लोकतंत्र में राजतंत्र भाग -18(फूट डालो राज करो भाग -2)






            आधुनिकता से प्रभावित आधुनिक सामान्य जन अक्सर यह कहा करती है । कि भारतीय समाज जातियों में बटीं हुई है । जातिगत विवाद हमें मजबूत नहीं होने देते । हम आपस में बिखरे हुए हैं ।यह जातिगत भेदभाव समाप्त होने चाहिए ।
             मेरा सवाल यह है कि यह जातिगत भेदभाव किसने उत्पन्न किया ? कौन इसको आश्रय और बल दे रहा है ? किसके बल पर यह टिका हुआ है ? हमें अपने दैनिक जीवन में कब अपने किसी विशेष जाति के होने का महत्व समझ में आता है ? यह जानना अत्यंत आवश्यक है ।
            आप बाजार में दूध, दही, घी, मक्खन, लस्सी, सब्जी, कपड़ा आदि किराने का कोई भी सामान, कंस्ट्रक्शन का कोई भी सामान खरीदने जाए या और भी बहुत कुछ, कुछ भी खरीदने जाएं तो आपसे कोई जाति नहीं पूछता । वस्तु का दाम मोलभाव होता है और आप आसानी से खरीद लेते हैं । दुकानदार आपको बेज देते है । आप किसी गैर सरकारी कंपनी में जॉब करने के लिए जाते हैं उस समय भी आपके टैलेंट की परीक्षा ली जाती है । न कि जाति की । आप किस जाति से अपना संबंध रखते हैं यह सामने वाला बिल्कुल नहीं जानना चाहता ।
            हां पंडित जी जब आपके घर पर कोई पूजा-पाठ करवाते हैं तो  संकल्प पाठ के समय आपसे आपका गोत्र पूछते है न की जाति ।
            मतलब यह है कि आपको कब ऐसा महसूस होता है कि मैं इस जाति का हूं ।
            बिल्कुल स्पष्ट है जब आप सरकारी आवेदन के लिए कोई आवेदन पत्र भरते हैं । उस समय आपको अपनी जाति लिखनी पड़ती है और अपने जाति का जातिगत प्रमाण-पत्र देना होता है । ताकि आपका वहां काम हो सके । नामांकन हो सके । नौकरी मिल सके । आदि आदि राज्य सरकार और केंद्र सरकार अपना-अपना अलग-अलग  जातिगत प्रमाण पत्र आपको देती है ।
            मतलब भारत सरकार और राज्य सरकार आपको शुद्र होने का या ब्राह्मण होने का जातिगत प्रमाण पत्र प्रस्तुत करती है । सरकारों द्वारा प्राप्त जातिगत प्रमाण पत्र का संबंध आपके संस्कार, आचरण, व्यवहार, विद्या, चरित्र आदि से कोई संबंध नहीं है उसका संबंध केवल आपकी जन्मकुंडली से है । मतलब यह है कि कोई व्यक्ति जन्म लेते ही ब्रह्मांड और कोई व्यक्ति जन्म लेते ही शुद्र साबित हो जाता है भारत सरकार के मान्यता के हिसाब से ।
            अब दूसरी बार तब इस जातिगत प्रमाण पत्र की आवश्यकता पड़ती है जब आप अपने आप को चुनाव में प्रत्याशित घोषित करने के लिए चुनावी पत्र भरने जाते हैं । आपको भारत सरकार को यह बताना पड़ता है कि आप किस जाति के हैं तब भारत सरकार आप को चुनाव में भाग लेने देती है अन्यथा नहीं ।
             अब कुछ सामान्य जन का यह आरोप होता है कि यह जातिगत व्यवस्था मनु महाराज के द्वारा भारतीय समाज में लाई गई है । इस प्रकार के विभिन्न सवालों का हवाला देकर प्रत्येक 25 दिसंबर को पूरे भारतवर्ष में मनुस्मृति को जलाई जाती है कुछ विशेष समुदाय के लोगों के द्वारा ।
            अब मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि आप मुझे यह बताएं मनु महाराज किस जाति के थे ? उनके नाम के पीछे कौन सा सरनेम जुड़ा हुआ है ? राय, तिवारी, चौबे, चौधरी, ठाकुर, मिश्रा, उपाध्याय, ओझा, मोदी, कादयान, आदि
            अगर मनु महाराज द्वारा जातिगत व्यवस्था प्रारंभ हुई होती तो उनके नाम के अंत में भी जरूर कोई न कोई सरनेम लगा होता ।
