लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy भाग 16

-:ओ३म्:-
                                                        लोकतंत्र में राजतंत्र ( भाग 16)
                                



                                                    पंचतंत्र में आया है कि दुनिया में तीन ऐसी चीजें है । जो दूसरे के आश्रय पर ही निर्भर रहती है । प्रथम शासक, राजा वह होता है जो अपने आसपास के लोगों से बहुत ज्यादा प्रभावित होता है। राजाओं के आसपास कुछ चापलूस होते हैं जो अक्सर अपना कार्य सिद्धि करने हेतु हमेशा राजा की बडा़ई करते रहते हैं और खूब ज्यादा बडा़ई करके वह अपना काम खूब निकालते भी है। राजा उनकी बातों में आकर विभिन्न कई प्रकार के कार्य करते रहते है अर्थात् वह अपनी वाहवाही सुनना बहुत ज्यादा पसंद करते है । दूसरा बेल अर्थात् लता यह पौधों का वह प्रकार है जिसका कोई अपना मजबूत स्तंभ या तना नहीं होता है । इनमें इतनी जान नहीं होती कि वह अपना ही बोझ संभाल सकें । इसलिए यह अपने आसपास के क्षेत्र में स्वतः फैल जाते हैं इनको इस बात का बिल्कुल ध्यान नहीं होता कि हम जिस जगह फैल रहे हैं वह कांटों से भरा कोई हानिकारक पेड़ पौधा या कीचड़, दलदल, इस तरह का कोई जगह तो नहीं है न । यह स्वतः फैलती चली जाती हैं । अब स्त्री, महिला के संबंध में बात करते हैं । महिला दुनिया की वह जीव है जो अगर दिल से हार गई । तो जिसके प्रति उसका प्रेम है उसके प्रति वह पूर्णतः समर्पित हो जाती है । उसको इस बात का बिल्कुल ध्यान नहीं होता कि वह व्यक्ति मेरे अनुकूल कितना है मेरी आगे की जिंदगी उसके साथ कैसे कटेगी । इसका उसे तनिक भी ध्यान नहीं होता । वह स्वाभाविक रूप से उसके सामने हर तरह से पिघलने को तैयार रहती है । परिणामतः अक्सर लड़की अपने घर का त्याग करके एक लड़के के साथ भाग जाती है और मैं आपको पीछे के लेख में बता आया हूं कि लड़की के अंदर त्यागने की प्रवृति जो है यह स्वभाविक है । कारण यही रहा कि भारतीय पुरुष समाज महिलाओं के प्रति थोड़ा-बहुत सख्त रहा। क्योंकि महिला ही है जो भारतीय समाज में धर्म की और परंपराओं की स्थापना करके उसे आगे तक ले जाने वाली है और अगर यही अपने मार्ग से भटक जाए तो भारतीय समाज का पथ प्रदर्शक कौन बनेगा । बच्चों के अंदर धर्म की स्थापना एवं परंपराओं की समझ महिलाओं के कारण ही परिवार में हो पाता है और उसे प्रारंभिक अवस्था में ही महिलाओं द्वारा यह चीजें बच्चों में न जाए तो देश का भविष्य किधर जाएगा । परिणाम यही रहा कि घर और घर संबंधित संपूर्ण जिम्मेवारी महिलाओं के ऊपर रहा ।    
             जब भारत में शिक्षा और शिक्षा तंत्र संबंधी व्यवस्था बाहर से आए हुए लोगों के हाथों में चला गया । तब भारतीय समाज के वरिष्ठ एवं प्रधान लोगों को यह समझ में आ गया कि अब अगर हमारी महिलाएं इनके पास जाकर शिक्षा ग्रहण करेंगी तो वह कभी भी भारतीय परंपरा एवं धर्म का पोषक नहीं बन पाएंगी इसलिए उनको इस बाहरी शिक्षा से दूर रखना ही नितांत आवश्यक है । वह घर में ही रामायण, महाभारत, गीता आदि संपूर्ण धार्मिक वांग्मय को पढे़ यही उनके लिए सबसे ज्यादा अनुकूल है । कारण यही रहा कि भारतीय समाज के प्रथम पीढ़ी के बुजुर्गों ने महिलाओं को बाहरी शिक्षा व्यवस्था से दूर रखना ही सही समझा । ताकि महिलाओं के मन मस्तिष्क में बाहर से आई हुई प्रकृति दोहक एवं संकुचित समाज के पोषक वाला ज्ञान न प्राप्त हो । 
