लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy ( भाग-13 )
-:ओ३म्:-
"लोकतंत्र में राजतंत्र" ( भाग-13 )
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था एवं भारतीय अर्थव्यवस्था के विषय में बात करने से पूर्व कुछ और भी भारतीय सामाजिक व्यवस्था है जिस विषय में बात करना नितांत आवश्यक है ।
लेख संख्या 11 में मैं वसुधैव कुटुंबकम की चर्चा वहां कर आया हूं । मतलब संपूर्ण संसार के सभी जीव- जंतु एवं जड़-चेतन सभी पदार्थ हमारे परिवार के ही सदस्य हैं । इस वैश्विक परिवार के मूल केंद्र में हम सब को एक साथ जोड़ कर रखने वाली यह धरती है । जीवन दायनी यह धरती जीव जंतुओं के लिए अनुकूल न हो तो वसुधैव कुटुंबकम की विचारधारा पनप ही नहीं सकती ।
भारतीय सभ्यता संस्कृति में इस धरती को मां कहा क्योंकि यह हमारी सभी गलतियों को हमारे द्वारा दैनिक जीवन चर्या से फैलाए गए हर प्रकार के प्रदूषण को दूर करके हमारे लिए अनुकूल परिस्थिति पैदा करती है । साथ ही इसी के कारण हमारा जीवन संभव हो सका है । धरती अगर शुद्ध, पवित्र है तो हवा एवं जल का शुद्ध , पवित्र होना , भूमि , हवा और जल के शुद्ध पवित्र होने के कारण सूर्य के प्रकाश की गर्मी को सहन करना भी संभव हो पाया है । इसलिए धरती मां से कम नहीं है ।
प्राचीन वैदिक मान्यता को माने तो धरती के अंदर ही अमैथूनिक प्रक्रिया से युवावस्था में मानव का जन्म हुआ था । धरती सबसे प्रथम बार अपने गर्भ में हमें धारण करती है । उस नाते भी यह धरती हमारी मां है ।
यही कारण है कि भारतीय सभ्यता संस्कृति में जमीन को बेचने-खरीदने की परंपरा नहीं रही अर्थात् जमीन कभी बिकाऊ नहीं होती है । भारतीय मान्यता है कि जमीन अमृत्तुल्य है अमृत से भी बढ़ कर है । जमीन मां है । मां को बेचना खरीदना उचित नहीं है यह ईश्वर प्रदत है ईश्वर से प्राप्त वस्तु को कभी बेची और खरीदी नहीं जाती । वह अमूल्य होता है उसका हम मुल्य नहीं लगा सकते । वह केवल दान स्वरूप दी और ली जा सकती है । कोई भी व्यक्ति अपनी वस्तु को किसी को अगर दान करता है तो वह इस बात का जरूर ध्यान रखता है कि वह विचारधारा रहन-सहन एवं सभ्यता-संस्कृति के अनुकूल है अथवा नहीं । परिणाम यह हुआ कि भारतीयों के द्वारा दान स्वरूप भूमि उसी को प्राप्त हुआ जो भारतीय थे । परिणामत: भारतीय सभ्यता-संस्कृति हमेशा से सुरक्षित रही ।
जमीन के खरीदने और बेचने से राष्ट्र की सीमा कभी न बढ़ती है और न घटती है । क्योंकि खरीदने वाले और बेचने वाले सीमा के अंदर के ही लोग होते हैं । हाँ टैक्स के रूप में सरकार के पास रेवेन्यू इकट्ठा होता है । इस कानून के कारण भारत में हिंदुओं का जमीन बहुत तेजी बाहर से आए हुए लोगों के पास जैसे मुस्लिम, ईसाई, विदेशी कंपनी, सरकारी संस्थाओं के पास जा रहा हैं । जमीन की खरीद-बिक्री के कारण ही कोर्ट कचहरी में बहुत ज्यादा मुकदमा, जमीन के कारण क्राइम, भ्रष्टाचार, परिवारिक संबंधों का कमजोर होना, रिश्तेदारी में दरार पड़ना आदि उत्पन्न हो रहे हैं । बहुत सारे लोग जमीनों को खरीद के परती छोड़ देते हैं । उस जमीन का कोई भी सदुपयोग नहीं हो पाता है । जमीन की खरीद-बिक्री के कारण ही अपने भी दुश्मन, दोस्त भी शत्रु बन जाता है । इस कानून के कारण ही कुछ लोग देश में दिन-प्रतिदिन गरीब और गरीब होते जा रहे हैं और कुछ लोगों की अमीरी दिन-प्रतिदिन और बढ़ती जा रही है । मतलब सामाजिक असमानता का सबसे बड़ा कारण है । जमीन खरीदने के लिए लोग अपने घर का सोना बेच देते हैं । गांव का जमीन बेचकर लोग शहर में जमीन खरीदते हैं । जमीन खरीदने के लिए लोग सोना गिरवी रखकर शहर का जमीन खरीदते हैं । परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे देश का सोना देश से बाहर जा रहा है । लोगों के पास सोना खरीद कर रखने की परंपरा कम हो रही है । जब देश में आम जनता के पास और सरकार के पास सोना बढ़ता जाता है तो देश की आर्थिक स्थिति और देश की मुद्रा का वैल्यू अंतरराष्ट्रीय मार्केट में बढ़ता है । अगर जमीन खरीदने-बेचने की परंपरा समाप्त हो जाए तो लोग अधिक से अधिक धन कमा कर उससे सोना ही खरीदेंगे । जब देश में अधिक से अधिक सोना इकट्ठा होने लगेगा । देश में सोना बढे़गा तो देश की आर्थिक मुद्रा का वैल्यू अंतरराष्ट्रीय मार्केट में बढ़ता जाएगा और देश की सारी स्थिति अच्छी हो जाएगी । आप अपना बहुत कम मुद्रा खर्च करके बाहर से बहुत अधिक संसाधनों को खरीद सकते हैं और बाहर वाले बहुत अधिक मुद्रा देकर ही आपके यहां के कुछ संसाधन खरीद सकेंगे । जब आपके मुद्रा का वैल्यु अंतरराष्ट्रीय मार्केट में बहुत अधिक हो जाएगा तो आप टैक्स फ्री काम कर सकते हैं । टैक्स फ्री करने पर दुनिया के विभिन्न देशों को आपसे व्यापार करना आसान हो जाएगा और तब आपके पास किसी प्रकार के कोई संसाधन का अभाव नहीं होगा । चहुमुखी विकास के सारे मार्ग खुलेंगे ।
अब राष्ट्रीय स्तर पर आप अगर ध्यान दें तो किसी भी सभ्यता-संस्कृति का विकास किसी खास नदी के किनारे होती है । वह नदी व्यापार का, सिंचाई का, स्थाई जीवन जीने का मुख्य स्रोत एवं साधन बनती है । नदी के कारण ही भुमि का समतीलीकरण संभव हो पाता है । समतल भूमि होने के कारण उपजाऊ, कृषि योग्य भूमि, सिंचाई , यातायात आदि विभिन्न कई प्रकार के कार्य आसानी से संभव हो पाते हैं । नदियों से विभिन्न प्रकार के नहरों का संचालन, बिजली उत्पादन आदि संभव है । पहाड़ों से आ रही नदियों का जल विभिन्न प्रकार के जंगलों एवं पत्थरों से टकराती हुई, दिन में सूर्य के प्रकाश एवं रात्रि में चंद्र के प्रकाश , रातों-दिन पवन के स्पर्श से शोधित होती हुई । हमें प्राप्त होती है । नदी के इस जल में घंटों उछल-कूद करते हुए स्नान करने से विभिन्न प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं । कारण यही रहा है कि हमारे यहां कार्तिक स्नान आदि की परंपरा बनाई गई और कहा गया आकाश में नक्षत्रों के उपस्थिति अर्थात् ब्रह्म मुहूर्त में जाकर नदियों में स्नान करें । ताकि उन नक्षत्रों के प्रकाश से भी शोधित जल