लोकतंत्र में राजतंत्र भाग -19( "फूट डालो राज करो" भाग 3)

   



                                         भारतीय समाज को तोड़ने के जो प्रमुख कारण थे वह मैं पूर्व के लेखों में बता चुका हुँ । 
       ब्रिटिश सरकार ने भारतीय समाज को तोड़ने का मुख आधार वर्ण व्यवस्था को बनाया । बाद में भारत सरकार ने विभिन्न प्रकार की जातिगत प्रमाण पत्र एवं आरक्षण आदि चीजों से उसे मजबूत किया । 
         अब बारी है भारतीय परिवारिक व्यवस्था को कैसे विभक्त की जाए । इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न आयामों को खड़ा किया जिससे एक ही परिवार के विभिन्न अलग-अलग सदस्यों में विवाद उत्पन्न हो सके । युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो सके, आपस में मारपीट हो सके और वे एक न हो सके इसकी व्यवस्था की गई । 
              दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का पोशाक है अतः बड़ी-बड़ी कंपनियों को लगाने के लिए उन्हें जमीनों की जरूरत थी ।जमीन उन्हें चाहिए था तथा दूसरी ओर अधिक से अधिक पैसे चाहिए । जिससे वह इस देश को गुलाम बना सके तथा अपने अधिकारियों को समय पर वेतन दे पाए । 
        भारत में जमीन खरीदने और बेचने की परंपरा नहीं थी । भारत में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को दान स्वरूप अपनी भूमि प्रदान करता था ।भारत में जमीन को मां की दृष्टि से देखी जाती थी । क्योंकि इस पर ही हमारा जीवन निर्भर है । भारतीय भूमि को धरती मां कह कर पुकारते हैं ।अंग्रेजी समुदाय को अधिक से अधिक जमीन चर्च बनाने हेतु, बड़ी-बड़ी कंपनियों को लगाने हेतु, रेलवे के विस्तार हेतु चाहिए था अतः इसलिए इस कानून का लाना अनिवार्य था इसके लिए उन्होंने भूमि अधिग्रहण कानून लाया । जिसके तहत जमीन को बेचने खरीदने की परंपरा शुरू हुई । अंग्रेजी सरकार जमीनों के लिए सरकारी कागज बना कर देना प्रारंभ किया और इसके लिए उन्होंने पैसे भी वसुले। इसके लिए विभिन्न अलग-अलग प्रकार के डिपार्टमेंट बनाएं । अंग्रेजों द्वारा बनाए गए कानून आईपीसी, सीआरपीसी आदि का अधिक से अधिक उपयोग हो पाए तथा वकालत की पढ़ाई पढ़ कर आए हुए वकीलों को अच्छा खासा रोजगार प्राप्त हो सके इसके लिए यह व्यवस्था बनाई गई । अब जब जमीन खरीदने- बेचने की परंपरा इस देश में शुरू हुई तब घर में सोने का संग्रह करना धीरे-धीरे समाप्त होने लगा और भाइयों के बीच, रिश्तेदारों के बीच, अपने सगे संबंधियों के बीच, धीरे-धीरे विवाद उत्पन्न होने शुरू हुए । जमीन की वैल्यू धीरे-धीरे बढ़ने लगी । 1860 में ही ट्रस्ट एक्ट बन चुका था । ईसाइयत से प्रभावित समुदाय अलग-अलग प्रकार के ट्रस्ट बनाकर समाज सेवा के नाम पर अधिक से अधिक जमीनों को अपने अधिकार में करने लगे करें । इंडियन एजुकेशन एक्ट आ चुका था और कान्वेंट को बढ़ावा मिला ।