              भारतीय समाज सह शिक्षा का पोषक कभी भी नहीं रहा अर्थात् महिलाओं के लिए अलग गुरुकुल खोले जाते थे एवं पुरुषों के लिए अलग गुरुकुलिय शिक्षा व्यवस्था की जाती थी । ताकि महिलाओं के ह्रदय,दिल- दिमाग में पुरुषों के प्रति आदर के भाव पनप सके एवं समय आने पर योग्य पुरुष को पाने की पूर्ण इच्छा जाग सके । ठीक उसी प्रकार पुरुष के अंदर भी महिलाओं के प्रति आदर सम्मान का भाव बहुत ज्यादा हो और योग्य होने के बाद ही एक सुयोग्य कन्या को पाने की इच्छा अंदर से जाग सके । 
           यह बात बिल्कुल सही है अगर पनीर का सब्जी आधा-अधूरा बना हो तो कौन उसे खाना चाहेगा और अगर आधा-अधूरा बना हुआ पनीर का सब्जी पहली पहली बार किसी को खिला दें तो अगली बार वह पुनः पनीर की सब्जी खाने में रुचि नहीं रखेगा । लेकिन अगर पनीर की सब्जी पूर्णत: अच्छी प्रकार बनाकर किसी व्यक्ति को पहली बार खिलाएं जो आज तक पनीर की सब्जी न खाया हो तो हमेशा उसको पनीर की सब्जी खाने की इच्छा,ललक बनी रहेगी। लड़की अभी पूर्णत: योग्य नहीं हुई है अभी लड़कपन है उसमें और तब वह किसी लड़के के संपर्क में आ जाए तो स्वाभाविक रूप से लड़के के दिल में लड़की के प्रति उतनी प्रीति नहीं जग पाएगी और लड़कियों के प्रति उसके मन में भाव गलत ही उत्पन्न होगा अर्थात लड़कियां इतनी अच्छी नहीं होती है । ठीक उसी प्रकार अगर किसी लड़की के सामने बाल्यावस्था में ही कोई लड़का संपर्क में आ जाए और लड़कों की बहुत सारी त्रुटियां उसको आसानी से दिखाई दे तो उसके मन में भी लड़कों के प्रति उतना आदर-सम्मान के भाव नहीं उत्पन्न हो पाएंगे । लेकिन लड़का लड़की पुर्ण योग्य होने के बाद ही एक दूसरे के समक्ष विवाह के बंधन में बंध कर अगर सामने आते हैं तो स्वभाविक रूप से उनके अंदर असीमित प्रेम का भाव उत्पन्न होगा जो एक दूसरे को पूरी जिंदगी के लिए बांधकर रखने के लिए पर्याप्त होगा ।  
            आजकल विद्यालय एवं कॉलेज यूनिवर्सिटीज् में पढ़ रहे लड़का एवं लड़कियों के मन में एक दूसरे के प्रति विभिन्न प्रकार के भाव स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हो जाते हैं । जो सम्मानयतः नकारात्मक ही होता है और स्वाभाविक रूप से इस अल्प आयु में विभिन्न प्रकार की गलतियां एवं त्रुटियाँ हर व्यक्ति से हो ही जाती है । जो एक उम्र के बाद उन सभी गलतियों पर हम खुद हंसते हैं और हमें लगता है कि हम कितने ना समझ थे उस समय । 
             विद्यालय एवं महाविद्यालयों से निकल कर आ रहे लड़कियों के हृदय में लड़कों के प्रति एक अजीब सी दृष्टि बनी हुई है और लड़कों के हृदय में लड़कियों के प्रति एक अजीब सी दृष्टि बनी हुई है परिणाम स्वरूप वह अपने व्यक्तिगत पारिवारिक जीवन में भी उसी दृष्टिकोण से अपनी पत्नी को एवं पत्नी अपने पति को देखना चाहती है परिणाम स्वरूप जो गलती एक दूसरे के अंदर नहीं होता है हम वही गलती एक दूसरे के अंदर देखते हैं कारण यह होता है कि परिवार का संचालन बिल्कुल नहीं हो पाता है अंत में तलाक की संभावना उत्पन्न हो जाती है । 
