लोकतंत्र में राजतंत्र भाग-17 (फूट डालो राज करो भाग-1)




                                                                                 बिल्कुल सीधी, सरल और आसान सी  बात है अगर आप
 किसी समुदाय विशेष को लूटना चाहते हैं तो उसका सबसे सरल और आसान तरीका यह है कि उस समुदाय के 
बीच आपस में किसी विवाद या किसी अन्य तरीके से उन्हें लड़ा दे फिर आप उन्हें बहुत आसानी से लूट सकते हैं । 
जब रानी का सरकार 1857 के बाद भारत में बना तब वे ये जानना चाहते थे कि वह कौन सा ऐसा तरीका है जिसके माध्यम से हम भारतीय समान्य- जन को आपस में लड़ा कर उन्हें लूट सकते हैं ।
               हालांकि इसके पूर्व ब्रिटेन भारत के विभिन्न अलग-अलग मुस्लिम एवं हिंदू राजाओं को आपस में लड़ा कर उन्हें विध्वंस कर ही दिया था । लेकिन अब बारी सामान्य जन की थी कैसे उन्हें कमजोर किया जाए "फूट डालो राज करो" की नीति कैसे इस देश में लागू की जाए ।
             शासन करने एवं लूटने हेतु ब्रिटेन के लिए यह जानना अति आवश्यक था कि भारत के किस भुभाग में किस समुदाय के लोग कितनी संख्या में उपस्थित है । उनका जीवन रहन-सहन, खान-पान, आय, व्यापार, रोजगार के साधन क्या है और कितने हैं ताकि उन पर अपनी शासन व्यवस्था को लागू की जा सके और उन्हें आसानी से लूटा जा सके । साथ ही अपनी सैन्य व्यवस्था को, वह किस प्रकार व्यवस्थित करे तथा ब्रिटेन में उत्पादित उत्पादों को उन तक कैसे पहुंचाया जाए । जिससे यह स्पष्ट हो सके कि उस इलाके में यातायात की क्या सुविधा विकसित की जाए एवं रेल के विस्तार का मार्ग स्पष्ट हो सके ।
              इसके लिए ब्रिटेन ने सबसे पहली बार 1872 में उसके बाद 1881 में व्यवस्थित तरीके से जातिगत- जनगणना करना शुरू किया ।
              जातिगत-जनगणना फूट डालो राज करो के नीति का मूल आधार बना । सरकारी तंत्र में कार्य करने वाले सरकारी अधिकारियों के मन मस्तिष्क में अब यह बैठने लगा कि मेरी जाति एवं समुदाय के लोग किस क्षेत्र में कितने हैं । इस देश में विभिन्न अलग-अलग मतों को मानने वाले लोगों को भी यह समझ में आने लगा कि मुस्लिम समुदाय के लोग कितने हैं, जैन कितने हैं, बौद्धिष्ट कितने है, हिंदू कितने हैं आदि - आदि ।
              साथ ही ब्रिटेन को यह पता लग गया कि राजपूत, भुईयार, जाट, मराठा, गोरखा आदि अलग-अलग लड़ाकू समुदाय किस क्षेत्र में कितने हैं । इस जातिगत-जनगणना को प्रति 10 वर्ष में एक बार दोहराई गई उसे जनसामान्य के सामने परोसा गया । परिणाम यह हुआ कि सरकारी तंत्र में कार्य करने वाले लोग अपने समुदाय एवं अन्य समुदायों के प्रति उनके मन में अलग तरह की भेदभाव की दृष्टि उत्पन्न हुई । वर्तमान आधुनिक मीडिया इस जातिगत जनगणना को भारतीय जनमानस के सामने विभिन्न तरीके से परोसना प्रारंभ किया । अब इस जातिगत जनगणना को और ज्यादा पक्का करने के लिए तथा भारतीय समाज आपस में विभक्त होकर टूट कर बिखर जाए इसके लिए 1947 के बाद विभिन्न अलग-अलग समुदायों को सरकारी सर्टिफिकेट दी गई प्रमाण पत्र के द्वारा उनकी जातिगत भेदभाव को और ज्यादा पक्का किया गया बहाना आरक्षण का था । जातिगत प्रमाण पत्र को ठोस रूप देने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई वह आरक्षण राशन पाने के लिए, शिक्षा के लिए, सरकारी नौकरी पाने के लिए । अब इसी आरक्षण का प्रयोग चुनाव में अपने आप को प्रत्याशि बनने के लिए भी किया जाने लगा ।
              अब जातिगत जनगणना से स्पष्ट की गई अलग-अलग समुदायों की संख्या का प्रयोग चुनाव क्षेत्र में बहुत ही ज्यादा मजबूती से की जाती है अब आप देखें इस लोकतंत्र में विभिन्न स्तर के चुनाव होते हैं । राष्ट्रपति का, प्रधानमंत्री का, विधानसभा का, लोकसभा का, मुखिया का, सरपंच का, बीडीसी का, वार्ड का, सभापति का, शिक्षक संघ में, अलग-अलग सरकारी तंत्रों में, मजदूरों में यूनियन के लिए, विद्यार्थी परिषद में, विभिन्न अलग-अलग जगहों पर चुनाव होते हैं और इन चुनावों में इस जातिगत जनगणना का बहुत ही ज्यादा भरपूर प्रयोग होता है । इन सभी चुनाव में उस जातिगत प्रमाण पत्र का बहुत ही अच्छा प्रयोग होता है । अब आप यह एक बात बताएं विद्यार्थियों में , शिक्षक संघ में चुनाव हो उसका मूल आधार जाति बने तो आप कैसे कह सकते हैं कि भारतीय समाज आपस में बटी हुई नहीं है और बाटने का कार्य प्रथम बार किसने प्रारंभ किया । जबकि भारतीय शास्त्र या ग्रंथों को पढे़ तो कहीं भी आपको यह नहीं मिलेगा कि राजा को कभी-कभी जातिगत जनगणना करवाना चाहिए या अपनी ही प्रजा की संख्या का संख्यांकन करवाना चाहिए ।
