लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy (भाग-9)

 -:ओ३म्:-
लोकतंत्र में राजतंत्र (भाग-9 )


                         भाग-8 को पढ़ने के बाद आपके मन में संभवत कई प्रकार के प्रश्न उत्पन्न हुए होंगे । 
            यथा:- गुलाम कौन होता है ? गुलामी कब आती है ? अंग्रेजों का, भारत गुलाम नहीं हो पाया इसका मूल कारण क्या हो सकता है ? 
             जो अपने धर्म का त्याग कर देते हैं वे स्वतः गुलाम हो जाते हैं । धर्म क्या है ? जो तर्क के मार्ग को प्रशस्त करें । अर्थात जो तर्क पर आधारित हो । जो तर्क करना सिखाए । तर्क का आधार न्याय हो । न्याय क्या है ? पदार्थ के गुण ,कर्म ,स्वभाव के अनुकूल उसके साथ यथावत जो जैसा है उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना न्याय है । तर्क युक्ति संगत हो, युक्तियुक्त हो वही तर्क है । भारतीय धर्म शास्त्र तर्क पर आधारित है । क्योंकि उसका मूलाधार सत्य है । जिसका आधार सत्य और न्याय हो, जो तर्क से दूर नहीं भागता, डटकर हर प्रकार के तर्क का सामना करता है और सत्य को प्रदर्शित करता है । वही धर्म है । व्यक्ति तर्क करके धर्म को धारण करें । लिखी हुई बात को स्वतः ब्रह्म वाक्य समझकर धारण न करें या आप्त लोगों के मार्ग पर चले । आप्त विद्वान तर्क एवं चिन्तन करके धर्म को सत्यापित करते हैं और तर्क करना कभी बुरा नहीं मानते । ईसाइयत और इस्लाम में धर्म के प्रति तर्क करना मनाही है क्योंकि सत्य और न्याय के आधार पर तर्क करके वे अपने धार्मिक बातों को सत्य साबित नहीं कर सकते । 
            भारत के लोग अंग्रेजों के गुलाम नहीं हो पाए इसका मूल कारण यह था कि भारतीय अपने धर्म का कभी भी त्याग नहीं किए । जो अपने धर्म का त्याग नहीं करते हैं वे सदा ही सम्माननीय, आदरणीय, पूजनीय एवं ग्रहणीय होते हैं । आखिर ऐसा क्या कारण था कि भारतीय लोग अपने धर्म का पालन करते रहे, त्याग नहीं कर पाए । अपने देश भारत में धर्म का पालन बिल्कुल सरल और आसान था यथा:- आप चाहे तो अद्वैतवाद को माने या द्वैतवाद को , नहीं तो त्रैतवाद को भी मान सकते हैं । आप चाहे तो कृष्ण की पूजा करें , या राम की करें ,शिव की करें या शंकर की करें । आप चाहे तो विष्णु की पूजा करें या ब्रह्मा की पूजा करें या दुर्गा माता की पूजा करें । कुछ लोग ऐसे भी हैं जो माताओं की पूजा करते हैं । कुछ लोग केवल मिट्टी की पूजा करते हैं । कुछ लोग हवन यज्ञ करते हैं । कुछ लोग नास्तिक विचारधारा के होते है । यह भारत में स्थापित सनातन धर्म की विनम्रता है इसे व्यक्ति जिस तरह समझता है । उसको उस तरह से पालन करता है यहां के पुजारी उन्हें उस प्रकार अपनी भक्ति को प्रकट करने की अनुमति भी देते हैं । मतलब यह है कि आप अपने से ऊपर किसी न किसी को शक्तिशाली माने आपके अंदर यह अभिमान न हो कि हम बड़े हैं लेकिन फिर भी यें सभी एक साथ एक ही समाज में रहते हैं और ये सब के सब धार्मिक कहलाते हैं । यह भारत के अंदर धर्म पालन की अपनी-अपनी विभिन्नता है लेकिन फिर भी ये सभी भारतीय हैं और हिंदू है। 
            भारत में धर्म के पालन का मूलाधार सदा से स्त्री ही रही है । स्त्री ही धर्म का पालन करती है और पुरुषों को धर्म पालन करने के लिए बाध्य करती है । इसलिए महिला को धर्मपत्नी कहा है । एक कन्या विवाह के बाद कुमारी से "देवी"बन जाती है । पर पुरुष कुमार से "देवता" कभी नहीं बनता उस देवी का प्रसाद बनता है । भारत में धर्म के पालन में अधिक से अधिक और कम से कम पैसा भी खर्च होता है अर्थात जिनके पास जितना सामर्थ है वह अपने धर्म के पालन में अपने हिसाब से पैसा खर्च करके कर  सकता है । महिला अपने धर्म एवं संस्कृति के पालन करने हेतु पैसा खर्च करती है और उस पैसे को उसका पति उसे देता है । अर्थात पैसे का अर्जन पति करता है परंतु पत्नी उसे खर्च करती है । पति कहता है कि हम केवल पंडित जी को ही वस्त्र दे देंगे परंतु पत्नी कहती है कि नहीं पंडित जी की पत्नी पंडिताइन को भी साड़ी, साया, ब्लाउज देना चाहिए तब जाकर पूजा का उचित फल मिलेगा । 
