लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy भाग 15
-:ओ३म्:-
लोकतंत्र में राजतंत्र (भाग 15)
ठीक उसी प्रकार पुरुष के अंदर बाहर से ग्रहण करने की प्रवृत्ति और महिला के अंदर स्वयं से त्यागने की प्रवृत्ति होती है । परिणाम स्वरूप महिला में अपने परिवार की खुशी के लिए, परिवार की शांति-अमन के लिए त्यागने की प्रवृत्ति होती है । अपने बेटा और पति के लिए सब कुछ त्यागने को तैयार होती है ।
आईये महिलाओं को समझते हैं । हालांकि इन्हें समझ पाना थोड़ा कठीन है । फिर भी मैं अपनी ओर से कोशिश करता हूं । भारतीय अध्यात्मिक दर्शनों के अनुसार प्रत्येक जीव अपने कर्मानुकूल अपनी योनि को प्राप्त करता है ।
दो प्रकार की जीव पूरे संसार में , आपको दिखाई देंगे एक वह जो स्वपोषी ( औटोट्रौप्स ) होते हैं । अपना भोजन स्वयं सूर्य के प्रकाश से फोटाॅन ,वायुमंडल से ऑक्सीजन और जमीन से जल एवं पोषक तत्व प्राप्त करके बना लेते हैं । जिन्हें हम प्लांट किंगडम कहते है । पेड़-पौधा, यह जीवों का वह स्वरुप है । जिनके पास तंत्रिका तंत्र नहीं होता । सोचने समझने के लिए किसी भी प्रकार का तंत्र या क्रियात्मक प्रतिक्रिया देने का कोई तंत्र नहीं होता है। ब्रेन यहां नहीं होता है । अध्यात्मिक दृष्टिकोण से कहें तो 5 कोषो में केवल इनके पास अन्नमय और प्राणमय कोष ही होता है । परिणामतः इन्हें सुख-दुख की अनुभूति नहीं होती है । इनके शरीर का मुख्य भाग "जड़" जमीन के अंदर स्थित होता है । उसकी प्रवृति सुर्य के प्रकाश से दूर , अंधकार की ओर जाना है प्ररिणामतः ईश्वर ने उन्हें तंत्रिका तंत्र , नर्वर सिस्टम दिया ही नहीं है ।
दूसरे वें जीव जो परपोषी है, हेटेरोट्रौप्स वे जो अपना भोजन खुद नहीं बनाते , भोजन को प्राप्त करने के लिए दूसरे जीवों पर या फिर पौधों पर निर्भर रहते हैं । इनको भी आप दो भागों में बांट सकते हैं । एक तो वह जिनके शरीर का आकार क्षैतिज और दूसरे वे जिनके शरीर वर्टिकल होता है । ऊर्ध्वाधर (Vertical-खडा़) जीवों में केवल मनुष्य और क्षैतिज में अन्य सभी जीव-जंतु आते है ।
क्षैतिज(Horizontal) शरीर वाले सभी जीव अद्ध्यात्मिक रुप से अन्नमय, प्राणमय और मनमय कोष वाले होते हैं ।
जिनमें तंत्रिका तंत्र होता है । मस्तिक्ष आगे और शरीर का शेष भाग पीछे होता है । जैसे- सभी जलचर,थलचर, भूमी में रहने वाले एवं नभचर इनमें मनुस्य को छोड़कर । चुकी इन सभी जीवों के शरीर का आकार क्षैतिज है । परिणामतः इनके शरीर का अग्र भाग जमीन के अंदर धंसा हुआ नहीं रहता । परिणामतः इनके शरीर में मस्तिक्ष, तंत्रिका तंत्र अल्प विकसित होता है । मनुस्य के तुलना में ।पर इन में भी जो निकृष्टि जीव है जैसे कीट आदि ( आर्थोपोडा फाईलम के) अंधेरे में अर्थात् जमीन के अंदर रहना पसंद करते हैं । अब अगर चेतनता की बात करे तो इन जीवो में चुकी तंत्रिका तंत्र है । इसलिए चेतनशीतलता बुद्धि, यहां उपस्थित है और फिर क्रिया-प्रतिक्रिया भी दिखाई देती है । ये सुख-दुख का अनुभव भी करते हैं पर यह चुकी भोग योनी के है और इनका मस्तिक्ष पुर्णतः ऊपर सुर्य के ओर भी नहीं होता है । इसलिए इनके बुद्धि का विकास सीमित ही हो पाता है। कुछ नैमीतिक ज्ञान इन्हें प्राप्त होता है । बहुत ज्यादा बुद्धि- विवेक का विकास नहीं होता है। उनकी बुद्धि विवेक का विकास एक सीमित क्षेत्र तक ही रह पाता है । ये सभी जीव शब्द नहीं केवल ध्वनियों को उत्पन्न कर पाते हैं । एकाद जीव को छोड़कर जैसे- तोता ।
