लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy भाग -5

-:ओ३म्:-
 लोकतंत्र में राजतंत्र ( भाग-5 )
         Monarchy in democracy



( इस लेख को पढ़ने से पहले आपसे निवेदन है कि  पीछे के  भाग 1 से भाग 4 तक पढ़ ले । ताकि विषय वस्तु आपको समझ में आ सके । अगर आपको उपलब्ध न हुआ हो तो आप अपना नंबर दे मैं आपको सेंड कर दूंगा । )
                1857 के युद्ध के बाद रानी का सरकार अपने देश भारत में आया । भारत की संपूर्ण प्राकृतिक संपत्तियों को लूट कर ब्रिटेन ले जाना था । इसके लिए उन्होंने विभिन्न प्रकार के विभाग बनाएं । भारत के विभिन्न इलाकों से रो मेटेरियल, कच्चा माल को इकट्ठा करने के लिए , रेल का विस्तार अनिवार्य था । भारतीय रेल का आरंभ 1853 में हो चुका था । रेल के विस्तार हेतु एवं विभिन्न अलग-अलग प्रकार के विभागों के संचालन हेतु ब्रिटेन सरकार को जमीन की जरूरत थी । परिणाम स्वरूप भूमि अधिग्रहण कानून को और ज्यादा मजबूती के साथ पूरे भारतवर्ष में लागू किया गया । अब अपने देश भारत में धीरे-धीरे जमीन को खरीदने बेचने की परंपरा शुरू हुई । बहुत अधिक लगान, कृषि संबंधी उदासीनता, आधुनिक तकनीकी, पशु धन के अभाव , लोन के बोझ के कारण भारत के हिंदू समुदाय धीरे-धीरे जमीनों को बेचकर शहरों की ओर पलायन करने लगी एवं नौकरी पाने हेतु आधुनिक एजुकेशन सिस्टम में आने के लिए जमीनों का बेचना इस देश में प्रारंभ हुआ । 
                    ट्रस्ट रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 में लाया गया । इसके तहत जो ईसाई मिशनरी  में काम करने वाले लोग थे वें बहुत तेजी से अलग-अलग संस्थाओं को बनाकर हिंदू समुदायों से जमीन लेना शुरू किया । तथा उन्हें बहुत तेजी से ईसाई भी बनाया ।
                     सरकारी नौकरी में आने वाले अधिकतर लोग अपने गांव के जमीनों को बेचकर शहर में आकर बसने लगे । 
              भारतीय गरीब हिंदू समुदायों के हाथों से जमीन निकल कर धीरे धीरे ईसाई मिशनरीयों के पास, मुसलमानों के पास, कंपनियों के पास, सरकारों के पास जाने लगी । सोना ( स्वर्ण ) और जमीन ये दो भौतिक नित्य संपत्ति होती है । सोना और जमीन यह हमेशा मूल्यवान होते हैं । यह दोनों कभी भी आपके काम आ सकते हैं लेकिन अब भारतीय हिंदू समुदायों के हाथ से यह दोनों बहुत ही आसानी से जाने लगे । कई बार व्यक्ति जमीन को बेचकर मकान बनाता है पर वह मकान नित्य नहीं है । कुछ वर्षों के बाद टूट जाने वाला है । जबकि जमीन हजारों वर्ष के बाद भी वैसी ही रहेगा । 
              जब से जमीन खरीदने और बेचने की परंपरा इस देश में शुरू हुई तब से भाई-भाई में, परिवार में, रिश्तेदारों में, विभिन्न अलग-अलग संस्थाओं में, वाद-विवाद , लड़ाई - झगड़ा, मारपीट, कोर्ट-कचहरी का चक्कर प्रारंभ हो गया है  । 
                    राष्ट्र की संपत्ति तब तक सुरक्षित रहती है जब तक वह राष्ट्र के विभिन्न लोगों में बटी हुई हो । 
