लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy (भाग-14)
-:ओ३म्:-
लोकतंत्र में राजतंत्र ( भाग 14 )
आचार्य से प्राप्त ज्ञान को अपने व्यवहारिक जीवन में, समाज में, सभ्यता संस्कृति में, परंपराओं में, सामाजिक पद्धतियों में, लोकगीतों में, कविताओं में, कथाओं में, धार्मिक मान्यताओं में प्रवेश कराने का कार्य पुरोहित का होता है । आचार्य के बाद पुरोहित का ही समाज के प्रत्येक घरों के आंगन तक उनका पैठ होता है । पुरोहित वह है जो बिन बताए समाज के हित एवं राष्ट्र के कल्याण में अपनी पूर्णाहुति देने के लिए हमेशा तत्पर रहते है ।
आर्थिक, प्राकृतिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक एवं सभ्यता-सांस्कृतिक रूप से संपन्न भारत में अपना साम्राज्य एवं उपनिवेश स्थापित करने हेतु विभिन्न अलग-अलग समय पर विदेशी आक्रांता व्यापार के माध्यम से आते रहे । उन्होंने यह चाहा कि हम इस देश की सभ्यता- संस्कृति को शिक्षा एवं वैज्ञानिक पद्धतियों को सामाजिक परंपरा, मौलिक मान्यताओं को ध्वस्त कर दें ताकि ये पूर्ण रूप से हमारे अधिनस्त हो जाए ।
पर हमारे समाज के पुरोहित वर्ग का ही यह देन है की आज भी हम अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक गौरव को शान से जिंदा रखे हुए हैं । आज भी हमारे देश में हम तुलसी, पीपल, बरगद, केला, नीम आदि अनेक पेड़-पौधो की पूजा करते हैं । कार्तिक मास में कार्तिक स्नान करते हैं । पर्व, त्यौहार, व्रतादी सब हम नियमित रूप से करते हैं । आज भी हमारे देश में आम जनता गौ सेवा करती है । आज भी अपने देश में एक पिता अपनी बेटी को बहुत अच्छे से पढ़ा लिखा कर धूमधाम से बैंड बाजा बाराती के साथ विदाई करता है । बच्चे अपने माता-पिता व गुरुजनों का चरण स्पर्श करते हैं । मौली, तिलक, जनेऊ, रक्षासूत्र, मंगलसूत्रादि हम धारण करते हैं । आज भी अपने देश में चारों वेदों को याद करने वाले चतुर्वेदी, तीन वेदों को, दो वेदों को, याद करने वाले त्रिवेदी एवं द्विवेदी परंपरा से अपने ज्ञान परंपरा को जीवित रखे हुए हैं । हमारे देश भारत में परंपरा से आज भी वेद, दर्शन, उपनिषद, पुराण, कर्मकांड, अष्टाध्यायी, व्याकरण, निगंठु, आयुर्वेद, योगादि विभिन्न विद्यायें आज भी जीवित है । आज भी हम अपने देश में अपने राजा, महाराजाओं को, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी को, योगीराज श्री कृष्णचंद जी को, विक्रमादित्य को, मारवाड़ी समाज, वैश्य समाज, ब्राह्मण समाज, वरणवाल समाज याद करती है । उनका जन्मदिन मनाती है । उनका बरखि बनाती है ।
यह सब कुछ आज भी हमारे देश में जीवित है अनाधून हम अंग्रेजी एवं पश्चिमी सभ्यता की ओर भागते हुए भी इन सभी चीजों को हम जीवित रखे हुए हैं यह सब कुछ पुरोहित समाज के त्याग और तपस्या का ही फल है ।