         अंग्रेजी सरकार अपनी ही बनाई हुई कानूनों की रक्षा के लिए इंडियन पुलिस एक्ट पहले ही बना चुकी थी । जब तक भूमि अधिग्रहण कानून नहीं आया था तब तक भारतीय समाज में प्रेम पूर्वक एक दूसरे के साथ व्यवहार बनाते हुए मिलजुल कर रहने की परंपरा विकसित हुई थी इस देश में ताकि जरूरत पड़ने पर एक दूसरे के हम काम आ सके । लेकिन जब से इस प्रकार के कानून बना तभी से अधिकतर लोगों के अंदर पैसा का अभिमान होने लगा । हम तो पैसे के बल पर कुछ भी खरीद सकते हैं । परिवारिक फूट उत्पन्न करने का सबसे आसान और सरल जरिया इस प्रकार के कानून बने । 
              आप कभी गौर से ध्यान दें तो आपको पता लगेगा कि भारतीय जनमानस के द्वारा जमीन खरीदने और बेचने के कारण भारत की अपनी जो भारतीय सीमा है वह कभी बढ़ती या घटती नहीं है । वह जितनी है उतनी ही है । मतलब आप जमीन खरीदते और बेचते हैं । इससे भारतीय सीमा पर कोई फर्क नहीं पड़ता है ।लेकिन इस खरीदने-बेचने की परंपरा के कारण धीरे-धीरे सामान्य लोगों की जमीनें सरकारी तंत्रों, नेताओं, सरकारी अधिकारियों, पूजीपतियों, मुसलमानों,कॉन्वेंट स्कूलों, बड़े बड़े चर्चे गिरजाघरों आदि के हाथ में जा रहे हैं । गांव का एक साधारण किसान आधुनिक टेक्नोलॉजी के अभाव में अपने आपको क्षुब्ध समझने के कारण खेती संबंधी कार्यों को छोड़कर शहरों के किनारे बस रहा है और उसकी सारी जमीनी धीरे-धीरे बड़ी-बड़ी कंपनियों के हाथों में जा रही है मतलब स्पष्ट है कि इस प्रकार के कानून हमारे परिवारिक झगड़ा का कारण बना दूसरी और बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए लाभप्रद ही रहा है ।
        अगर सरकारों द्वारा जमीन संबंधी सरकारी कागज आम जनता के हाथ में न हो तो किसी भी प्रकार का कोई भी झगड़ा आदि किसी भी प्रकार का कोई अपराध ,कोई भी परिवारिक विवाद कभी भी न हो । 
         अभी भी आप प्राकृतिक रूप से देख लें तो आपको यह पता लगेगा कि किसी बात की पुष्टि के लिए हम आसपास के लोगों से पूछ लेते हैं कि यह जमीन किसका है ? यह मकान किसका है ? यह लड़का किसका है ?यह लड़की किसकी बेटी है ? इस वस्तु का मालिक कौन है ? आसपास के लोग बता देते हैं और हम मान भी लेते हैं । हम कभी भी उस को प्रमाणित करने के लिए किसी से किसी प्रकार का कोई सरकारी कागज नहींं मांगते हैं । यह सरकारी कागज केवल विवादों के लिए उत्पन्न किए गए हैं । कई बार तो ऐसा होता है कि समाज के लोग जानते हैं कि यह जमीन इसका है और पिछले कई वर्षों से जानते हैं । पर अचानक कोर्ट में केस हो जाता है और बाद में पता लगता है कि यह जमीन किसी दूसरे व्यक्ति का है । मतलब एक सरकारी कागज का टुकड़ा सच्चाई को बदलने के लिए काफी है । वास्तव में जिस व्यक्ति का वह जमीन था । पूरी जिंदगी अपनी जमीन की लड़ाई लड़ता रहता है । अब इस लड़ाई में समाज के ही कई लोग उसके अपने और कई लोग उसके दुश्मन बन जाते हैं । यह सब केवल इसलिए हो पाता है क्योंकि सरकारों ने इसके लिए कागज दे रखी है और उस कागजों के सुरक्षा के लिए विभिन्न प्रकार के डिपार्टमेंट बना रखें । वह भी हमारे टैक्स के पैसे से ही । 
