लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy (भाग-11 )
-:ओ३म्:-
लोकतंत्र में राजतंत्र (भाग-11 )
1947 के बाद अर्थव्यवस्था के आधुनिक स्वरूप पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के रूप में भारत में उभरा जिसने भारत की सभ्यता एवं सांस्कृतिक परिधि के मूलाधार पर आघात किया ।
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के विषय में बात करने से पूर्व भारतीय अर्थव्यवस्था को एक बार समझ लें तो ठीक ही रहेगा । भारत में अर्थव्यवस्था एवं मानवीये विकास की कुछ मर्यादाएं एवं सीमाएं भारतीय ऋषि-मुनियों ने तय किया था । उसे भी समझना नितांत आवश्यक है ।
आइए इसको एक उदाहरण से समझते हैं । विवाह के 8 साल के बाद भगवत् कृपा से एक नए दंपत्ति को संतान की प्राप्ति हुई । धीरे-धीरे समय के साथ वह बच्चा बड़ा हो रहा था । जिंदगी की शुरुआत में ही उस बच्चे को एक बार गंभीर रूप से चोट लग गई । विद्यालय में लगे इस चोट की खबर सुनते ही मां-बाप एवं घर के और भी रिश्तेदार दौड़ते हुए विद्यालय की ओर भागते हैं । मतलब चोट उस नन्हे से बच्चे को लगी है । पर दर्द की अनुभूति परिवार के सभी सदस्यों को हो रही है । इतना ही नहीं जिस विद्यालय में विद्यार्थी पढ़ाई कर रहा है उस विद्यालय के शिक्षक ,वर्ग- शिक्षक, उसके इष्ट मित्र और जो भी हैं सब को उस दर्द की अनुभूति हो रही है । आत्मा एक, शरीर भी एक और चोट भी एक को ही लगी है पर दर्द की अनुभूति अनेकों को हो रही है । कुछ तो है जो सब में एक जैसा सामान्य है जिसके कारण अनुभूति सबको एक जैसी ही हो रही है ।
अनेक है लेकिन उन अनेकों में भी एकत्व का भाव है । एकत्व का यही भाव जिस समाज एवं सभ्यता- संस्कृति में जितना ही गहरा और मजबूत है। वह राष्ट्र, देश, समाज एवं उसकी सभ्यता-संस्कृति, प्राकृतिक रूप से उतनी ही विकसित होने का परिचायक है ।
भारतीय समाज में एकत्व की एक रसधारा कुछ इस प्रकार भारतीय जनमानस के मन-मस्तिष्क में वर्तमान है । संपूर्ण ब्रह्मांड को बनाकर संचालन करने वाला, पालनहारा एवं संहारक एक ही है । जिसके गुण स्वामी दयानंद सरस्वती अपने आर्य समाज के दूसरे नियम में कुछ इस प्रकार बताते हैं । वह परमपिता परमेश्वर सत्चितानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक,सर्वांतर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टि करता है ।
यह संसार 3 अनादि तत्वों से मिलकर बना है । ईश्वर, जीव और प्रकृति । ईश्वर के गुण ऊपर बता आए हैं । अब जीवात्माओं के संबंध में भारतीय मान्यता यह है कि आत्मिक दृष्टिकोण से सभी जीव एक जैसे ही है । पर चित पर पड़े संस्कार के कारण उसके विभिन्न गुण दिखाई देते हैं । परंतु मोक्ष प्राप्त कर लेने पर लगभग सब एक जैसे अर्थात एकत्व के भाव में ही वर्तमान रहते हैं ।
अर्थात् संसार का स्वामी एक ही है । इस संसार में सभी जीव-जंतु आत्मा के दृष्टिकोण से एक ही है परंतु कर्मानुकूल अलग-अलग योनियाँ उन्हें प्राप्त है । अर्थात् जिस प्रकार मनुष्य के अंदर इच्छा, ज्ञान, प्रयत्न, सुख-दुख और द्वेष के गुण दिखाई देते हैं । ठीक उसी प्रकार दुनिया के सभी जीव-जंतुओं में भी न्यूनाधिक ये सभी गुण वर्तमान हैं अर्थात् सभी जीव-जंतु आत्मा की दृष्टिकोण से एक ही है पर केवल चित पर पड़े संस्कार के कारण आपस में भिन्न है एवं उनकी शारीरिक ढांचा भी अलग-अलग है ।
