लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy (भाग -3)

                                                               -:ओ३म्:-

                लोकतंत्र में राजतंत्र (भाग -3)



                   अपने देश भारत को गुलाम बनाना इतना आसान नहीं था । इसलिए अंग्रेजों ने भारत वर्ष को गुलाम बनाने के लिए 500 साल की रणनीति बनाई । प्रथम 100 वर्ष में तो भारतवर्ष की भारतीयता को समझने की कोशिश की । अगले 100 वर्ष में भारतीय राजाओं का मुगल राजाओं से, मुगल राजाओं का भारतीय राजाओं से, आपस में एक दूसरे के बीच लड़ा कर उनको विध्वंस कराया । उसके बाद रॉबर्ट क्लाइव बंगाल का शासक बना तब बहुत तेजी से भारत वर्ष में कंपनी सरकार फैलने लगा और रानी का सरकार सही सलामत चल सके इसके लिए पृष्ठभूमि तैयार की तथा नशाखोरी के गर्त में भारतीय समाज को धकेलना प्रारंभ किया । कंपनी सरकार के बाद 1857 से रानी का सरकार इस देश में बना । रानी का सरकार इस देश में 90 वर्षों तक चला जिसने भविष्य के लिए बहुत अच्छी पृष्ठभूमि तैयार की । 

                   1857 के बाद इंडियन एजुकेशन एक्ट बना इस एक्ट के तहत भारत में चल रही परंपरागत गुरुकुलों को समाप्त किया गया। गुरुकुलों के समाप्त हो जाने के बाद ब्राह्मण बहुत बुरी तरह से पिट गए । उनके जीवन यापन एवं अध्ययन-अध्यापन का मार्ग अवरुद्ध हो गया । जो की दान पर आधारित गुरुकुलों पर टिका हुआ था । परिणाम स्वरूप ब्राह्मण बेरोजगार हो गए । बेरोजगार ब्राह्मण भ्रष्ट हो गए उनके पास अब एक ही मार्ग बचा अंग्रेजी व्यवस्था के अंतर्गत पढ़ाई करना और सरकारी नौकरी को प्राप्त करना । जो नौकरी नहीं ले पाते थे उन्होंने पूजा-पाठ को ही रोजगार का मार्ग समझा एवं पूजा-पाठ में विभिन्न प्रकार की आय के स्रोत उन्होंने ढूंढना शुरू किया परिणाम स्वरूप पूजा-पाठ भारतीय जनता के लिए धर्म पालन में रुकावट एवं अंधविश्वास का कारण बना । अंग्रेजी व्यवस्था ने पढ़ने वाले तेज विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था की।  छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले भारतीय ब्राह्मण या तेज विद्यार्थी पुनः अंग्रेजी व्यवस्था को भारत में अच्छी तरह लागू हो सके इसके लिए वह प्रेरित हुए और लोगों को प्रेरित किये । 

                    इसके पहले अंग्रेजों ने क्षत्रियों को विध्वंस कर दिया था । अब बचे वैश्य समाज जो व्यापार में लगे हुए थे । उनके व्यापार का मूल स्रोत पशुधन एवं प्रकृतिक संम्पत्ति  थी । भारत की संपुर्ण प्रकृतिक संम्पदा तो सरकारी हो ही गयी थी। जिसके कारण रोजगार ठप होने ही लगा था । भारत में पशुधन को समाप्त करने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर बूचड़खाने एवं बैलों को काटने के लिए अलग से बूचड़खाने खोले गए । जिसमें पशुओं का कत्लेआम बहुत तेजी से हुआ परिणाम स्वरूप भारत का व्यापारी वर्ग धीरे-धीरे टूटता गया दूसरी ओर अधिक से अधिक कर लगाकर वैश्य समाज को समाप्त किया गया । 

                         अब चौथा वर्ग शुद्र समाज । शुद्र समाज के लोग सेवक हुआ करते थे । जो तीनों वर्गों के लोगों की सेवा करते थे और सेवा भी बहुत ईमानदारी से । लेकिन उनके प्रति अन्य वर्णों में छुआछूत की भावना बहुत तेजी से फैलाई गई अंग्रेजी व्यवस्था से पढ़ कर आए ब्राह्मणों के दिल में छुआछूत की भावना बहुत तेजी से डाली गई ताकि वह इन शुद्र समाज से दूर रहें । अब अंग्रेजी व्यवस्था से आए हुए ब्राह्मण समाज के मन में छुआछूत की भावना बहुत तेजी से फैली, बाद में वह शुद्र समाज के दिल में घर कर गई अंग्रेजों ने इसका खूब मजाक उड़ाया । 

                      परिणाम यह हुआ कि आश्रम व्यवस्था ,वर्ण व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई ।  देश के आजादी के बाद माउंटबेटन यहीं थे । हमारे संविधान में एससी, एसटी, जर्नल, ओबीसी आदि अलग अलग प्रकार की जातिगत व्यवस्था को जन्म दिया गया एवं अलग-अलग वर्गों को प्रमाण पत्र बांटे गए परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मण हमेशा ही ब्राह्मण ही रहेगा और जो शुद्र है वह हमेशा शुद्र ही रहेगा । इसके लिए भारत सरकार ने प्रमाण पत्र देना प्रारंभ किया । यह प्रमाण पत्र प्रभावशाली बने इसके लिए उन्होंने आरक्षण की व्यवस्था की इस व्यवस्था ने भारतीय समाज को तोड़ने में आग में घी के समान काम किया । 

                                                                                                                            शेष  क्रमश:- आगे         उत्तम प्रकाश

वैदिक सुप्रभात 

9416044828

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