लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy भाग-8

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लोकतंत्र में राजतंत्र भाग-8


                     15 अगस्त 1947 तक बहुत लंबे समय के अथक प्रयास करने के बावजूद भी ब्रिटेन भारत को गुलाम नहीं बना पाया । 
                    1857 के बाद 1947 तक अंग्रेजी शिक्षा तंत्र के संचालन के बावजूद भी, भारत के रोजगार व्यवस्था को ठप करने के बाद भी, हिंदू -मुसलमान को आपस में लगाने पर भी, पशुधन को समाप्त करने के लिए सारी हदें पार करने के बाद भी, वह भारतीयों के दिल-दिमाग में ईसाइयत का कुछ खास प्रभाव नहीं डाल पाए । 15 अगस्त 1947 में भी लोग इस देश में राम को, कृष्ण को ,ब्रह्मा जी को, शिव जी को , दुर्गा माता को , होली ,दीपावली, छठ ,दशहरा, बसंत पंचमी,गुरु पूर्णिमा ,एकादशी ,मुंडन ,उपनयन ,हवन- यज्ञ , आयुर्वेद, योग, पुराण ,वेदादि शास्त्रों में आस्था भारतीयों की कभी भी कम नहीं हो पाई । 
                    राम के नाम पर आज भी इस देश में लोग एक हो जाते हैं । पर्दे की दुनिया आने के बाद भी लोग उस तीर धनुष वाले मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी को ही याद करते हैं । पिछले साल 2020 में पूरे देश में लॉकडाउन लगाया गया था । उस दौरान भारतीय जनमानस धारावाहिकों के माध्यम से राम को, कृष्ण को, चाणक्य को, भारतीय शास्त्रों पर आधारित जो धारावाहिक है उन्हें ही देखना ज्यादा पसंद की । अर्थात् बाहर से कोई भी इस देश में आया दशकों नहीं , सैकड़ों साल तक रहा हो लेकिन फिर भी वह इस देश के जनमानस के हृदय में बैठे हुए उस धार्मिक आस्था को बदल नहीं पाए । 
                    मतलब यह है कि ब्रिटेन वासी यहां आए अलग अलग कॉलोनिया बनाई , साम्राज्य स्थापित किया , पर इस देश को वह किसी भी दृष्टिकोण से गुलाम नहीं बना पाए । यहां का मानस पटल कभी भी उनके गुलामी को स्वीकार नहीं किया । नई पीढ़ी हो या पुरानी सब एक को ही याद करते हैं जिनका नाम है मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी है । 
                   अंग्रेजों को यह महसूस हो गया था । भारतीयों को अगर हमें गुलाम बनाना है तो हम तो नहीं बना सकते । इसके लिए हमें कुछ भारतीयों को ही अंग्रेज बनाना होगा । जो आगे जाकर अपनी नई पीढ़ी को गुलाम बना पाएंगे । तब शायद इस देश को गुलाम हम (अग्रेज ) बना पाए । 
                  कुछ खास तरह की शब्दावली होती है जिसमें व्यक्ति अपने बुरी नियत को छुपा कर रखता है ताकि सामने वाला समझ न पाए और उसका काम भी निकल जाए ।
                 ब्रिटेन वासी का अक्सर यही कहना होता है कि दुनिया के विभिन्न इलाके हैं । जहां के लोगों को हम सभ्य बनाना चाहते हैं । उनको दुनिया का सही मार्ग दिखाना चाहते हैं । उनको शिक्षा विज्ञान-टेक्नॉलॉजी हम देना चाहते हैं और अपने ईसाई धर्म का भी प्रचार करना चाहते हैं । इसलिए हम वहां व्यापार करने जाते हैं और फिर वहां उपनिवेश और अपना साम्राज्यवाद स्थापित करते हैं । उस देश में चल रही अव्यवस्थाओं को हम व्यवस्थित करते हैं ताकि वहां के लोग सभ्य हो पाए । 
                 उन्होंने कभी भी किसी से यह नहीं कहा कि हमारा लक्ष्य दुनिया के विभिन्न इलाकों में जाकर उनको लूटना और उनको गुलाम बनाना है ।
                पर वे यह जरूर चाहते हैं कि हम जिस देश से जाकर लौटे वें सारी दुनिया से यह कहते रहे कि हम अंग्रेजों के गुलाम थे । अंग्रेजों ने हम पर राज किया । उन्होंने हम पर शासन किया । वह आए तो हमें टेक्नोलॉजी और साइंस का ज्ञान प्राप्त हुआ । वह आए तो यहां की राजतंत्र व्यवस्था को खत्म करके लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू किया । वह आए तो हमारे देश में बहुत कुछ अच्छा हुआ । आज वह हमारे देश में नहीं है । हम प्रतिवर्ष स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं और अपनी नई पीढ़ी में इस खुशी को प्रदर्शित करते हैं । अंततः अंग्रेजों का अपने देश में आना कहीं न कहीं हमारे लिए लाभकारी ही रहा है । 
               मतलब एक मालिक अपने गुलाम से इसके अलावा और क्या सुनना चाहेगा ।
 मतलब यह है कि अंग्रेज जीते जी यहाँ रहते हुए तो भारतीयों को कभी गुलाम नहीं बना पाए पर यहां से जाने के बाद। कुछ ऐसी व्यवस्था इस देश में लाई ताकि अगली पीढ़ी धीरे-धीरे गुलाम बन ही जाए । 