    मतलब यह एक प्राकृतिक व्यवस्था नहीं है । प्रकृति से इसका कोई संबंध नहीं है । लेकिन फिर भी यह भारतीय समाज को जबरन थोपा गया है ताकि इससे समाज आपस में लड़ता रहे, बिखरता रहे, कभी एक न हो पाए । इस व्यवस्था में एक जिंदा व्यक्ति को यह साबित करना पड़ता है कि मैं जिंदा हूं । कोर्ट-कचहरी उसको देख कर के मानने को तैयार नहीं है उसे एक सरकारी प्रमाण पत्र चाहिए जिससे यह साबित हो सके की कोई व्यक्ति जिंदा है । अगर कागज बोलता है कि वह जिंदा है तो वह व्यक्ति जिंदा माना जाएगा । अगर वही कागज यह साबित कर दें कि अमुक व्यक्ति मर गया है तो उस अमुक व्यक्ति को मरा हुआ माना जाएगा । खुद को वह साबित करता रहे कि मैं जिंदा हूं मैं बोल सकता हूं। खा पी सकता हूं लेकिन कोर्ट-कचहरी यह मानने को तैयार नहीं है कि वह व्यक्ति जिंदा है । 
          मतलब यह है कि कागज की दुनिया के माध्यम से भारतीय समाज में "फूट डालो राज करो" की राजनीति बहुत ही अच्छी तरह से पुष्पित हो रही है इसको आरक्षण आदि कागजी प्रमाण पत्रों के द्वारा पोषण दिए जा रहे हैं ।
        उपर्युक्त में तो आपने यह जाना कि किस प्रकार परिवारिक विभेद उत्पन्न हो । इसके लिए कौन-कौन सी व्यवस्था ब्रिटिश सरकार ने किया ।   
           अब हम बात करते हैं एक परिवार में पति-पत्नी के बीच किस प्रकार से विवाद उत्पन्न हो और उन्हें किस प्रकार से तोड़ा जाए इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने कौन सी व्यवस्था की एवं ईसाइयत व इस्लाम में किस प्रकार की व्यवस्था बनाई गई है ।
          दुनिया में कुछ ऐसी चीजें हैं जिसका कोई विकल्प नहीं होता ।  जैसे- अगर आपका जन्म पृथ्वी पर हुआ है तो आपको यहाँ रहना ही पड़ेगा । आप यह नहीं कह सकते की यह पृथ्वी मेरे रहने लायक नहीं है । मुझे यह छोड़कर दूसरे जगह चले जाना चाहिए आपको यहींं रहना पड़ेगा । अगर आपकी मां पढ़ी-लिखी नहीं है, अंग्रेजी बोलना नहीं जानती है, सुंदर नहीं है, आपको ऐसा लगता है कि इस तरह की बहुत सारी कमियां आपकी मां में है तो भी आपके पास उस महिला को माँ कहने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है । इसी प्रकार की बहुत सारी कमियां अगर आपके भाई-बहन, पिता आदि अन्य रिश्तेदारों में कहीं है तो उसका कोई दूसरा विकल्प नहीं है आपके पास । उन्हें सहर्ष स्वतः स्वीकार करना ही पड़ेगा । अगर आप दुनिया के किसी कोने में जहां आपका जन्म हुआ है । वह जन्म स्थली अगर आपको पसंद नहीं है ।आप अपना जन्मस्थली बदलना चाहते हैं तो इसका आपके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है ।   
          मतलब यह है कि आप अपनी जिंदगी में बहुत सारी ऐसी चीजें हैं जो आप खुद से तय नहीं करते वह पूर्व से ही निर्धारित है ।    