            अब दूसरी ओर देखें गांव के सामान्य स्कूल से पढ़ कर आई हुई लड़कियों का विवाह अगर किसी व्यक्ति विशेष से होता है तो उसकी जिंदगी बहुत आसानी और सरल से आनंद पूर्वक पूरी जिंदगी कटती चली जाती है पर बहुत अधिक ज्यादा पढ़ी लिखी लड़कियों के साथ जिंदगी को व्यतीत करना काफी ज्यादा कठिन होता है जो विशेषकर शहरों में रही है एवं शहरी माहौल में पढ़ी लिखी है । परिवार में रहकर परिवारिक संस्कार एवं धर्म की समझ परंपराओं के प्रति आस्था इन कन्याओं में उत्पन्न न हुआ हो तो इनके साथ जिंदगी का जीना बहुत ज्यादा दुश्कर हो जाता है । अब तो यह बात समझ में आ जाना चाहिए कि आखिर क्या कारण था कि प्राचीन लोगों ने इस आधुनिक शिक्षा से लड़कियों को दूर क्यों रखना चाहते थे । 
            आधुनिक शिक्षा के विषय में और भी बहुत महत्वपूर्ण बातें मैं आगे के लेखों में लिखूंगा पर या केवल महिलाओं से संबंधित चर्चा कर लेते हैं । 
            कुछ लोगों की यह भी शिकायत रहती है कि भारतीय समाज में महिलाओं का वह इज्जत सम्मान प्रतिष्ठा नहीं है जितना कि पुरुषों का है । 
              भारतीय समाज में शादीशुदा महिलाओं के लिए श्रृगार का जो महत्व है । वह दुनिया के और किसी अन्य सभ्यता संस्कृति में देखने को आपको नहीं मिलेगा । आप महिलाओं के शरीर के ऊपर अगर श्रृगार संबंधित गहनों की गिनती करें तो सैकड़ों से ज्यादा मिलेगें। आप यह विचार करें कि अगर भारतीय समाज में महिलाओं को आदर-सम्मान न प्राप्त हुआ होता तो इतने अत्यधिक मात्रा में सोना चांदी के गहने पहनने का अधिकार कैसे प्राप्त हो गया । किसी उत्सव के माहौल में शादी, विवाह या अन्य किसी पारंपरिक कार्यक्रमों में अगर पुरुष बहुत अच्छे- अच्छे वस्त्र पहन कर पहुंचे लेकिन अगर उसकी पत्नी के शरीर पर अच्छे वस्त्र न हो और वह दिखने में सुंदर न दिखे, वस्त्र आदि इन सभी दृष्टिकोण से तो वहाँ महिला की प्रतिष्ठा का हनन न होकर पुरुष के प्रतिष्ठा का हनन होता है । महिला के शरीर पर सजे हुए गहनों एवं उनके वस्त्रों से पुरुषों का सम्मान बढ़ता है जिस प्रकार सूर्य अपने रसमियों से प्रकाशित होता है ठीक उसी प्रकार पुरुष अपनी पत्नी के शरीर पर लदे हुए गहनों के प्रकाश से प्रकाशित होता है और प्रतिष्ठा को समाज में प्राप्त करता है  । 
          भारतीय सनातन धर्म के विवाह पद्धति में एक विधि है विवाह संबंधी । जिसमें वर को यह आदेश मिलता है कि आप अपनी पत्नी के बालों को खोलकर पुनः उसमें तेल आदि लगाकर उसको बांधे अर्थात् आचार्य से पत्नी के प्रति पति के लिए निर्देश होता है कि आप अपनी इच्छा से समय-समय पर कभी-कभी अपनी पत्नी के बालों को खोलकर सजाकर सवाँर कर बांधा करें ताकि पति-पत्नी के बीच प्रेम का संबंध अटूट हो सके । जबकि दूसरी ओर आप ईसाईयत में चले जाएं तो महिलाओं के प्रति उनकी यह भावना होती है कि महिलाओं में आत्मा तत्व ही नहीं होती है । मैं अब तक के उम्र