            मतलब यह है कि कमाने वाला पति है और खर्च करने वाली पत्नी है । पत्नी खर्च करती है और उसके अंदर देने की अर्थात देवी होने की प्रवृत्ति है इसीलिए वह देवी है । कारण यही है कि भारत में महिला को व्यापार में लोग नहीं लगाते अर्थात् उसके अंदर देने की प्रवृत्ति बनी रहे , लेने की नहीं या हिसाब करने की नहीं । अगर उसके अंदर देने की प्रवृत्ति समाप्त हो गई , लेने की प्रवृत्ति बढ़ गई । तो परिवार के संचालन , समाज में और धर्म के पालन में बाधा उत्पन्न होगा । क्योंकि पत्नी का धन के प्रति मोह बढ़ जाएगा । फिर धर्म का पालन नहीं हो पाएगा और धर्म का पालन नहीं हुआ तो उस समाज का गुलाम होना, संस्कृति में बदलाव होना प्रारंभ हो जाएगा भविष्य गर्त में और देश गुलाम बनेगा । 
             आप पूरे संसार को ध्यान से देखें तो आपको दो प्रकार के पदार्थ ही दिखाई देंगे । जिनमें एक का स्वभाव लेना है । जो स्वभाव से शुष्क, सूखे हुए होते हैं । दूसरा वह पदार्थ जिनका स्वाभाव देना है, जो स्वभाव से भारी एवं गिले होते हैं । जो शुष्क पदार्थ हैं उनको अग्नि और जो गिले पदार्थ हैं उनको शास्त्रों में सोम कहा जाता है । रसायन शास्त्र की भाषा में मैं आपसे कहुँ तो आवर्त ( पेरियोडिक टेबल ) सारणी में दो प्रकार के पदार्थ दिखते हैं । एक का स्वभाव लेना और दूसरे का स्वभाव देना है । जिन पदार्थों के बाहरी कक्ष में आठ इलेक्ट्रॉन से अधिक इलेक्ट्रॉन होते  है। वें अपना इलेक्ट्रॉन त्यागने की प्रवृत्ति रखते हैं ताकि उनका अष्टक पूरा हो जाए और जिन पदार्थों में 8 इलेक्ट्रॉन से कम इलेक्ट्रॉन बाहरी कक्ष में होते है । वह उतना ही इलेक्ट्रॉन दूसरे पदार्थ से प्राप्त करना चाहते हैं ताकि उनका भी अष्टक पूरा हो जाए । एस ब्लॉक के जितने एलिमेंट है । वह अपना इलेक्ट्रॉन त्यागने की प्रवृत्ति रखते हैं और पी ब्लॉक के जितने एलिमेंट है वह बाहर से इलेक्ट्रॉन प्राप्त करने की प्रवृत्ति रखते हैं ताकि उनका अष्टक पूरा हो जाए । इन्हीं एलिमेंटो के लेनदेन की प्रवृत्ति के कारण नई सृष्टि होती है और नई सृष्टि पदार्थ के विभिन्न रूपों को प्रदर्शित करती है । जिसके कारण से यह संपूर्ण ब्रह्मांड हमारे इर्द-गिर्द दिखाई देता है । ठीक उसी प्रकार महिला के अंदर देने की, त्यागने की प्रवृत्ति होती है दूसरी ओर पुरुष के अंदर लेने की, ग्रहण करने की प्रवृत्ति होती है परिणाम स्वरुप पुरुष धन अर्जन करता है और महिला धन खर्च करती है । जो खर्च करने की प्रवृत्ति रखता है वही धर्म का पालन करता है । जो अर्जन करने की प्रवृत्ति रखता है वह धर्म पालन में सहयोग प्रदान करता है । शायद यही कारण है कि भारतीयों ने महिला को कभी भी व्यापार करने नहीं दिया महिला को केवल धर्म पालन में प्रवृत् रखा ।
               परिणाम यह हुआ कि बाहर से अंग्रेज आए हों या मुगल आए हों या कोई भी विदेशी भारत में आया हो भारतीय जनमानस के दिल दिमाग से कभी भी धार्मिक प्रवृत्ति को बदल नहीं पाए । क्योंकि भारतीय महिला स्वाभाविक रूप से अपने धर्म पालन में प्रवृत्त रही । 1947 में पाकिस्तान को अलग होने के बाद भी भारत में 35 से 36 करोड इस देश में हिंदू आबादी रही  । अगर भारत मुगलों का या अंग्रेजों का गुलाम हुआ होता तो इतनी बड़ी आबादी हिंदुओं की नहीं होती । 