               सबसे पहली गलती तो यह हुई कि इस देश में अंग्रेजों के जाने के बाद 15 अगस्त एवं 26 जनवरी, दो राष्ट्रीय पर्व हम स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस के नाम पर मनाते हैं और हर अगली नई पीढ़ी को यह बताते हैं कि हम अंग्रेजों के गुलाम थे ।
               मतलब यह है कि सर हमारा, जूता भी हमारा और वहां हम अकेले हैं मारने वाला दूसरा कोई नहीं है ।
 मतलब यह है कि हम अपने नई पीढ़ी को कभी भी यह नहीं बताते की विक्रमादित्य चक्रवर्ती सम्राट थे । महान सम्राट अशोक चक्रवर्ती सम्राट थे । उनकी वीरता और वीरता की गाथा हम अपनी नई पीढ़ी को नहीं बताते । बस हम इन्हें केवल इतिहास के पन्नों में पढ़ लेते हैं जबकि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा मना कर सम्राट अशोक एवं विक्रमादित्य की महानता को पूरे भारतवर्ष में बताना था और इतिहास के किसी पन्ने पर हम पढ़ लेते कि अंग्रेज भारत आए और समय-समय पर उन्होंने अपना उपनिवेश बनाया । गुलाम शब्द का प्रयोग ही ठीक नहीं था ।  पर हम साल में दो बार यह जरूर बताते है कि हम अंग्रेजों के गुलाम थे । अंग्रेजों ने हम पर शासन किया और कहीं न कहीं अंग्रेजों का अपने देश भारत में आना, भारत के लिए लाभकारी ही रहा है । जबकि अंग्रेज ऑफीशियली कभी नहीं कहते कि हमने किसी देश को गुलाम बनाया या गुलाम बनाना हमारा अपना कोई उद्देश्य था । उनके शब्दावलीओं में गुलाम शब्द नहीं है पर हमने अपने अतीत में गुलाम शब्द जोड़ रखा है ।
               दूसरी गलती हमने यह कि की हमने अपना राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा को बनाया । जबकि अपने देश भारत में किसी से भी युद्ध करने के लिए परंपरागत चली आ रही ध्वज भगवा को ही हम लेकर युद्ध करते रहे । चाहे वह समय राम का हो , कृष्ण कहो , सम्राट अशोक का हो, विक्रमादित्य का हो या आधुनिक भारत के शिवाजी महाराज हो , महाराणा प्रताप हो , रानी लक्ष्मीबाई हो सबों ने एक ध्वज भगवा को लेकर युद्ध करते हैं । पर 1947 के बाद हमने एक नया ध्वज तिरंगा बना लिया जिसका कोई औचित्य ही नहीं था इस देश में । राष्ट्रीय ध्वज शब्द का कोई औचित्य ही नहीं था भगवा इस देश का स्वेत: राष्ट्रीय ध्वज पूर्व से ही रहा है । पर शब्दावली इस प्रकार की नहीं थी । 
             तीसरी गलती हमने यह की कि इस देश का नाम भारत, आर्यव्रत न रखकर हमने इंडिया रखा ताकि दुनिया हमें इंडिया के नाम से जाने । हमने राष्ट्रीय पशु, राष्ट्रीय पक्षी, राष्ट्रीय नदी इस प्रकार के शब्द लाएं ताकि हमारी संवेदना केवल राष्ट्रीय शब्द से जुड़े हुए चिन्हों में ही सिमट कर रह जाए । बाकी अन्य के साथ हम किसी भी प्रकार का अत्याचार , अन्याय करें उस पर कोई ध्यान न दें । जैसे मान ले अगर किसी मोर का मृत्यु हो जाए तो तुरंत आप राष्ट्रीय ध्वज में उसको लपेट कर उसका अंतिम संस्कार करेंगे पर बाकी और किसी जीव-जंतु को हम मारते रहे, काटते रहे, खाते-पीते रहे । उनके प्रति हमारी संवेदनशीलता मर जाए । ताकि उन्हें भरपूर , अपनी आवश्यकता के हिसाब से खाने को मिलता रहे । भारत से निर्यात उन पशुओं का उन देशों में आराम से होता रहे । ताकि उनकी अपनी निर्दयता वाली भूख की क्षुदा मिटती रहे । जबकि भारत में प्रत्येक पशु-पक्षी. नदी आदि प्राकृतिक संपूर्ण संपत्ति किसी न किसी देवी-देवता की सवारी है । जो रक्षार्थ भारतीय ऋषि-मुनियों ने बनाये है । ताकि उनकी रक्षा होती रहे । इस प्रकार की आत्मिक-अस्मिता, धार्मिक आस्था हमारी समाप्त हो जाए इसलिए यह राष्ट्रीय शब्द लाए गए । 
                                                                                                                                   शेष क्रमशः- आगे
उत्तम प्रकाश
 वैदिक सुप्रभात
 94160 44428

टिप्पणियाँ

Unknown ने कहा…
अच्छा विचार के साथ भारतीय संस्कृति का इतिहास बताया वाकई प्रेणना दायक है।
महन्थ ।
Unknown ने कहा…
बहुत अच्छा विचार है।
Abhishek Pandey ने कहा…
Mere vichar aapko pata hai par phir bhi main aapke vichar ka samaan karta hu. Aap apne taraf se suruaat kar sakte hai, log agar ishse prabhabit honge toh aap sabal honge.

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