            भारतीय सभ्यता संस्कृति में यह मान्यता है कि रिश्तो और रिश्तो का गठबंधन यह परमपिता परमेश्वर द्वारा बनाई जाती है । अर्थात पति-पत्नी की आपस की जोड़ी ईश्वर द्वारा निर्धारित है । आदमी खुद नहीं बना सकता अर्थात् हमारा विवाह जिससे हुआ है वह ईश्वर की मर्जी से है । हम तो केवल निमित्त मात्र थे । मतलब यह कि शादी हो सकता है लेकिन वह टूट नहीं सकता वह बंधन अगले सात जन्मों का है । आप चाहे तो एक से अधिक शादी किसी मजबूरी में आकर कर सकते हैं लेकिन पत्नी को त्याग नहीं सकते या पत्नी पति को त्याग नहीं सकती है। भारतीय परंपरा में, सभ्यता संस्कृति में तलाक का कोई प्रावधान नहीं है इस संस्कृति में डिवोर्स नहीं होता । भारतीय सभ्यता संस्कृति के केंद्र में परिवार और उस परिवार के केंद्र में स्त्री होती है । एक स्त्री का प्रवेश अगर किसी परिवार में हो गया तो वह स्त्री परिवार की धुरी है । अब वह सबको गाठजोड़ करके एक साथ लेकर चलती है । यही कारण है कि आज का हिंदू समाज पहले अपने परिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करता है फिर उसे समय मिलता है तो वह समाज, धर्म और राष्ट्र के विषय में विचार करता है । पति-पत्नी को अलग करने के लिए संस्कृत और हिन्दी भाषा में कोई शब्द नहीं है । तलाक और डिवोर्स शब्द हिंदी एवं संस्कृत के नहीं है । 
         इस्लाम और ईसाइयत का मूलाधार, शासन और सेक्स है । इन दोनों सभ्यताओं का मूल लक्ष्य है शासन करना और महिलाओं के साथ व्यभिचार में लिप्त रहना । वहां स्वर्ग में पहुंचने पर 72 हूरें प्राप्त होती है और शराब की नदियां बहती रहती हैं । मतलब व्यभिचार की सारे संसाधन वहां उपलब्ध है । प्रकृति के साथ दुर्व्यवहार करना और मांस खाना वहाँ सामान्य आहार है । 
                     परिवार निर्माण करके परिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष वाली उनकी संस्कृति नहीं है । 
          कभी भी आम जनता मजबूत न हो, परिवार का निर्माण न हो,समाज संगठित न हो इसीलिए समाज की धुरी परिवार और परिवार की धुरी महिला को सुव्यवस्थित जीवन प्राप्त न हो सके । इसके लिए उन्होंने कुछ ऐसी व्यवस्था की है ताकि उनका परिवार निर्माण हो ही न सके व्यक्ति अपने कामेच्छा अनुसार महिलाओं को बदलता रहे और अपने इंद्रियों को तृप्त करता रहे इसके लिए वहां तलाक और डिवोर्स की व्यवस्था की गई । 
        यही कारण है कि इस्लाम और ईसाइयत में अपने ही खून के संबंधों को डिफाइन करने के लिए पर्याप्त शब्द नहीं है । फादर इन लॉ, ब्रदर इन लॉ इस प्रकार के शब्द गढे़ गए हैं । 
          "फूट डालो राज करो" की नीति का यह सबसे प्रथम और सूक्ष्म कड़ी है जो पति-पत्नी के बीच उत्पन्न की गई है ।
          कई बार तलाकसुदा दंपति एक दूसरे के सामने जब आते हैं तो उन्हें एक दूसरे को अपनी कमी महसूस होती है और तब ऐसा लगता है कि हमें दूसरे किसी के बहकावे में नहीं आना चाहिए था । काश हम झुक गए होते । तो आज मेरे बड़े बेटे, मेरी बड़ी बेटी का परवरिश बहुत अच्छे से हुआ होता । 
                   शेष क्रमशः आगे 
                 उत्तम प्रकाश
               वैदिक सुप्रभात
             94 16044 888

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