लेकिन अंग्रेजी व्यवस्था के आने के बाद भारत के संपूर्ण प्राकृतिक संपत्ति जो भारतीय जनता में बटी हुई थी । धीरे-धीरे वह सरकार अपने अधीनस्थ करती चली गई । अब रही जमीन और सोना । आम जनता के पास जो सोना गहना के रूप में था वह बैंकों ने लोन देने के नाम पर धीरे-धीरे ले लिया । दूसरी बची जमीन, इन जमीनों को लोग पढ़ाई के नाम पर , रोजगार के नाम पर बिजनेस के नाम पर, बेचते चले गए । अब यह सारा जमीन धीरे-धीरे बड़े-बड़े कंपनियों, सरकारों , ईसाई मिशनरीयों एवं मुसलमानों के हाथ में जा रही है । 
                    जब एक बहुत बडे़ हिंदू समुदाय के हाथ से जमीन निकल कर दूसरे समुदायों  के हाथ में चला जाएगा । तब हिंदू समुदाय अपने मूल बुनियादी हर जरूरत के लिए दूसरे समुदायों पर निर्भर हो जाएंगे परिणाम स्वरूप किसी भी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान , पारंपरिक अनुष्ठान, भौतिक मूल आवश्यकता के लिए गुलाम बनना तय है । 
                      दूसरी ओर भारत सरकार पूरे भारतवर्ष में नल -जल योजना का प्रकल्प लेकर के आई है । इस नल-जल योजना के तहत गांव-गांव में जमीन के अंदर से पानी निकालकर टंकी में भरकर पाईप लाईन के माध्यम से घर-घर पहुंचाया जाएगा।  पानी पहुंचाने का कार्य विभिन्न अलग-अलग प्रकार की कंपनियां करेंगी जिसके लिए मासिक शुल्क लिये जाएगे । 
                       मतलब यह है कि आप किसी भी प्रकार के कार्य के लिए पानी को खरीदेंगे और इस पद्धति से सबसे ज्यादा प्रभावित पशुधन होंगे । क्योंकि पानी को खरीद कर आप पशुओं की सेवा कभी भी नहीं करेंगे । तब क्या होगा पशुओं पर आधारित संपूर्ण प्रकल्प ध्वस्त हो जाएंगे । अर्थात पशु संरक्षण समाप्त हो जाएगा अब आपके घर में जो धार्मिक अनुष्ठान किए जा रहे थे उसको भी वह प्रभावित करेंगा  । कल ( नलकूप ) तथा कल से संबंधित ज्ञान कल से संबंधित टेक्नोलॉजी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा और आपको एक ही बात समझाया आएगा कि पानी निकालने का काम सरकार करती है पानी पर सरकार का एकाधिकार होता है । पानी व्यक्तिगत कभी नहीं होता यह सरकारी संपत्ति है । धीरे-धीरे इस पानी पर कंपनी का एकाधिकार हो जाएगा । 
                   पानी कुदरत की दी हुई एक प्राकृतिक संपत्ति है जिस पर उस इलाके में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति का एकाधिकार होता है उसको वह जितना चाहे उतना उचित मात्रा में प्रयोग कर सकता है एवं पानी को प्रदूषण से बचाने का काम भी उसका अपना ही है । पर बड़ी-बड़ी कंपनियों को यह दिख रहा है कि पानी प्राकृतिक संपत्ति है अगर यह हमें मिल जाए तो इस को बेच कर के हम बहुत ज्यादा पैसा कमा सकते हैं । कंपनियों की कठपुतली सरकार उनके झांसे में आकर यह व्यवस्था भी कंपनियों के हाथ में दे रही है और आम जनता विकास के नाम पर इस को भी स्वीकार करने को तैयार है , पथरीली , पहाड़ी उन इलाकों में जहां पानी आसानी से उपलब्ध नहीं है वहां के लिए यह व्यवस्था ठीक था पर समतल भूमि जहां आप बहुत आसानी से कल एवं कुआँ के माध्यम से पानी प्राप्त कर सकते हैं वहां पर इस व्यवस्था को लाने का क्या तात्पर्य था ? 