1857 के युद्ध के बाद इंडियन एजुकेशन एक्ट अंग्रेजी सरकार लागू करके भारतीय गुरुकुलिय शिक्षा पद्धति को ध्वस्त करने हेतु पुरजोर परिश्रम किया । ताकि ब्राह्मण एवं इस पुरोहित समाज को पूर्ण रूप से ध्वस्त कर दी जाए । पर पारंपरिक एवं पैतृक रूप से प्राप्त इस ज्ञान की धरोहर को पुरोहित समाज परंपरा से जीवित रखी और भारतीय समाज को बाहर से आई हुई विभिन्न आयातित प्रश्नों एवं कुतर्कों से बौद्धिक युद्ध करते हुए कथा, कहानी, गीत, संगीत, योग, यज्ञ, हवन आदि कराती हुई इस माध्यम से भारतीय सभ्यता-संस्कृति को जीवित रखी ।
भारतीय समाज में अगर विवाह होता है तो उस विवाह को संपन्न करने के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग का अपना-अपना कुछ आंशिक सहयोग लेना पड़ता है अर्थात् समाज का प्रत्येक वर्ग एक दूसरे पर आश्रित है । विवाह में पंडित, नाई, डोम, माली, कुम्हार, बढ़ई, पनिहारी, पंसारी, पटवारी, हलवाई, तेली, धोबी, तुरहा, स्वर्णकार, लोहार आदि अनेक वर्गों का सहयोग मिलता है तब जाकर शादी संपन्न हो पाती है मतलब इन सबों का एक साथ आशीर्वाद जरूरी है । यह पुरोहित वर्ग ही है जो हमें बताती है कि समाज के प्रत्येक वर्ग का अपने आप में संपन्न होना जरूरी है ताकि हमारा प्रत्येक कार्य सुचारू रूप से संचालित हो पाए ।
पुरोहित एवं आचार्य भारतीय सभ्यता-संस्कृति के ऋण है । जो समाज के प्रत्येक वर्ग को आपस में जोड़कर उनको दिशानिर्देश करते हुए देश के भविष्य को संभाल कर रखते हैं ।
विदेशी अंग्रेजी शासकों को यह पता था । अगर भारत में अपना उपनिवेश और साम्राज्य स्थापित करना है एवं भारतीय प्राकृतिक संपदा को लूटना है । तो सबसे सरल और आसान मार्ग यही है कि यहां के आचार्यों और पुरोहितों को उनको अपने मार्ग से विमुख करने के लिए उन्हें सबसे पहले बेरोजगार करना होगा । बेरोजगार आदमी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए रोजगार के पीछे भागता है । रोजगार न मिले तो उसे पाने के लिए वह धीरे-धीरे भ्रष्ट हो जाता है । भ्रष्ट आचार्य एवं पुरोहित राष्ट्र को उस मार्ग पर ले चलेंगे जिस मार्ग पर हम उन्हें ले जाना चाहते हैं ।
आचार्यों की पूरी जिंदगी गुरुकुलो एवं यज्ञ से प्राप्त दान पर पुरोहितों की जिंदगी टिकी हुई थी । जो अमूल्य था । अंग्रेजों ने गुरुकुलों में दी जाने वाली शिक्षा व्यवस्था को अवैध घोषित करके आचार्यों को बेरोजगार बनाया । बहुत ज्यादा अत्यंत कर लगाकर भारतीय जनता को बेरोजगार किया । भारतीय पैतृक ज्ञान जो जातिगत रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाकर रोजगार का मुख्य केंद्र होता था । उसे अंग्रेजों ने ध्वस्त किया और इन सभी कारीगरी को इंजीनियरिंग से जोड़कर के कॉलेज के माध्यम से देना प्रारंभ किया था । ताकी अंग्रेजों को अधिक से अधिक पैसा मिल सके । इन सभी विद्याओं को अंग्रेजी माध्यम से दी जाने लगी है । भारतीय संपूर्ण प्राकृतिक संपदा को सरकारी घोषित की गई । अंग्रेजी माध्यम से पढ़ के आए हुए विद्यार्थियों के लिए यज्ञ से संबंधित संपूर्ण पूजा पद्धतियों में उन्हें अंधविश्वास दिखने लगा । पढ़े-लिखे ब्राह्मण समुदाय में धीरे-धीरे छुआछूत की भावनाएं पैदा की गई । परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे पारंपरिक रूप से तैयार पुरोहित भ्रष्ट होने लगे और यज्ञ की विभिन्न पद्धतियों को रोजगार का मुख्य साधन बनाया । पुजा पद्धतियों के प्रति धीरे-धीरे भारतीय समाज उदासीन होने लगी ।