हमारे लिए लाभकारी हो पाए । धार्मिक बहाना लगाया गया । लड़कियां अगर कार्तिक स्नान करेंगी तो उन्हें सुंदर वर प्राप्त होगा । समाज में कहा गया कि नदियों में नहाने से पाप धुल जाते हैं । अर्थात् शरीर के रोगों से हम मुक्त हो जाते हैं । यही कारण रहा कि भारतीय सभ्यता-संस्कृति में हमने नदियों को मां कहा । व्यापार का मूल स्रोत होने के कारण से यह नदियां समाज के विभिन्न वर्गों को आपस में जोड़ती थी ।
आचार्य एवं पुरोहित समाज के ये ऐसे तो व्यक्ति होते हैं जो समाज के प्रत्येक वर्ग से किसी न किसी रूप में जुड़े होते हैं । आचार्य के पास समाज के प्रत्येक वर्ग के विद्यार्थी अध्ययन-अध्यापन के लिए आते हैं । अब यह आचार्य के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपने विद्यार्थी को किस मार्ग की ओर प्रशस्त करता है । आचार्य ही भविष्य- दृष्टा होते है । वह वर्तमान को देखकर भविष्य का आकलन कर सकता है । प्रयल और सृजन आचार्य के गर्भ में ही पलती है । समाज के द्वीज वर्ग का जन्म आचार्य के गर्भ से ही होता है । आचार्य के दिल-दिमाग में हमेशा राष्ट्र स्वार्थ की भावना पनपती रहती है । व्यक्तिगत स्वार्थ के प्रति आचार्य कभी भी लोभी नहीं होते है । महाभारत कि एक घटना सर्वविदित है । अक्सर लोग यह प्रश्न किया करते हैं कि द्रोणाचार्य एकलव्य के अंगूठा को दक्षिणा में मांग लिये । ताकि अर्जुन का कोई प्रतिद्वंदी खड़ा न हो सके ।
रहस्यमई और गूढ़ विद्या उसी व्यक्ति को देना चाहिए जो उस विद्या को प्राप्त करने के बाद राष्ट्रीय हित और समाज कल्याण हेतु उस विद्या का प्रयोग करें । एकलव्य जीवन भर जरासंध की सेना में रहकर जरासंध की सहायता करता रहा और जरासंध के विषय में हमें पता है कि जरासंध विभिन्न राजाओं को बंदी बनाकर उनके राज्य को हड़प लिया था । उसने अपने दोनों बेटियों का विवाह मथुरा के राजकुमार कंस से किया था और कंस एक अत्याचारी राजा था । अब आप एक बात बताएं अगर एकलव्य को आचार्य द्रोण ज्ञान दिए होते तो यह बात तो बिल्कुल सही है कि एकलव्य कभी भी दुर्योधन का ही पक्ष लेता पांडवों के पक्ष में कभी भी युद्ध नहीं करता । आचार्य के लिए दुर्योधन तो मजबूरी था ।
विद्या देने से पूर्व व्यक्ति का संस्कार एवं आचरण का परख अवश्य ही कर लेना चाहिए अन्यथा उस विद्या का वह दुरुपयोग ही करेगा । वर्तमान में आज बहुत लोग संगीत सीख रहे हैं लेकिन उस संगीत का प्रयोग वह किस लिए कर रहे हैं यह सबको पता है । समाज में संगीत के माध्यम से कितनी अभद्रता परोसी जा रही है यह सबको पता है । भारतीय समाज में संगीत का प्रयोग युद्ध से आने वाले युद्ध कर्मियों के लिए तनाव से दूर करने हेतु एवं मोक्ष प्राप्ति हेतु , भक्ति रस में ईश्वर की उपासना करने हेतु की जाती थी । पर वर्तमान में संगीत कामवासना को बढ़ाने का एक अच्छा माध्यम एवं एक बहुत अच्छा व्यापार का मार्ग बना हुआ है ।
जब संस्कार हिनों के पास विद्या जाती है तो उसका यही परिणाम भुगतना पड़ता है ।