            मनु महाराज से लेकर महाभारत काल तक के लोगों के नाम के अंत में कोई सरनेम दिखाई नहीं देता। जैसेः- राजा हरिश्चंद्र, भगवान परशुराम, महाराज दशरथ, राजा जनक, राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, कौशल्या, केकैई, रावण, विश्वेशर्वा, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वशिष्ठ, हनुमान जी, ताराका आदि किसी के नाम के अंत में कोई जातिसूचक, किसी भी प्रकार का कोई सरनेम हमें नहीं दिखाई पड़ता । महाभारत काल की बात करें तो महाराज संतनु, महाराज भारत, महाराज दुष्यंत, द्रुपद, युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, भीम, भगवान श्री कृष्ण, सुदामा मतलब स्पष्ट है कि वर्तमान जातिगत व्यवस्था का मनु महाराज से दूर-दूर तक का कोई संबंध नहीं है ।
            चलो 2 मिनट के लिए अगर मान भी ले हैं कि मनु महाराज ने शुरू किया तो भारत सरकार प्रमाण पत्र क्यों बांट रही है । भारत सरकार तो धर्मनिरपेक्ष है । भारत सरकार के लिए सभी धर्म एक समान है सभी भारतीय जनता एक समान है तो फिर जातिगत प्रमाण पत्र बांटने की क्या जरूरत थी ? और विभिन्न अलग-अलग प्रकार की जातिगत जनगणना करवाने की क्या जरूरत थी ? प्रति 10 वर्ष पर भारतीय जनमानस के सामने जातिगत जनगणना करवा कर उसके रिपोर्ट को प्रस्तुत करने की क्या जरूरत थी ?
           मतलब स्पष्ट है "फूट डालो राज करो" सरकारें जातिगत प्रमाण पत्र देकर आरक्षण का ताज पहनाती है आम जनता के सर ।
          भारतीय समाज दो भागों में विभक्त है एक वह समाज है जिसके पास पैतृक कला है लोहार लोहा का, स्वर्णकार सोना का, बढ़ई लकड़ी का, कुम्हार मिट्टी का, माली फूलों का, तुरहा सब्जियों का, यादव दूध का आदि आदि अपने अलग-अलग विशिष्ट कर्मो के लिए जाने जाते हैं । प्रत्येक समुदाय अपने विशिष्ट पैतृक रोजगार युक्त गुणों को अपने अगले पीढ़ी में आसानी से दे देते हैं जिसके कारण उनके अपने बच्चे रोजगार से संचित होते हैं ।
         ब्रिटेन पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का पोषक है । पूज्यवादी अर्थव्यवस्था भारतवर्ष में लानी थी इन सभी समान्य  रोजगार की सारी व्यवस्था को धीरे-धीरे पूंजीवाद में परिवर्तित करना था । जब तक यह आम जनता से ली नहीं जाएगी तब तक पूंजीवाद को बढ़ावा नहीं मिल पाएगा । इसके लिए इन सामान्य जनों के बीच ब्रिटिश सरकार ने जातिगत जनगणना करवा कर उनके बीच भेदभाव प्रारंभ किया । बाद में भारत सरकार आरक्षण का चोला पहनाकर उन्हें कहा तुम पढ़ो, लिखो और बुद्धिमान बनो हम तुम्हें नौकरी देंगे ।
परिणाम यह हुआ कि जो सामान्य जन बहुत आसानी से अपना पैतृक स्वरोजगार प्रारंभ कर सकती थी । आरक्षण के चक्कर में आकर आज दर दर की ठोकर खा रही है और सरकारों से लड़ाई करती है कि हम बेरोजगार हैं । दूसरी ओर बड़ी-बड़ी मल्टीनैशनल बहुराष्ट्रीय कंपनीयां दूध और चटनी बेच रही है । और हम बहुत ही आनंद पूर्वक सड़ी हुई टमाटर की चटनी बड़े मौज से खाते हैं क्योंकि बॉलीवुड के स्टार उसका प्रचार करते हैं । ( चटनी यहां केवल एक उदाहरण मात्र है )
          अच्छा इन्हीं सामान्य जनों में अगर कोई विद्यार्थी आरक्षण का चोला पहनकर किसी ऊंचे पद पर अफसर बन जाता है तो उसका फोटो फेसबुक एवं सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत ज्यादा ट्रोल किया जाता है ताकि और विद्यार्थी प्रेरित हो सके । मतलब यह है कि हजार बच्चे अफसर बनने गए थे जिनमें दो बन पाए बाकी 998 घर आकर पुनः उसी पैतृक रोजगार को शुरू करते हैं । अब 998 विद्यार्थियों द्वारा जो समय और पैसा खर्च किया गया है उसका कोई हिसाब-किताब नहीं है । आप बहुत ऐसे विद्यार्थी को देखे होंगे । B.tech डिग्री लेने के बाद किराना दुकान चला रहे हैं जो उनका पैतृक रोजगार था ।