            भारतीय हिंदू-महिला धर्म का त्याग नहीं कर पायी  । इसके पीछे दो कारण हैं एक तो भारतीयों ने महिलाओं को कभी भी व्यापार नहीं करने दिया दूसरी ओर 1857 में इंडियन एजुकेशन एक्ट आने पर । भारतीयों ने महिलाओं को कभी भी अंग्रेजों के पास शिक्षा ग्रहण करने हेतु नहीं भेजा । क्योंकि उन्हें यह पता था । अगर अंग्रेजी व्यवस्था में महिलाएं आई तो धीरे-धीरे वें अपने धर्म से विमुख हो जाएगी और अगर महिलाएं धर्म से विमुख हो गई तो देश का भविष्य गर्त में जाने से कोई नहीं रोक सकता । 
               अग्नि और शिक्षा अर्थात् ज्ञान लेने से पहले यह देख लेना चाहिए कि जिससे हम ले रहे हैं वह हर तरह से हम से श्रेष्ठ होने ही चाहिए । भारतीयों को पता था कि बाहर से आने वाले अंग्रेज एवं मुगल  हर प्रकार से दस्यु हैं । इनसे यह दोनों चीज कभी भी नहीं ली जा सकती है । अगर भारतीय समाज के पुरुष वर्ग इनके पास जाकर शिक्षा ले रहा है तो वह हमारी मजबूरी है परंतु महिलाओं को हम इनके पास नहीं भेजेंगे नहीं तो उनका चरित्रहीन होना स्वभाविक है । 
                घर में महिलाओं को गीता,रामायण, महाभारत एवं मनुस्मृति आदि ग्रंथ को पढ़ाना भारतीयों ने ज्यादा उचित समझा बावजूद अंग्रेजो के द्वारा चलाई गई शिक्षा व्यवस्था में भेजने के । 
                 दूसरा एक और कारण था भारतीयों के गुलाम नहीं बनने का । भारतीयों के पास कुछ न कुछ अल्प मात्रा में उनके पास जमीन था । जिस पर वह आसानी से ऊपज करके अपनी जरूरत की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा कर सकते थे । उनके पास लघु उद्योग था और उन उद्योगों में काम करने के लिए पशु । जमीन के अंदर पर्याप्त पानी था । खेती करने के लिए, पशु पालन करने के लिए, लघु उद्योग चलाने के लिए एवं बाजार में वस्तु को बेचने के लिए बैलगाड़ी एवं उससे संबंधित संपूर्ण गांवीये तकनीकी उनके पास था । पूरी तरह लूट जाने के बावजूद भी भारतीय अपनी पेट की क्षुदा को शांत करने में सदा वे सक्षम रहें ।
                    परिणाम यह हुआ कि भारतीय बाहर से आए हुए विदेशियों के वे कभी भी किसी का भी गुलाम नहीं बने  या उनके गुलामी का उनके ऊपर कोई भी प्रभाव नहीं पडा़ ।
                     आधुनिक विकास के मार्ग में भारतीय समाज की महिलाएं अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण करके चरित्रहीन हो रही हैं । व्यापार में कार्यरत हो रही हैं । परिणाम उनके अंदर हिसाब करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है । जिसके कारण परिवार छोटा हो रहा है । मां कभी हिसाब नहीं करती इसलिए धरती को मां कहते हैं क्योंकि वह भी हिसाब नहीं करती । हमारे हाथ से जमीन, पशु, पानी एवं उससे संबंधित तकनीकी उसका ज्ञान अब हमारे हाथ से निकल रहा है । 
                      मतलब गुलामी का वह मार्ग जिसमें गुलाम बनने वाले को दूर-दूर तक यह नहीं मालूम कि वह धीरे-धीरे गुलाम बन रहा है । दूसरों पर आश्रित हो रहा है । उसकी अपनी स्वावलंबीता समाप्त हो रही है । वह धीरे-धीरे परावलंबी बन रहा है। 
                      इसी को कहते हैं लोकतंत्र में राजतंत्र की सूक्ष्म तैयारी जिसमें केवल कंपनी ही मालिक होंगे बाकी सभी नौकर । इस लोकतंत्र में जनता का केवल एक ही अधिकार है समय आने पर वोट देना । मतलब वोट देकर लूटने के लिए नयी अनुज्ञप्ति देना अपने वोट लेने वाले मालिक को । 
        
                                                                                                                                     शेष क्रमशः- आगे
उत्तम प्रकाश 
वैदिक सुप्रभात
94 16044 828

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