कोई काम नहीं था हमारे अपने जीवन में, जैसे:- फ्रीज, कुलर, टीवी, वस्त्र प्रक्षालक यत्र (वाशिंग-मशीन) आदि यह सब कुछ हमारे घर में जगह लेने लगे । पूंजीवादी अर्थव्यवस्था बढ़ने के कारण धीरे-धीरे गांव से लोग निकलकर शहरों के किनारे बसने लगे और शहरी जीवन-शैली में अपने आपको ढा़लना प्रारंभ किया । भला ऐसा हो क्यों न जब शिक्षा ही अंग्रेजी व्यवस्था की है तो जीवन-शैली भी अंग्रेजी व्यवस्था की ही होनी चाहिए ।
                         आप ध्यान रखें इन सभी प्रकार के विकासों के लिए आम जनता से ही टैक्स लिए गए थे । परंतु लाभ केवल पूंजीवादी व्यवस्था को ही प्राप्त हो पाया । आम जनता का अपना लघु-उद्योग तो समाप्त ही करना पडा़ । धीरे-धीरे आम जनता को इन कंपनियों का गुलाम ही बनना पड़ा । 
                            मतलब यह है कि अगर हम 1947 से पहले गुलाम थे । तो हम स्वतंत्र अब भी नहीं हो पाए और अगर 1947 से पहले हम स्वतंत्र थे । तो अब एक बहुत अच्छी गुलामी आने वाली है । क्योंकि वर्तमान पीढ़ी अपने सनातन धर्म से दूर होती जा रही है जो "अपने धर्म  का त्याग कर देता है, उनका गुलाम होना तय है "। 
                      भारत सरकार अब किसी प्रकार का कोई भी विभाग अपने हाथ में नहीं लेना चाहती । ये सारे विभाग बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने हाथ में ले रही है । तब  हम स्वतः इन कंपनियों के गुलाम हो जाएंगे है । क्योंकि सरकारों को चलाने के लिए तो हम वोट देते हैं और हम उनकी कुर्सी भी छीन सकते हैं पर इन कंपनियों को न हम वोट देते हैं और न ही इन से हम कुछ छीन सकते हैं ।
                          अब एक सबसे मजेदार बात । हम भारत सरकार को शिक्षा, चिकित्सा, न्याय एवं सुरक्षा के लिए पूरी जिंदगी टैक्स देते हैं । पर हमारे बच्चे पढ़ते हैं प्राइवेट में, उनकी चिकित्सा हम करवाते हैं प्राइवेट में, न्याय के लिए हमें प्राइवेट वकिल हायर करना पड़ता है और सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है । दूसरी ओर शिक्षा पा लेने के बाद हमारे विद्यार्थी कार्य करते है प्राइवेट कंपनियों के लिए । अंततः मां-बाप को वृधाश्रम में ही जाना है ।  अब इससे भी अच्छी कोई गुलामी हो सकती हैं ? 

                                                                                                                                   शेष क्रमशः- आगे 

उत्तम प्रकाश
 वैदिक सुप्रभात 
94 16044 828

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