लेकिन पुरोहित समाज के ही बहुत सारे पुरोहित आधुनिक विज्ञान को पढ़ कर यज्ञ के वैज्ञानिक स्वरूप को समाज के सामने लाने लगे तो धीरे-धीरे वर्तमान स्थिति ठीक है । जिसमें आर्य समाज का बहुत बड़ा योगदान रहा ।
विभिन्न परिस्थितियों से भारतीय सभ्यता-संस्कृति के गुजरने के बाद भी आज भारतीय समाज में जो भी हम धार्मिक कृत्य करते हैं एवं उसे मानते हैं । आज जिस रूप में भी हमारी पारिवारिक व्यवस्था जीवित है । इसका पूरा का पूरा श्रेय भारतीय आचार्यो एवं पुरोहितों को ही जाता है ।
भारतीय सभ्यता-संस्कृति की सबसे मूल और एकल इकाई भारत की पारिवारिक व्यवस्था है । वसुधैव कुटुंबकम की परंपरा उसका महत्व एवं उसका विस्तृत स्वरुप तो मैं पीछे बता ही आया हूं । अब मानवीय सामाजिक व्यक्तिगत परिवार की चर्चा कर लेते हैं ।
किसी भी गाड़ी के पहिए को आप ध्यान से देखें । उस पहिए के बीच में एक धूरा होता है । जिससे अनेकों आरे जुड़े होते हैं । उन आरो से एक गोलाकार संरचना लिए हुए आकृति जुड़ी हुई होती है । यह सब आपस में मिलकर पहिया कहलाते है । वह गोलाकार आकृति अपने आरों के सहारे धुरी पर टिका होता है ।
1 पहिया में जो महत्व धुरी का होता है । ठीक वही महत्व एक महिला का अपने परिवार में होता है । यही कारण है कि भारतीय परिवारिक व्यवस्था में जब पत्नी का देहांत हो जाता है । तो पति को विधुर कहते हैं । अर्थात् जो अपने धुरी से विमुख हो गया है । अगर पहिए से धुरी को हटा दे तो पहिया को भी विखरने में समय नहीं लगता और आप एक कदम भी नहीं चल सकते । ठीक उसी प्रकार परिवार में भी होता है । अगर परिवार में महिला न रहे तो परिवार के अन्य सभी सदस्यों को बिखरने में समय नहीं लगता ।
परिवार में महिला वह है जो सबको आपस में बांध कर रखती है । बेटा, बेटी, पति, देवर देवरानी, जेठ, जेठानी, सास - स्वसुर , रिश्तेदार सबकी सुनती है । सबका मानती है । सबकी जरूरतों को पूरा करती है और अपनी इच्छाओं का त्याग भी करती है । यह महिला का जेनेटिक स्वभाव है , अनुवांशिक गुण है ।
अब इसे थोड़ा समझने की कोशिश करें । संपूर्ण संसार को अगर आप ध्यान से देखें तो यह संसार दो ही प्रकार की वस्तुओं से मिलकर बना हुआ है । पहली वस्तु वह है जो शुष्क है, हल्का है, प्रकाश युक्त कणों से मिलकर बना है , जिसका ग्रहणीये स्वभाव है । स्वभावतः जिसके अंदर त्यागने की प्रवृत्ति कम और लेने की प्रवृत्ति अधिक होती है । अब मैं आपको उदाहरण से समझाता हूं जैसे अग्नि, अग्नि का स्वभाव लेना है यह दुनिया की संपूर्ण वस्तुओं को खा लेगी फिर भी उसका पेट नहीं भरेगा । उसी प्रकार समुंद्र, समुंद्र भी दुनिया के संपूर्ण नदियों को पी लेगा लेकिन फिर भी