अब बात मनुष्य की करें तो मनुष्य ऊर्ध्वाधर सूर्य की ओर खाड़ा शारीरिक संरचना वाला अध्यात्मिक दृष्टि से चार कोषों वाला है । अन्नमय , प्राणमय ,मनमय और विज्ञानमय कोष । मनुष्य उभय योनि में आता है इन्हें भोगने के साथ-साथ कर्म करने की भी पुरी स्वतंत्रता हैे । चुकी तंत्रिका तंत्र की दृष्टि से यह अत्यधिक विकसित है। यह अपने कर्मों के अनुसार अपने तंत्रिका तंत्र को बहुत असीमित विकसित भी कर सकता है । मनुस्य चाहे तो उभय योनि से केवल कर्म योनी अर्थात् आनंदमय कोष में भी जा सकता है। इनकी चेतना की कोई सीमा नहीं है। इसकी चेतना ,सीमाओं में बंधी हुई नहीं है ।
मतलब यह है कि आत्मा के लिए जो शरीर जितना ही ज्यादा अनुकूल है उस शरीर से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ प्रकृति के लिए उतना ही ज्यादा फायदेमंद नहीं है । लेकिन इस शरीर को धारण करने वाली आत्मा उतनी ही ज्यादा शुद्धि है । दूसरी ओर आत्मा के लिए जो शरीर जितना ही ज्यादा अनुकूल नहीं है । उस शरीर से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ प्रकृति के लिए उतना ही ज्यादा फायदेमंद है परंतु उस शरीर में रहने वाली आत्मा निकृष्ट कोटि की है परिणामतः उनको जो शरीर प्राप्त हुआ वह उतना ज्यादा अनुकूल नहीं है उनके लिए ।
पेड़ पौधों को प्राप्त करने वाली आत्मा सबसे निकृष्ट है तो पेड़ पौधा प्रकृति के लिए सबसे ज्यादा अनुकूल हैं ।जीव-जंतुओं के शरीर को प्राप्त करने वाली आत्मा तुलनात्मक दृष्टि से थोड़ा शुद्ध और पवित्र है परिणामतः उनको तंत्रिका तंत्र प्राप्त है वह सुख-दुख की अनुभूति करते हैं और अपने अनुकूल थोड़ा बहुत कार्य कर पाते हैं । जीव-जंतुओं का शरीर बायोडायवर्सिटी को लाभदायक अनुकूल बनाकर रखता है । मनुष्य का शरीर , मनुष्य के शरीर में रहने वाली आत्मा के लिए सबसे ज्यादा अनुकूल है परंतु उनके शरीर से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ प्रकृति के लिए बहुत ज्यादा फायदेमंद नहीं है परंतु इस शरीर में रहने वाली आत्मा बाकी अन्य से काफी ज्यादा शुद्ध और पवित्र है । इसलिए इसको ज्यादा अनुकूलता प्राप्त हुआ है । मनुष्य में भी जो महिला है । महिला का शरीर प्रकृति के लिए और ज्यादा हानिप्रद है जो दिखने में आकर्षक, सुंदर लगता है पर प्राकृतिक रूप से यह उतना ज्यादा फायदेमंद नहीं है जितना कि पेड़ पौधा प्रकृति के लिए फायदेमंद है ।
जो पदार्थ जितना ही ज्यादा शुद्ध और पवित्र हो उसके संरक्षण की उतनी ही बड़ी व्यवस्था की जाती है ।
सोना,चांदी,हीरा,मोती आदि इन सभी पदार्थों को हम तिजोरी में बहुत ही सजा के सवाँर के सुरक्षित रखते हैं और तिजोरी भी घर के मध्य के किसी कमरे में रखे जाते हैं क्योंकि यह बहुत ही ज्यादा कीमती पदार्थ है ।