सभी जीव-जंतुओं में एकत्व का भाव रखना भारतीय दर्शन का मूल आधार है । चराचर जगत का स्वामी भी एक ही है । अतः सभी जीव-जंतुओं के प्रति न्यायिक दृष्टिकोण बनाकर मानव जीवन संचालित करना ही भारतीय सभ्यता-संस्कृति का सार है । अतः भारतीय दर्शन के अनुसार व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किसी भी जीव- जंतु को हानी पहुंचाना समुचीत नहीं है ।
अर्थात् मानवीये विकास की कोई भी परिभाषा हो जड़-चेतन संपूर्ण संसार का समुचित अस्तित्व को ध्यान में रखकर विकास के मार्ग पर प्रश्सत होना ही भारतीय जीवन शैली है । चाहे वह विकास, यातायात से संबंधित हो या विज्ञान से या कृषि से या रोजगार से या धर्म से या शासन से संबंधित हो या तकनीकी से चाहे वह किसी भी प्रकार का हो । न्याय को ध्यान में रखकर ही विकास करना चाहिए ।
भारतीय जीवन-शैली में पशुओं का भी उतना ही महत्व है जितना मानव का, कृषि कार्य में बैल, भैंस, घोड़ा, गद्हा, ऊँट, भेड़ आदि कई अन्य जीवों का प्रयोग होता रहा है । ताकि उनका अपना जीवन यापन मानव के कारण आसान एवं मानव का कार्य उनके सहारे आसान हो पाए । युद्ध के मैदान में हाथी, घोड़ा । संदेश वाहक के रूप में कबूतर, बाज । पौष्टिक आहार हेतु दुग्ध आदि, उत्पादन के लिए गौ ,बकरी, ऊंटनी आदि का पालन ,साथ ही कुत्ता, बंदर आदि अन्य कई जीव, पालतु-पशु के रूप में भारतीये पालन पोषण करते रहे और उनके अंदर भी आत्मा तत्व को देखना, एकत्व की दृष्टिकोण को ध्यान में रखना, भारतीय जन-मानस में जीव-जंतुओं के प्रति यह दृष्टि रही है ।
भारतीय दृष्टिकोण में प्रकृति का प्रत्येक जीव- जंतु किसी विशेष, खास उद्देश्य हेतु वें प्रकृति में बनाए गए हैं । जिनका आदर सम्मान करना एवं उसके प्रति न्यायिक दृष्टिकोण बनाकर व्यवहार करना यह मानव का सामान्य धर्म है । भारतीय परंपरा में एक त्योहार है दुर्गा पूजा । आप दुर्गा पूजा में दुर्गा मंडप में जाकर ध्यान से देखें तो वहां प्रत्येक जीव को सांकेतिक रूप से किसी न किसी देवी-देवता का सवारी बनाया गया है ।
सूर्य से ऊर्जा को प्राप्त करके पेड़-पौधे अपना भोजन बनाते हैं । पेड़-पौधों से शाकाहारी जीव अपना भोजन प्राप्त करते हैं । जिन्हें फर्स्ट कंज्युमर कहा जाता है । जैसे चूहा एवं बैल चूहा गणेश जी की, नन्दी शिव जी की सवारी है, दुर्गा मंडप में । चूहा को सर्प खाता है । सर्प सैकंड कंज्युमर है जो शिवजी के गर्दन में लिपटा रहता है । मोर कार्तिकेय की सवारी है । मोर थर्ड कंजूमर है । मोर सर्प को खाता है । शेर फोर्थ कंज्यूमर जिसका आहार मोर हो सकता है । शेर दुर्गा माता की सवारी है । माता लक्ष्मी की सवारी उल्लू जो खेतों में पाए जाने वाले हानिकारक कीट, जो फसलों के लिए हानिकारक है उन्हें वह खाता है । अर्थात् कृषि कार्य हेतु उल्लू काफी महत्व का है । अर्थात् प्रत्येक पोषी स्तर के जीव किसी न किसी रूप में संरक्षित होने चाहिए । जो हमारे ही देवी-देवता के सवारी हैं । मतलब उनकी सुरक्षा हो सके इसलिए देवी-देवताओं की सवारी बनाकर हमें धर्म से जोड़ कर के यह बताया । ताकि हम अपने व्यापार या व्यापारिक लाभ हेतु इनके साथ दुर्व्यवहार न करें। शिवजी के एक संबंधी है विष्णु जी , जो शेषनाथ पर लेटे हुए हैं और समुद्र के ऊपर तैर रहे हैं । मतलब हमारे एक देव समुद्र के ऊपर तैरते हैं अर्थात् हमें समुद्र की भी सुरक्षा करनी है । हमारे दुर्व्यवहार के कारण समुंद्र दूषित न हो और वह शेषनाथ पर लेटे हुए हैं अर्थात् हमें सांपों के साथ दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए और शिवजी के गर्दन में भी लिपटा हुआ है । विष्णु जी के नाभि से निकले कमल के ऊपर अंतरिक्ष