में यह नहीं सुना कि किसी चर्च में कोई महिला पादरी के पद पर प्रतिष्ठित हो । दूसरी ओर इस्लाम में आप देखें तो वहां दो महिलाओं की गवाही एक पुरुष की गवाही के बराबर मानी जाती है । इस्लाम में मस्जिद के अंदर महिलाओं का प्रवेश या मस्जिद के अंदर जाकर नमाज पढ़ना उचित नहीं माना जाता है । किसी मस्जिद में महिला मौलवी के पद पर प्रतिष्ठित हो आपने अब तक नहीं सुना होगा । जबकि हिंदू सनातन धर्म में महिलाएं साध्वी के पद पर या आश्रम के सबसे उच्च पद पर प्रतिष्ठित होती है । 
            बाहरी शिक्षा से प्रभावित लोगो द्वारा जबरन यह बात कही जाती है कि हिंदू धर्म में महिलाओं का वह आदर सम्मान नहीं है । जो अन्यत्र है । भारतीय सभ्यता संस्कृति में यह मान्यता है कि स्त्री-पुरुष का जब विवाह हो जाता है तो वह एक जन्म का नहीं सात जन्मों का रिश्ता होता है । और पति-पत्नी किसी भी कारण से एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते । उसके लिए कोई भी संस्कृत में शब्द नहीं दिखाई पड़ता । संस्कृत के आचार्यों ने कोई ऐसा शब्द नहीं दिया जिससे यह लक्षित होता हो कि इस शब्द के माध्यम से पति-पत्नी अलग हो सकते हैं । परंतु पश्चिमी सभ्यता में चले जाएं तो वहां "डिवोर्स"और इस्लाम में "तलाक" जैसे शब्द है । जिसके माध्यम से पति-पत्नी एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं । जबकि भारतीय परंपरा में किसी भी प्रकार के जीवन में चाहे जितना भी कष्ट झेलना पड़े दुख,कष्ट कुछ भी हो फिर भी उनको एक साथ ही रहना है । यह इस दृष्टि से भी बनाया गया था कि भविष्य में किसी भी छोटी-छोटी बातों के लिए हम अलग न हो । क्योंकि जीवन के सामान्य पद्धति में कभी-कभी कुछ ऐसी बातें हो जाती हैं जो हमें अटपटा सा लगता है परंतु बाद में हमें लगता है कि वह सब ठीक था और हमें उस गलती पर खुद में शर्मिंदगी भी महसूस होती है फिर उस पल को याद करके हम हंसते भी हैं और फिर एक साथ रहते भी हैं लेकिन इस नई संस्कृति में किसी न किसी बहाने पति-पत्नी को अलग करने के लिए शब्द तो गढे़ ही गए साथ-साथ कानून भी बना लिए गए । जबकि भारतीय सभ्यता संस्कृति में पुरुष अपनी पत्नी को अपनी जिंदगी से नहीं निकाल सकता है विवाह के बाद । उसको पत्नी को अपने साथ ही रखना है दूसरी ओर समाज सुरक्षित रहें एवं आगे की सभ्यता संस्कृति न बिगड़े इसके लिए पत्नी की भी दायित्व है कि पति चाहे जैसा भी हो वह अपने पति के साथ ही जीवन व्यतीत करें ताकि समाज दूषित न हो। इस नियम में एक बहुत विशेष दृढ़ता भी है मतलब यह है कि पति या पत्नी अपने निजी स्वार्थ या निजी कष्ट परेशानियों के कारण एक दूसरे से अलग हो जाएं और अलग होने की अनुमति समाज दे देती है तो आने वाला भविष्य किसी भी छोटी से छोटी बात को सहन नहीं करेगी और वह कभी भी एक दूसरे से अलग हो सकती है इसलिए इस नियम का पालन भी अनिवार्य था ।
शेष क्रमशः-आगे 
वैदिक सुप्रभात 
उत्तम प्रकाश 
9416044828

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"आओ हम सब गुलाम बने " भाग-4

लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy भाग-8

नवरात्र (भाग -2)