लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy (भाग-2)
-:ओ३म्:-
लोकतंत्र में राजतंत्र (भाग-2)
1498 में समुद्री लुटेरा वास्को डी गामा भारत में आया । तब का भारत आज के भारत से बहुत बड़ा था । बहुत लंबे समय के अथक प्रयास के बाद 1857 में रानी का सरकार भारतवर्ष में प्रारंभ हुआ। इसके लिए उन्होंने मुगलों को आपस में लडा़या 1657 में शाहजहां के चारों पुत्र आपस में लड़े जिसमें कुछ भारतीय शासक भी भाग लिए परिणाम यह हुआ कि वे आपस में लड़कर ही कमजोर हो गए मतलब अंग्रेजों की नीति "फूट डालो और राज करो" । पूरा होता दिख रहा था लगभग 100 वर्षों तक यह क्रम चलता रहा । 100 वर्ष के बाद 1757 में रॉबर्ट क्लाइव बंगाल का शासक बना । 1857 अर्थात् ठीक 100 वर्ष के बाद कंपनी सरकार हटी और रानी का सरकार इस देश में बना । 1857 के युद्ध के बाद जो 3 बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीज् बनाई गई उनमें से पढ़ के निकल कर आने वाले विद्यार्थियों के लिए इंडियन कांग्रेस की स्थापना 1885 में एक अंग्रेज द्वारा की गयी । हमें सामान्य रूप से पता है कि 25 वर्ष में एक पीढ़ी पढ़ कर तैयार हो जाती है । यूनिवर्सिटी से निकल कर के आए हुए बच्चों के लिए ही यह कांग्रेस की स्थापना की गई थी । 1957 में स्वत: ही ब्रिटिश सरकार भारत को अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था से निकल कर के आए हुए बच्चों को भारतवर्ष सौप कर चले जाते । सुभाष चंद्र वोस,नौसैनिक विद्रोह, स्वदेशी आंदोलन एवं विश्वयुद्ध आदि कई कारणों के कारण 10 वर्ष पहले अर्थात् 1947 में इस देश को छोड़कर अंग्रेजों को जाना पड़ा । ससे पहले कंपनी की सरकार यहां चलती थी जो ब्रिटेन से 20-20 वर्ष के चार्टर लेकर आती थी । शासन करने के लिए तथा यहां से लूटी गई सारी संपत्ति का बंटवारा ब्रिटेन में होता था । जब अंग्रेज इस देश में आए थे उस समय मुगलों का शासन चलता था । मुगलो को समाप्त करके अपनेवर्चस्व को जमाना जरूरी था
अब एक बात हमें समझ में आ जाना चाहिए । 100-100 वर्ष का अंतर यह क्या है । प्रथम 100 वर्ष उन्होंने भारतवर्ष को समझने में लगाया । आगे का 100 वर्ष भारतीयों या मुगलों को आपस में लड़ाने में लगाया । फिर बाद का 100 वर्ष कंपनी सरकार को दिया और उसके बाद का 100 वर्ष ब्रिटिश सरकार ने अपने हाथ लिया । अर्थात् 1657, 1757 , 1857 और 1947 ।
ब्रिटिश सरकार अर्थात् रानी का सरकार जब इस देश में प्रारंभ हुआ । तब भारत की संपूर्ण प्राकृतिक संपत्ति सरकारी घोषित कर दी गई । जिस संपूर्ण प्राकृतिक संपत्ति पर भारत के आम जनता का एकाधिकार होता था । जिसे राजा भी अपना नहीं कह सकता था । आम जनता उससे अपना पैतृक व्यापार चलाती थी एवं प्राप्त धन से सोना अपने यहां इकट्ठा करती थी । कहा गया की अब संपूर्ण प्राकृतिक संपत्ति भारत सरकार की संपत्ति है । उस समय भारत में सरकार किसका था ? ब्रिटिश का अर्थात् ब्रिटिश का है । अब उस संपूर्ण सरकारी संपत्ति को यहां से धीरे-धीरे करके ब्रिटेन ले जाना था । इसके लिए विभिन्न अलग-अलग प्रकार के विभाग बनाए गए । जिसमें ब्रिटिश अधिकारियों की बहाली की गई जिनको विभिन्न प्रकार के अलग-अलग सुविधाएं दी गई । नीचे के पदों पर भारतीयों को भी भर्ती किया गया । भर्ती के लिए अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लाई गई । दमाद की तरह सारी सुविधाएं सरकारी अफसरों को दी गई ताकि वह आराम से लूटी गई संपत्ति को ब्रिटेन पहुंचा सके । सरकारी अफसरों को तनख्वाह के रूप में भारत की आम जनता से वसूले गए टैक्स के पैसों से दिया गया । सारे टैक्स के पैसा भी ब्रिटेन गए ।
अब यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है । ब्रिटिश सरकार द्वारा जो व्यवस्था इस देश में लाई गई उस व्यवस्था में पिछले 90 वर्षों से हम जी रहे थे अर्थात नई जो भी पीढी़ थी । वह अंग्रेजी व्यवस्था में ही पैदा ली थी । 1947 के बाद भारतवर्ष को जो व्यवस्था मिलना था उस व्यवस्था के संचालक भी अंग्रेजी व्यवस्था से ही पढ़ कर आए थे । अर्थात् उस समय सभी बैरिस्टर ही थे चाहे वह महात्मा गांधी हो ,जवाहरलाल नेहरू ,वल्लभभाई पटेल हो या राजेंद्र बाबु । मतलब यह है कि अंग्रेज जो चाहते थे अब भविष्य में वही होना था । क्योंकि उनकी शिक्षा व्यवस्था से ही निकल कर आए हुए लोग अब स्वतंत्र भारत के संचालक बनने वाले थे ।