परिणाम यह हुआ कि महिलाओं की रक्षा एवं संरक्षण के लिए अपने देश भारत में बहुत बड़े-बड़े युद्ध लड़े गए हैं । रावण और मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी के बीच युद्ध का मूल कारण माता सीता का अपहरण ही था । महाभारत का युद्ध द्रोपदी के अपमान के कारण हुआ था । भारतीय परंपरा में स्त्री-पुरुष के विवाह के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति की पूरी जिम्मेवारी पुरुष की ही होती है । अर्थात् पुरुषों को धनार्जन कर के परिवार का संचालन करना है और महिला को घर में रहकर पूरे परिवार का देखरेख करना है । मतलब यह है कि महिला को घर में ही रहना है और पुरुष बाहर इधर उधर भटक के धनार्जन करके परिवार का संचालन करें । धन के लिए महिला को कहीं नहीं जाना । एक महिला के लिए इससे भी बडी़ सम्मान की और क्या बात हो सकती है ।
दूसरी ओर महिला हृदय प्रधान एवं पुरुष मस्तिष्क प्रधान होतें है। देश के बाहर की सीमा की सुरक्षा अगर करनी हो तो इसके लिए दिमाग का प्रयोग करना होता है । दिल का प्रयोग करके हम बाहरी सीमा की सुरक्षा नहीं कर सकते अन्यथा जासूस देश के अंदर आकर देश की सारी व्यवस्था को तोड़ सकते है लेकिन देश के अंदर की व्यवस्था के संचालन के लिए दिल प्रधान होना अति आवश्यक है ताकि देश के अंदर जनता के बीच अराजकता न फैले । ठीक यही बात परिवार के अंदर लागु होता है। परिवार के संचालन हेतु दिमाग कम दिल ज्यादा चाहिए लेकिन परिवार के बाहर के संचालन के लिए, बाहरी व्यवस्था के लिए दिमाग का होना जरूरी है । यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में घर की अंदर की सारी व्यवस्थाओं की प्रधानता महिला को प्राप्त है और घर के बाहर की संपूर्ण व्यवस्था का दायित्व पुरुष को करनी है ।
परंतु बाहर से आयातित कुछ विचार हैं जो अपने देश में सामान्यतः कई सवाल उत्पन्न करते हैं । आजकल के तथाकथित कुछ डिग्री धारी लोग अक्सर यह कहां करते हैं कि भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज है जिसमें महिलाओं का कोई क़दर नहीं होता, महिलाएं बाहर नहीं जा सकती, पुरुषों की तरह वह घूम-फिर नहीं सकती वह नौकरी चाकरी नहीं कर सकती अतः भारतीय समाज एक रूढ़िवादी समाज है एवं पुरुष प्रधान समाज है ।
जबकि आप गौर से ध्यान दें तो आपको पता लगेगा कि भारतीय समाज महिला प्रधान समाज है जिसमें महिलाओं की बहुत बड़ी पदवी है । भारतीय समाज में धर्म एवं धर्म संबंधी संपूर्ण कार्य की जिम्मेवारी पुर्णतः महिलाओं के ऊपर ही होती है । वह धर्म और परंपरा को आगे लेकर चलती हैं कारण यही रहा कि भारत में इतना ज्यादा विदेशी आक्रमण एवं विदेशियों के आगमन के बावजूद भी धर्म संबंधी मान्यताएं एवं परंपराऐं अब-तक जीवित है और बहुत अच्छी तरह फल-फूल रही है । इसमें पूर्णत: योगदान महिला का ही है। अब आप विचार करें कि परिवार में धर्म एक सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है और उस जिम्मेदारी को पूरा करने की पूरी जिम्मेवारी महिला के ऊपर है़। व्यक्ति के जीवन का सबसे मूल भाग उसका धर्म है और धर्म की अधिष्ठाता महिला को बना रखा है तो यह कैसे कह सकते हैं कि महिला प्रधान समाज नहीं है यह केवल पुरुष प्रधान है ?