             हाँ राजा अपनी प्रजा का संख्यांकन कभी-कभी करवा ले ताकि उसे यह पता लगे कि मेरी प्रजा की संख्या घट तो नहीं रही है न । बस इसलिए न कि इसलिए कि किस समुदाय के लोग कितने है और उनके पास उनकी संपत्ति कितनी है उनका व्यापार क्या है आदि इसके लिए ।
             अब वर्तमान समय में आधुनिक भारत की स्थिति देख ले । जन्म लेते ही हॉस्पिटल में जन्म प्रमाण पत्र बना दी जाती है उसी समय आपकी जाति तय कर दी जाती है विद्यालय में आपके जाति के आधार पर आरक्षण तय किए जाते हैं आपको छात्रवृत्ति मिलती है राशन कार्ड बन जाते हैं राशन मिलती हैं आप जो कमाते हैं उन पैसों को बैंकों में रखना है आपका व्यापारिक आय, सरकार के सामने स्पष्ट है आपका आधार कार्ड, पैन कार्ड, श्रमिक कार्ड, वोटर आईडी कार्ड बना दिए जाते हैं आपका कुल जमीन, आपके घर में उपस्थित सारे संसाधन, आपकी दिनचर्या यह सब कुछ सरकार के सामने स्पष्ट है ।
              मतलब बिल्कुल स्पष्ट है कि जिन्हें गुलाम बनाना है उनकी सब कुछ गुलाम बनाने वाले शासक को पता होना ही चाहिए तब वह अच्छी तरह से सामने वाले को गुलाम बना सकता है ।
               अब हमें यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि फूट डालो राज करो की नीति कितनी गहराई तक इस भारतवर्ष में घर कर गई है । फूट डालो राज्य करो की नीति इस देश में विभिन्न अलग-अलग क्षेत्रों में चुनाव के माध्यम से, आरक्षण के माध्यम से, जातिगत जनगणना के माध्यम से, विभिन्न अलग-अलग प्रमाण पत्र को बांटने के माध्यम से, भारतीय रेल में विभिन्न अलग-अलग प्रकार के स्पेशल डिब्बों को बनाने के माध्यम से जैसे स्लीपर, एसी, जनरल आदि विभिन्न अलग-अलग माध्यमों से फूट डालो राज करो की नीति आज भी इस देश में लागू है ।
               मान लें इस देश में जातिगत- जनगणना नहीं कराई जाती । सरकारें केवल भारतीय जनता की अनुमानित स्रोतों से संख्यांकन करवा लेती । और उस संख्यांकन का रिपोर्ट भारतीय जनता के सामने नहीं परोसा जाता तो भारतीय जनमानस को यह पता ही नहीं लगता कि इस देश में किस समुदाय के लोग कितने हैं । मानलें भारत सरकार किसी भी प्रकार का कोई जातिगत प्रमाण पत्र किसी भारतीय जनता को नहीं देती । इस देश में यह किसी को पता नहीं होता कि हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि कौन-कौन से समुदाय कितनी संख्या में उपस्थित है और किस समुदाय के लोग किस क्षेत्र में कितने है । इस देश में किसी भी समुदाय के लोगों को आरक्षण नहीं मिलता किसी भी आधार पर । मतलब आरक्षण क्या होता है यह किसी को पता ही नहीं होता । किसी व्यक्ति विशेष के लिए उसके अपने व्यक्तिगत मार्ग में आरक्षण या जाति उसका रोड़ा नहीं बनता । रेल के डिब्बों में केवल एक ही प्रकार के डब्बे होते या तो संपूर्ण ऐसी होते या संपूर्ण  जनरल होते और सभी डब्बो का किराया समान होता । चुनाव में प्रत्याशी बनने के लिए जातिगत प्रमाण पत्र की कोई आवश्यकता नहीं होती ।
               तो आप यह सोच सकते हैं कि अपने भारतवर्ष में विभिन्न प्रकार की विवादों का जड़ मूल ही नहीं होता और हम विभिन्न कई प्रकार की समस्याएं में ही नहीं पडते । सबसे प्रमुख और मूल बात यह है कि ब्रिटेेेन साम्यवादी अर्थव्यवस्था का पोषक नहीं रहा है । भारत में साम्यवादी अर्थव्यवस्था था । जिसमें एक वस्तु का उत्पादन विभिन्न अलग-अलग प्रकार के समुदायों केेे लोग मिलकर किया करते थे । ब्रिटेन पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का पोषक रहा इसलिए इस साम्यवादी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करना अनिवार्य था । इसलिए भी फूट डालो रााज करो की नीति पर कार्य करना अनिवार्य था । साम्यवादी अर्थव्यवस्था उस समय तक ध्वस्त नहीं हो सकती जब तक आपस में फूट न पड़े ।
       शेष क्रमशः आगे । 
                       उत्तम प्रकाश  
                     वैदिक सुप्रभात
                    94 16044 828

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