आजादी के बाद का भारत वर्ण- व्यवस्था या आश्रम व्यवस्था का पोषक नहीं बना । जनरल, ओबीसी, एससी, एसटी आदि अलग-अलग वर्गों में भारतीय जनता को बांट दिया गया। इसके लिए उन्हें प्रमाण पत्र एवं आरक्षण की व्यवस्था की गई । ताकि वें इन कागज के टुकड़ों और सरकारी सुविधाओं में फंसे रहे । आज की नई पीढ़ी का यह कहना है की मनुस्मृति ने हमें बांट रखा है । जबकि मनुस्मृति किसी को भी किसी प्रकार का कोई प्रमाण पत्र या सर्टिफिकेट नहीं देता मनुस्मृति में कहीं भी आप पासवान , कानू , बरई आदि शब्द खोज कर दिखा दे । उस जमाने में किसी भी नागरिक के नाम के पीछे कोई जाति सूचक शब्द नहीं लगते थे जैसे युधिष्ठिर, अर्जुन, राम, कृष्णा आदी के नाम के पीछे । खैर इस विषय पर हम अलग से एक लेख लिखेंगे ।
2047 के बाद भारतवर्ष का पूर्ण ईसाईकरण ब्रिटिश का अपना अंतिम लक्ष्य भारतवर्ष को बदलने के लिए है । क्योंकि नई पीढ़ी उनकी भाषा, रहन-सहन, खानपान, बोली-विचार,औषध एवं उनकी जीवन पद्धति अपना चुकी है । एवं भारत के हर कोने में बहुत तेजी से ईसाइयों की संख्या बढ़ रही है । इसी देश में पढ़े लिखे भारतीयों के द्वारा ही अब यह कहा जा रहा है कि आर्य यहां के मूल निवासी नहीं है। भारत की कोई भी हिंदूवादी सरकार कुछ भी नहीं कर पाएगी क्योंकि वह शर्तो पर चलती है नीचे पढ़ें ।
अब यहाँ गौर से समझने की कोशिश करें ।
एक देश का दूसरे देश के साथ व्यापार के लिए नोट का चलन प्रारंभ हो चुका था । अशर्फि अर्थात् सोने का चलन बंद हो गया था।
विश्व बैंक का गठन हो गय था। देश के आजादी के बाद भारत में पंचवर्षीय योजना हर 5 वर्ष पर चलना था। इसके लिए भारत जब चाहे तब विश्व बैंक से कर्ज ले सकता था । वह कर्ज विश्व बैंक अपने अनुसार सोना अपने पास रखकर, सलिना ब्याज लेकर एवं विभिन्न शर्तों पर कर्ज भारत सरकार को दे सकता था। हमें पता है केंद्र की या राज्य की कोई भी सरकार हो जम्मू कश्मीर को छोड़कर 5 वर्ष के लिए बनती है । हर नई पार्टी यह चाहती है कि मेरी सरकार केंद्र में बने । इसके लिए विकाश का लोभ दिखाकर जनता से उसको वोट लेना होता है । विकास कैसे करें क्योंकि टैक्स का पैसा तो तनख्वाह बांटने में , पेंसन एवं योजनाओं को चलाने में ही खर्च हो जाता है । एक्स्ट्रा विकास के लिए कर्ज लेना अनिवार्य है ।
मतलब यह है कि लोकतंत्र आया ही था इसलिए जिसमें लोकतंत्र वाली हर सरकार विकास के नाम पर कर्ज ले और वह कर्ज विश्व बैंक के शर्तों पर हो अर्थात् लोकतंत्र में विश्व बैंक के शर्तों के आधार पर सरकारें चलाई जाए । मतलब गुलामी का नया मार्ग ।
आखिर क्या कारण है कि भारत में
1. गोवंश का वध रुकता नहीं है ?
2. किसानों की समस्या सुलझती नहीं है ?
3. बेरोजगारी दर कम नहीं होती है ?
4. देश में अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था समाप्त नहीं होती है ?
5. गली-गली में चर्च ,ईसाइयों की संख्या बढ़ रही है ।
6. मांसाहार एवं शराब का प्रयोग बहुत ही तेजी से इस देश में बढ़ रहा है ।
7. आयुर्वेदिक चिकित्सा व्यवस्था से लोग दूर जा रहे हैं ।
8. भारतीय मुद्रा का वैल्यू दिन-प्रतिदिन अंतरराष्ट्रीय मार्केट में गिर रहा है जबकि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था उतनी
अच्छी भी नहीं है फिर भी उसके पाउंड का वैल्यू कभी भी गिरता नहीं है आखिर क्यों ?
9. हम, साल में दो बार हर नई पीढ़ी को यह बताते हैं कि हम अंग्रेजों के गुलाम थे । स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र
दिवस मना कर । मतलब यह है कि जूता भी हमारा और सर भी हमारा ।
कहीं न कहीं इसके पीछे ब्रिटिश द्वारा लाई गई गुलामी की व्यवस्था ही है ।
अब मैं आप लोगों से यह पूछना चाहता हूं क्या इस व्यवस्था में लोकतंत्र की वह परिभाषा जो आपको पढा़या गया था वह दिखाई दे रही है जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन । हां यह जरूर दिख रहा है ब्रिटिश का, भारतीयों के लिए, भारतीय ब्रिटिश द्वारा शासन जिसमें भारतीयों का कुछ भी नहीं है ।
शेष आगे क्रमशः-
उत्तम प्रकाश
वैदिक सुप्रभात
9416044 828

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