हां आप एक चीज जरूर अनुभव किए होंगे कि भारतीय सामाजिक व्यवस्था में महिलाएं पुरुष के अनुसार इधर-उधर घूम नहीं सकती हैं । अन्यत्र इधर-उधर नहीं जा सकती हैं पिछले कुछ वर्षों में आपने यह भी अनुभव किया होगा कि लोग लड़कियों की पढ़ाई पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं देते थे । अल्पायु में ही उनकी शिक्षा छुड़वा दी जाती थी या उनकी शिक्षा केवल गांव तक ही सीमित रखा गया था । महिलाओं के प्रति यह समाज काफी सख्त रहा आखिर इसके पीछे क्या कारण था ।
इसके पीछे हमें दो सबसे बड़े मूल कारण दिखाई देते हैं राक्षस राज रावण और मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी के बीच के युद्ध और दूसरा महाभारत का युद्ध जो संस्कृति इतने बडे़-बडे़ युद्ध महिलाओं की रक्षा के लिए करके आई हो । स्वाभाविक रूप से वह महिलाओं की रक्षा के लिए सचेत तो रहेगी ही ।
गाय के थान से निकले हुए दूध का खराब हो जाना स्वाभाविक है क्योंकि गाय का दूध बहुत ही ज्यादा पौष्टिक पदार्थ है। पौष्टिक्ता बहुत अधिक होने के कारण सूक्ष्म जीवों के कारण खराब होना स्वभाविक है । अर्थात् दुनिया में जो पदार्थ जितना ही ज्यादा शुद्ध और पवित्र होता है उसके अपवित्र होने की संभावना उतनी ही ज्यादा बढ़ जाती है। महिला दुनिया की वह प्राणी है जिसके अंदर पांचों दोष बहुत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं काम,क्रोध, लोभ,मोह ईर्ष्या, और द्वेष पुरुष की तुलना में । अतः इन्हें एक विशेष माहौल में रखना नितांत आवश्यक है ताकि इनके अंदर का यह दोष बाहर न आये । यह दोष परिवार को निगल लेने वाले होते हैं । जिसके कारण परिवार बहुत आसानी से टूट कर बिखर जाता है । इसलिए महिलाओं के अंदर यह दोष न पनप पाए और वह सीमित मात्रा तक ही रहे इसके लिए महिलाओं को सुरक्षित रखना एक विशेष माहौल में रखना नितांत आवश्यक था । पंचतंत्र आप पढे़ तो वहां एक बहुत ही पते की बात मिलती है पंचतंत्र ने कहा कि दुनिया में तीन ऐसी चीज है । जो दूसरे के आश्रय पर ही निर्भर रहती है । प्रथम शासक, राजा वह होता है जो अपने आसपास के लोगों से बहुत ज्यादा प्रभावित होता है । राजाओं के आसपास कुछ चापलूस होते हैं जो अक्सर अपना कार्य सिद्धि करने हेतु हमेशा राजा की बडा़ई करते रहते हैं और खूब ज्यादा बडा़ई करके वह अपना काम खूब निकालते भी है। राजा उनकी बातों में आकर विभिन्न कई प्रकार के कार्य करते रहते है अर्थात् वह अपनी वाहवाही सुनना बहुत ज्यादा पसंद करते है । दूसरा बेल अर्थात् लता यह पौधों का वह प्रकार है जिसका कोई अपना मजबूत स्तंभ या तना नहीं होता इनमें इतनी जान नहीं होती कि यह अपना ही बोझ संभाल सकें ।
शेष क्रमशः आगे
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
94 16044 828
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