में ब्रह्मा जी बैठे हैं । अर्थात् हमें अंतरिक्ष को भी सुरक्षित रखना है । हमारे दुर्व्यवहार के कारण पृथ्वी के बाहर आसपास के परिधि में किसी प्रकार का कोई प्रदूषण न फैले । पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु के 24 अवतार है। वराह , कूर्म, मतस्य आदि मतलब ये सभी जीव भगवान विष्णु के अवतार हैं उनके साथ हमारा व्यवहार सकारात्मक ही होना चाहिए । भारतीय परंपरा में नदियों को मां कहां है। जिनके किनारे मानव सभ्यता का विकास हुआ है । अर्थात् नदी के जल दूषित न किए जाए । गौ भी हमारी मां है । उनके साथ भी दुर्व्यवहार न हो । उनका व्यापार न किये जाए । जमीन, भूमि भी हमारी मां है हम इसे भी बेचते नहीं थे। ताकि इस पर बाहर के लोग आकर न बस सके और भारतीय सभ्यता-संस्कृति सुरक्षित रहे। इस देश में पीपल के पेड़ को ब्रह्म बाबा, तुलसी माता, बरगद , नीम ,बेल आदि ये सभी पेड़ पूजनीय है । मतलब ये है कि हम भारतीय लोग "वसुधैव कुटुंबकम" वाले लोग हैं । संपूर्ण संसार हमारा परिवार है और हम इस परिवार के सदस्य हैं । परिवार में एक दूसरे की जरूरतें पूरी की जाती है । साझेदारी होती है वस्तुओं का , न कि व्यापर । मतलब यह है कि अपने देश भारत में व्यापार एवं मानवीय विकास की सीमा तय की गई । उन सीमाओं का उल्लंघन करना अर्थात् धर्म का उल्लंघन है । अर्थात् न्याय के मार्ग से दूर जाना है जो बिल्कुल ही उचित नहीं है ।
भारतीय अर्थव्यवस्था का एक मौलिक सिद्धांत है प्रायः दीपावली में लोग अपने घर के आगे लिखे हुए विभिन्न प्रकार के पोस्टर लगाते हैं जिसमें लिखा होता है "शुभ-लाभ" अर्थात लाभ ऐसा होना चाहिए जो शुभ हो मतलब न्याय के मार्ग से प्राप्त हो । वह लाभ जो किसी को हानि पहुंचाने के बाद प्राप्त न किया गया हो । जिसमें प्रकृति एवं संपूर्ण जीव-जंतुओं की संरक्षण का ध्यान रखा गया हो वही लाभ ।
दुनिया में, व्यापारिक दृष्टिकोण से दो प्रकार के वस्तु हैै । एक वह जिसका निर्माण मनुष्य स्वयं करता है रो ( क्च्चा माल ) मेटेरियल को प्रकृति से प्राप्त करके । दूसरे वे जो प्रकृति ने स्वयं हमें दिया है । जो हमें मुफ्त में प्राप्त है । उसका व्यापार करना अनुचित है। अर्थात् जो ईश्वर की है उसे हमें दान स्वरूप देना चाहिए । उसका व्यापार उचित नहीं है। जो अमृततुल्य है जिसके बिन जिंदगी की कल्पना भी नहीं की जा सकती है । उसे भी व्यापार के अंतर्गत नहीं लाना चाहिए । हमारे द्वारा निर्मित की गई वस्तु जिसे प्रकृति से रो मटेरियल प्राप्त करने के हमने बनाया है । क्रय-विक्रय करने योग्य वही पदार्थ है । व्यापार के लिए , हम उन्हीं वस्तुओं का प्रयोग कर सकते हैं ।
भारतीय अर्थव्यवस्था में निम्नलिखित सभी चीजें व्यापार से मुक्त थी जैसे:- कृषि संबंधी कोई भी पशु, बीज, दूध, कन्या, शिक्षा, कला, जल , आग , हवा, आकाश , जमीन , प्रेम आदि ये सारी चीजें भारतीय समाज में दान की वस्तु मानी जाती थी । क्योंकि यह सारी चीजें ईश्वर से हमें प्राप्त है ।
भारतीय व्यापार व्यवस्था में किसी एक वस्तु के उत्पादन कई अलग-अलग छोटे लघु उद्योग मिलकर करते हैं । अर्थात् कई अलग-अलग लघु-उद्योगों द्वारा एक ही किसी वस्तु का निर्माण करना एकत्व ही को संकेत करता है । अर्थात् साझेदारी पर आधारित व्यापार व्यवस्था ।
साझेदारी पर आधारित व्यापार व्यवस्था में हर समुदाय अपनी अपनी जरूरतों को पूरा करता है । न की महत्वकांक्षाओं को ।
शेष क्रमशः- आगे
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9416044828
टिप्पणियाँ