उसका पेट नहीं भरने वाला । उसी प्रकार मन जब तक यह ज्ञान से तृप्त नहीं होता । तब तक यह संतुष्ट नहीं हो सकता मन की महत्वकांक्षाएं कभी कम नहीं होती । अब आप मानव शरीर में गर्दन से ऊपर के अंगों को ध्यान से देखें । यह सभी प्रकाश युक्त कणों से मिलकर बनी हुई हैं । बाहर से चीजों को ग्रहण करती हैं । जैसे आंखें रूप को ग्रहण करती है । नासिका गंध को ग्रहण करती है । कर्ण शब्द को ग्रहण करता है । जीव्हा रसना को ग्रहण करती है । अर्थात् ज्ञान इंद्रियों के माध्यम से हम बाहर से सूचनाओं को लेकर हर पल हृदय रूपी यज्ञ कुंड में आहुति देते रहते हैं । अब अगर आहुती ही गलत पड़ा हो तो उसकी सुगंधी समाज में कैसी फैले गी । हृदय रूपी यज्ञकुंड से उत्पन्न सुगंधि ही आपके यश-अपयश का कारण समाज में बनती हैं ।
मुझे कई बार ऐसा लगता है कि धनुष की कल्पना आदमी के ओंठों से ही की गई होगी । आप ओंठ की बनी हुई संरचना को ध्यान से देखें ऊपर और नीचे की जो संरचना है । वह बिल्कुल धनुष के जैसा ही होता है । धनुष में तीर लगता है और वह सीधे सामने की ओर जाता है पर मानव के इस ओंठरूपी धनुष में लगा तीर आगे पीछे दोनों तरफ चलता है । इन तीरों के माध्यम से अगर मांस, मछली, अंडा आदि अभद्र पदार्थों को खाएंगे तो उससे विचार और मन कैसे शुद्ध और पवित्र हो सकता है ।
अब मूल बिंदु, विषय पर आते हैं दूसरी वस्तु-जो स्वभाव से अंधकार युक्त कोणों से, स्वभाव से भारी, जिसका स्वभाव त्यागना है । जिसके अंदर त्यागने की प्रवृत्ति हो ।
अब इसी बात को रसायन शास्त्र की दृष्टि से समझने की कोशिश करते हैं । आवर्त सारणी को आप ध्यान से देखें उसमें दो प्रकार के तत्व पाए जाते हैं एक वह जिन का स्वभाव बाहर से इलेक्ट्रॉन को लेना है और दूसरे वे तत्व जिन का स्वभाव इलेक्ट्रॉन को त्यागने का है । पी ब्लॉक के जितने भी तत्व है वह बाहर से इलेक्ट्रॉन को ग्रहण कर हाइलोजन ग्रुप के तत्व के गुण को प्राप्त करना चाहते हैं । अर्थात् अपने बाहरी कक्ष में आठ इलेक्ट्रॉन को सम्मिलित करना चाहते हैं । ताकि उनके बाहरी कक्ष का अष्टक पूरा हो सके । ठीक उसी प्रकार एस ब्लॉक के तत्व जिनके बाहरी कक्ष में 8 से अधिक इलेक्ट्रॉन होते हैं । वे अपने इलेक्ट्रॉनों का त्याग करके अपने बाहरी कक्ष में अष्टक पूरा करना चाहते हैं अर्थात् तत्वों के इस त्याग ने और ग्रहण करने की प्रवृत्ति के कारण ही नए योगिक बनते हैं । जिससे यह संपूर्ण संसार बनी हुई है । इस प्रकार यौगीको का निर्माण होता है । ठीक उसी प्रकार पुरुष के अंदर बाहर से ग्रहण करने की प्रवृत्ति और महिला के अंदर स्वयं से त्यागने की प्रवृत्ति होती है । परिणाम स्वरूप महिला अपने परिवार की खुशी के लिए, परिवार की शांति-अमन के लिए त्यागने की प्रवृत्ति होती है । अपने बेटा और पति के लिए सब कुछ त्यागने को तैयार होती है ।
शेष क्रमशः आगे
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
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