संबंध
"संबंध"
भाग-1
संबंध या रिस्ते तीन प्रकार के होते हैं। आत्मा का , मन का और शरीर का (रक्त का ) । आत्मीय संबंध सबसे सूक्ष्म है, उससे ज्यादा स्थुल संबंध मन का और सबसे ज्यादा स्थुल संबंध शरीर का होता है । सामान्य तौर पर हमें यह पता है कि सूक्ष्म पदार्थ अधिक शक्तिशाली होता है स्थूल पदार्थ के तुलना में । अर्थात आत्मीय संबंध सबसे ज्यादा मजबूत होता है उससे कम मजबूत मन का और उससे भी कम मजबूत शरीर का संबंध होता है । इन तीनों संबंधों के बीच का धागा प्रेम वाला होना चाहिए जो ईर्ष्या और द्वेष से परे हो । इन संबंधों के बीच लगी हुई गाँठ न्याय के आधार पर बंधी होनी चाहिए । सुचारु रुप से परिवार संचालन हेतु इन तीनों संबंधों पर विशेष रूप से ध्यान देनी चाहिए । वर्तमान समय में आज परिवार संचालन हेतु मात्र दो संबंधों पर ध्यान दिए जा रहे हैं प्रथम शारीरिक (रक्त का ) संबंध और दूसरा पैसों पर आधारित संबंध । जो केवल और केवल स्वार्थ पर आधारित है । आज इन संबंधों के लिए नए शब्द ढूंढ लिए गए हैं प्रोफेशनल रिलेशनशिप । और बहुत ही आसानी से इन शब्दों को व्यवहार में लाया जा रहा है । जो संबंधों की गांठ को दिन-प्रतिदिन ढ़ीला कर रहा है । गजब की शिक्षा नीति हमारे देश में है रसायन शास्त्र केमिस्ट्री में हम तीन प्रकार के बौन्ड बंधन पढ़ते हैं । संयोजी बंधन (कोवैलेट बॉन्ड) आयनिक बंधन (इलेक्ट्रोवेलेंट बॉन्ड) और सह संयोजी बंधन (कोऑर्डिनेट बॉन्ड) । संयोजी बंधन एटम के बीच इलेक्ट्रॉन का आपस में गठबंधन बराबर बराबर होता है इलेक्ट्रॉन बराबर बराबर लेनदेन की जाती है जैसे :- o2 के बीच का बंधन । समाज में देखे तो पति पत्नी के बीच का संबंध । आयनिक बंधन इसके अंतर्गत एटम अपने इलेक्ट्रॉन को त्याग देता है और दूसरा एटम इलेक्ट्रॉन को प्राप्त करता है । इसमें एक देता है और दूसरा ग्रहण करता है इस प्रकार के बंधन को आयनिक बंधन कहा जाता है । समाज में देखें तो गुरु शिष्य और माता पिता का बच्चों के साथ संबंध जिसमें एक देता है और दूसरा सहर्ष उसको स्वीकार कर लेता है जो भी प्राप्त हो । तीसरा वह बंधन मित्रों के बीच होता है कोऑर्डिनेट बॉन्ड एक एटम अपने कई इलेक्ट्रॉनों को कई अलग अलग एटम को देता है और उन से गठबंधन कर लेता है । इन्हीं संबंधों को समझने के लिए तीन धागों से बने हुए उपनयन भारतीय संस्कृति में ग्रहण करते हैं ।
भारतीय परंपराओं में प्रत्येक संबंधों को जोड़ने के लिए धागों का प्रयोग किये जाते है । किसी भी बंधन के बीच में यह धागे जरूर ही आते हैं । जैसे उदाहरण के तौर पति-पत्नी के बीच "मंगलसूत्र",आचार्य और शिष्यों के बीच "उपनयनसूत्र ", भाई-बहन के बीच "रक्षासूत्र " और यजमान एवं पुरोहित के बीच "कलावा" । बांधे जाते हैं । एक घटना आपको पता ही होगा । जब रामायण काल में आदित्य ब्रहमचारी हनुमान जी को जनेऊ के बहाने ही बांध लिया गया ।
कुछ साल पहले तक भारतीयों के लिए यह पहेली ही बना रहा कि आखिर क्यों धागों को ही संबंधों के बीच का जोड़ माना जाता है । यह एक पहेली ही रहा कि हमारे देश में या परंपराओं में आखिर संबंधों के बीच गांठें क्यों बांधे जाते हैं । आखिर इस प्रकार की परंपराएं हमारे देश में क्यों प्रारंभ हुई या मनीषियों ने क्या सोच कर के इसे प्रारंभ किया ।
अब आधुनिक , वर्तमान की कुछ अनुसंधान से यह बात स्पष्ट हो रही है ।
अगर आप ध्यान दें तो आपको पता होगा कि जंतु कोशिका या प्लांट कोशिका के मध्य में एक तालाब की तरह स्ट्रक्चर होता है । जिसको केंद्रिका कहते हैं । उस केंद्रिका में गुणसूत्र होता है और अब मैं आपको बताऊं उस गुणसूत्र की संरचना बिल्कुल डबल हेलीकल धागों की तरह ही होता है । बिल्कुल धागे की तरह माता-पिता के शरीर के युग्मक कोशिका, अण्ड (ऐग) और शुक्राणु ( स्पर्म ) ही आपस में मिलते हैं । इन दोनों कोशिकाओं के बीच ये धागों जैसा स्ट्रक्चर डीएनए ही आपस में मिलकर नए गुणसूत्र तैयार करते हैं । जब कोशिका के इंटरफेज में आप ध्यान से देखेंगे तो उसके अंदर उपस्थित जो गुणसूत्र का स्वरूप होता है उसको क्रोमेटीन कहते हैं । जो बिल्कुल धागे की तरह ही होता है ।
हमारे यहां के लोगों को अर्थात हमारे ऋषि-मुनियों को गुणसूत्र के विषय में कुछ तो पता रहा ही होगा । जिसके कारण से हमारे यहां परंपराओं में धागों का महत्व पर्व , त्योहारों और पुजा पाठों में गांठों का बंधन और विवाह से पुर्व गोत्र का ध्यान रखा जाता रहा । जिससे अगली पीढ़ी स्वस्थ , सुंदर , बुद्धिमान, तेजस्वी ,शान्तप्रिये एवं धैर्यवान हो ।
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9416044828
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