         कुछ लोगों का यह भी कहना है कि दो ही विद्यार्थी हजार में से लायक थे बाकी तो सब नालायक थे । नहीं, ऐसा नहीं है, अब आप इस मापदंड को समझें । मान लें आपकी अपनी कोई कंपनी है जिसमें 10 लोगों के लिए आपने वैकेंसी निकाली । 100 लोगों ने आवेदन किया । उन 100 लोगों में से मात्र 3 लोग ही आप के मापदंड पर खरे उतरे । आपका 7 सीट खाली रह गया । तब यह कहना ठीक रहेगा कि बाकी अन्य लोग आपके मापदंड पर खरे नहीं उतरे जो आपके लायक नहीं थे । लेकिन आपका पूरा 10 सीट भर जाए तो आप यह कैसे कह सकते हैं की अन्य लोग आपके काबिल नहीं थे । वे योग्य नहीं थे । मतलब स्पष्ट है कि वे सभी लोग आपके कंपनी में कार्य करने के लायक थे आप की क्षमता उतनी नहीं थी, उन्हें नौकरी देने की ।
         अब यह भारत सरकार का दायित्व बनता है कि वे जिन्हें आरक्षण देकर नौकरी देने का दावा करती है उन्हें या तो नौकरी दे और अगर नौकरी नहीं दे पा रही है तो उनके पैतृक रोजगार को बड़ी कंपनियों के हाथों न सौंपे ।
         लेकिन यहां उल्टा है भारत सरकार आरक्षण का झांसा देकर उनके पैतृक रोजगार को उनसे छीनकर बड़ी-बड़ी कंपनियों के हाथों में दे रही है और एक बहुत बड़ी जनसमुदाय बेरोजगार हो कर भटक रही है ।
        दूसरे वे समुदाय जो विद्या से संपन्न है पढ़ना-लिखना, शास्त्रों को पढ़ना, संस्कृति को समझना, दुनिया को समझना, आत्मा, परमात्मा, प्रकृति का गहन अध्ययन करना, समझना और समझ के अपने सभ्यता संस्कृति को सजा-सवांर कर, संभाल के रखना और भौतिक संपदा को संरक्षित करना उनका दायित्व था ।
        इस फूट डालो राज करो की नीति ने विद्या संरक्षक और कला संरक्षक दोनों को उनके मार्ग से विमुख किया तथा दूसरे समुदाय जो विद्या संरक्षक थे वे भी अपने विद्या से दूर होकर नौकरी के लिए भटक रहे हैं । नौकरी पाने वाले तो कुछ ही लोग हैं । बाकी अन्य सभी बेरोजगारी की मार से पीड़ित है । बड़ी-बड़ी कंपनियां जीरो लेवल की तकनीकी पर आधारित वस्तुओं को बेचकर बाजार से खूब पैसा कमा रही है । और हमें जिस उम्र में रोजगार सीखनी थी उस उम्र में हम अफसर बन रहे थे और जब हमेें अफसर बन जाना था तब आकर के रोजगार सीखते हैं ।
           अब आप मुझे एक बात बताएं बनिया का बेटा अगर धक्के से डॉक्टर बन जाए तो डॉक्टर बनने के बाद वह डॉक्टरी करेगा या बनिययी करेगा । तब लोगों का यह शिकायत होता है की डॉक्टर है या बनिया ।
           मतलब स्पष्ट है कि जो जिस गुण में पैतृक रुप से संपन्न हो और जो जिसका आदर करता हो । जिसका जिसमें स्वतः मन लगे उसको उसी गुण में आगे बढ़ना चाहिए और सरकारों को उन्हें ही आश्रय देना चाहिए ।
            बहुत ऐसे लोग आपको दिखाई देंगे जो जातिगत प्रमाण पत्र का प्रयोग करके अपनी सारी संपत्ति को चुनाव जीतने के लिए लुटा देते हैं और अंत में हाथ कुछ भी नहीं लगता और अगर कभी चुनाव में जीत भी जाए तो चाटुकारिता में ही पूरी जिंदगी निकल जाती है ।
           
                               शेष क्रमशः आगे
             उत्तम प्रकाश
           वैदिक सुप्रभात
         94 16044 828
        
          

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