                       मतलब यह है की आने वाली नई पीढ़ी पानी खरीद कर किसी भी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान, किसी भी प्रकार का पशुपालन एवं समाज सेवा का कार्य तथा खेती का कार्य नहीं करना चाहेंगी ।  अब अगर आम जनता कभी किसी सरकारी व्यवस्था से नाखुश है तो वह उस व्यवस्था के खिलाफ विरोध प्रदर्शन, आंदोलन भी नहीं कर सकती है क्योंकि उसका वह आंदोलन भी मात्र 1 दिन का ही हो सकता है क्यों ? क्योंकि कंपनी पानी का सप्लाई बंद कर देगी, बिजली का सप्लाई बंद कर देगी, बड़े बड़े मॉल में प्रवेश बंद कर देंगी मतलब आप बुनियादी जरूरतों के लिए भी सरकार पर ही निर्भर होंगे । कंपनियों पर ही निर्भर होंगे । परिणाम यह होगा कि आप किसी व्यवस्था का विरोध नहीं कर सकते आपके साथ जैसा किया जाएगा आपको वह स्वीकार ही करना पड़ेगा अर्थात "पूर्ण गुलामी वाला विकास का मार्ग" । 
                              अब यहां एक बात और आप समझ लें । अगर भारत में जमीन खरीदने बेचने की परंपरा नहीं होती तो भारतीय लोग पैसा कमा कर उस पैसे का क्या करते ? वह उस पैसा से सोना ही खरीदतें । इस देश में दिन प्रतिदिन सोना बढ़ता जाता और सोना जितना ही बढ़ता जाता उतना ही इस देश की करेंसीक वैल्यू अंतरराष्ट्रीय मार्केट में बढ़ता । परिणाम स्वरुप यह होता की आप दिन प्रतिदिन अमीर होते जाते । लेकिन यह देश गरीब हो इसलिए यह व्यवस्था इस देश में लाई गई है । जमीन बेचने खरीदने की यह परंपरा इस देश में जब तक नहीं रही तब तक इस देश के लोग पैसा कमा-कमा कर पूरे दुनिया से सोना इकट्ठा करते रहें । परिणाम स्वरूप यह देश सोने की चिड़िया बना ।  
                             जमीन की खरीद-बिक्री से आपके देश की जमीन तो बढ़ती नहीं है और रुपया आप ही के देश में सरकुलेट होता रहता है । मतलब आप बाहर से कोई भी किसी भी प्रकार का आमदनी नहीं कर पाते हैं । करेंसीक वैल्यू गिर जाने से अंतरराष्ट्रीय मार्केट में आपके रुपया का वैल्यु कम हो जाता है । दूसरी ओर अगर आप जमीन का वैल्यु जीरो कर दे तो आप धन कमा के उसका करेंगे क्या तो बस एक ही मार्ग बचेगा पर्व त्योहारों पर सोना खरीदेंगे सोना आपके देश में बढे़गा । सोना जैसे-जैसे आपके देश में बढ़ेगा आपके देश की करेंसीक वैल्यु बढे़गी। मतलब आप कम ही रुपया देकर के बहुत ज्यादा सामान बाहर से खरीद सकते हैं ।
                           मतलब यह है कि सरकार सरकारी कोष में सोना अधिक रखेगी नोट कम छापेगी । सोना अधिक होगा नोट कम छपेगा तो नोट का वैल्यु बढ़ जाएगा । वर्तमान में नोट छापने के लिए सरकार अपने कोष में सोना कम रखती है नोट ज्यादा छापति है । परिणाम स्वरूप ₹ का वैल्यू अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कम होता है । उस सोना के हिसाब से आज वर्तमान में सोना सरकार कम रखती है नोट अधिक छापति है सोना कम होने से नोट की वैल्यू कम हो जाता है । सोना अधिक रखने से नोट का वैल्यु बढ़ जाता है । अब सरकार के पास सोना ही कम है और नोट ज्यादा छापना है तो नोट का वैल्यु कम करना ही पड़ता है अंतरराष्ट्रीय मार्केट में । इसलिए देश में सोना चाहिए । सोना देश में बढे़ उसका एक ही मार्ग है । जमीन की वैल्यू को शुन्य कर दे । जमीन की वैल्यू जीरो हो जाएगी तो कोई भी देश में जमीन खरीद-बिक्री नहीं कर सकता परिणाम यह होगा कि हिंदू समुदायों के पास जमीन कभी कम नहीं होगा आपस में दान के माध्यम से जमीन का लेनदेन प्रारंभ होगा । इससे हम अपने विचार के अनुकूल व्यक्ति को ही जमीन दान करेंगे । परिणाम सबको रोजगार का अवसर प्राप्त होगा और देश की करेंसी की वैल्यू बढे़गी ।
                               जमीनी-झगड़ा, कोट-कचहरी. भाई-पाटीदार में मारपीट इन सभी समस्याओं से देश छुटकारा पाएगा । 
                                              शेष क्रमशः- आगे
वैदिक सुप्रभात          
  उत्तम प्रकाश 
94 16044 828

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