मैं यह नहीं जानता कि एकलव्य के अंदर क्या ऐसी कमी रही होगी । लेकिन कुछ न कुछ कमी तो रही ही होगी जिसके कारण आचार्य द्रोण उन्हें शिक्षा नहीं दिए और दक्षिणा स्वरूप उन्होंने उनका आंगुठा मांग लिया । परंतु फिर भी आचार्य द्रोण आज तक इस विषय को लेकर चर्चा में है । पर एकलव्य जीवन भर जरासंध के साथ मिलकर युद्ध करता रहा । इस विषय को हम नहीं जानना चाहते ।
आचार्यों के पास यह एक बहुत बड़ी समस्या होती है उनके लिए कि वह किनको ज्ञान दे , न दें । प्राचीन समय में ज्ञान का केंद्र गुरुकुल हुआ करता था । गुरुकुल में आचार्य अपने विद्यार्थी से बहुत अधिक सेवा कार्य लिया करते थे ताकी पता लगाया जा सके कि विद्यार्थी ज्ञान पाने हेतु कितना जिज्ञषु है । कुछ विद्यार्थी आधा अधूरा सेवा कार्य छोड़ कर गुरुकुल त्याग देते थे । मतलब वह ज्ञान रूपी हीरा को रखने योग्य नहीं है अभी । ऐसे विद्यार्थी ज्ञान को पाने के बाद धन अर्जन में ही लगे रहते हैं और समाज के कल्याण एवं राष्ट्रीय हित आदि विषयों पर विचार बिल्कुल नहीं करते हैं ।
वर्तमान में आप देख लें जितने बड़े-बड़े घोटाला यह जितने बड़ा बड़ा भ्रष्टाचार होते है । वह सब पढ़े लिखे लोग ही करते हैं अनपढ़ गवार उतना कभी नहीं कर सकता । यह सब इसलिए हो पाया है कि हमने योग्य व्यक्ति को चुनकर के ज्ञान नहीं दिया । गुरुकुलों में प्रकृति सेवा के पश्चात ही प्रकृति संबंधी विषयों को ज्ञान स्वरूप दी जाती थी । आज विद्यालय में झाड़ू लगाने के लिए भी आदमी रखे जाते हैं । शिक्षक को पानी पिलाने वाला भी दूसरा कोई व्यक्ति होता है । विद्यार्थी पानी भी नहीं पिलाते है ।
मतलब यह है कि ज्ञान एक अमूल्य हीरा है इसे अमूल्य तिजोरी में ही रखना चाहिए ।
आज इस हीरा को हम पैसा के बल पर किसी से भी बांट लेते हैं परिणाम स्वरूप देश, राष्ट्र, समाज एवं प्रकृति का दुर्दशा हो गया है।
इसलिए आचार्य बनाना, आचार्य बनकर विद्या का संरक्षण करना एवं विद्या का संरक्षण करके उचित विद्यार्थियों को वह विद्या देना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है ।
ध्यान रखें सत्यनारायण व्रत कथा के बाद प्राप्त प्रसाद को हम उसी को देते हैं जिसका हाथ साफ हो या उसका पात्र साफ-सुथरा हो । अन्यथा प्रसाद दूषित हो जाती है । ज्ञान में रावण राम जी से कम नहीं था पर राम जी के पास जो संस्कार थे वह संस्कार रावण के पास नहीं था ।
आचार्य से प्राप्त ज्ञान को अपने व्यवहारिक जीवन में, समाज में, सभ्यता संस्कृति में, परंपराओं में, सामाजिक पद्धतियों में, लोकगीतों में, कविताओं में, कथाओं में, धार्मिक मान्यताओं में प्रवेश कराने का कार्य पुरोहित का होता है । आचार्य के बाद पुरोहित का ही समाज के प्रत्येक घरों के आंगन तक उनका पैठ होता है । पुरोहित वह है जो बिन बताए समाज के हित एवं राष्ट्र के हित में अपनी पूर्णाहुति देने के लिए हमेशा तत्पर रहते है ।
शेष क्रमशः- आगे
उत्तम प्रकाश
वैदिक सुप्रभात
94 16044 828
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