लोकतंत्र में राजतंत्र भाग-21 ("फूट डालो राज करो" भाग-5)
आपके मन में यह सवाल उत्पन्न होता होगा कि अगर भारतीय समाज जातिगत व्यवस्था में नहीं बटी हुई है तो वर्तमान में विभिन्न अलग-अलग प्रकार के सरनेम क्यों लगाए जाते हैं किसी के नाम के पीछे चौधरी, ठाकुर, मिश्रा, तिवारी, चौरसिया, बरनवाल, सिंह,ओझा,झा,उपाध्याय,शर्मा, अग्रवाल, राय, सोनी, कादयान, साहनी,पटेल, राणा आदि अलग-अलग प्रकार के सरनेम क्यों लगाए जाते हैं ।
किसी भी सभ्यता संस्कृति के बहुत लंबे समय तक टिके रहने के दो कारण हो सकते है । उसका अपना आर्थिक तंत्र और उसका अपना दर्शन जो न्याय पर आधारित हो ।
यहां हम आर्थिक तंत्र पर विचार करेंगे ।
भारतीय आर्थिक व्यवस्था बिल्कुल सहज , सरल और आसान है । अगर कोई व्यक्ति किसी विशेष प्रकार का कला या कारीगरी जानता है । वह प्रकृति से कच्चा माल प्राप्त करके किसी विशेष तकनीकी के माध्यम से कुछ विशेष संसाधन बना सकता है । वह इस कला को किसी भी व्यक्ति को आसानी से सिखा सकता है ।
मतलब स्पष्ट है कि अगर आप सोना संबंधी काम जानते हैं । सोना के पत्रर से आप आभूषण बना लेते हैं तो आप इस कला को अपने ही परिवार में अपनी संतान को या अन्य किसी भी व्यक्ति को आसानी से सिखा सकते हैं । ठीक उसी प्रकार अगर कोई मिट्टी संबंधी काम जानता है प्रजापति है, कोई व्यक्ति लोहा संबंधी कार्य जानता है अर्थात् वह लोहार है । यह सब कला उनके संतानों में बहुत आसानी से विरासत के रूप में यह ज्ञान संरक्षित होता चला जाता है ।
खेती से संबंधी कार्य, मिट्टी से संबंधित कार्य, सब्जियों से संबंधित कार्य, सोना से संबंधित कार्य, लोहा से संबंधित कार्य, फूलों से संबंधित कार्य, औषधियों से संबंधित कार्य, कपड़ों से संबंधित कार्य, नावों से संबंधित कार्य आदि आदि विभिन्न हजारों प्रकार के कला कार्य इस देश में समय के साथ विकसित होते रहे और यह सभी ज्ञान अपने ही परिवारों में धीरे-धीरे संरक्षित होते रहे अब जो लोग इस कार्य के संबंधित थे । उनके नाम के अंत में उसी प्रकार का सरनेम प्रयोग में आता गया । जैसे कोई व्यक्ति लोहा से संबंधित कार्य जानता है तो उसके नाम के अंत में लोहार, कोई सोना से संबंधित कार्य जानता है तो उसके नाम के अंत में स्वर्णकार, कोई मिट्टी से संबंधित कार्य जानता है तो उसके नाम के अंत में प्रजापति, इस तरह का उपनाम नाम के साथ प्रयोग में आता गया । ताकि व्यक्ति अगर अपने व्यक्तिगत पारिवारिक कार्य को छोड़कर अन्य कोई दूसरा कार्य करें तो उसको इस बात का ध्यान रहे कि मेरे पूर्वज इस कार्य में संलग्न थे ।
इससे सबसे बड़ा लाभ यह था कि अगली पीढ़ी को बहुत ही आसानी से अपने पूर्व वाली पीढ़ी से एक विशेष प्रकार का कला जो रोजगार के लिए अनिवार्य है वह बहुत आसानी से सीख लेता है । उसके अलावा अन्य अगर कोई कला उसको सीखना है तो वह आसानी से किसी गुरुकुल या अन्य आचार्य के पास जाकर उसे वह बहुत आसानी से सीख सकता है और अगर अपने पैतृक कला के अलावा और कुछ न सीख पाए तो भी कम से कम अपने पैतृक कला के माध्यम से अपने जीवन वृति को वह आसानी से चला ही लें ।
यह वह सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था भारतीयों के द्वारा बनाई गई थी ।
जिसमें कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं होगा अगर आप धोबी है कपड़ा धोना जानते हैं तो आपका बेटा बहुत आसानी से कपड़ा धोना सीख लेता है और वह उस रोजगार को बहुत आसानी से कर लेता है ।
अगर आप पुरोहित हैं तो आपका बेटा पौरोहित्य का कार्य बहुत आसानी से आपके द्वारा सीख लेता है और उस कार्य को करके अपने जीवन को बहुत आसानी से चला लेता है ।
अगर आप डोम है बाँस से विभिन्न प्रकार की वस्तुएं बनाना जानते हैं तो आपकी अगली पीढ़ी इस कार्य को बहुत आसानी से सीख कर अपने जीवन को बहुत आसानी से चला सकता है मतलब उसको अपना स्वभाविक पैतृक रोजगार उसे अपने घर में ही प्राप्त हो गया ।
रोजगार के लिए उसे भटकने की कोई जरूरत नहीं है ।
अब कोई विद्यार्थी है जिसे किसी भी प्रकार की वस्तुओं को बनाने में या वास्तु कला में किसी प्रकार की कोई रुचि नहीं है । वह शास्त्रों का अध्ययन करना चाहता है तो उसके लिए शास्त्र का अध्ययन- अध्यापन व्याकरण आदि शास्त्रों का पढ़ना भी वेदादि शास्त्रों को पढ़कर याज्ञिक काम को करना चाहता है तो ठीक है ।
कोई ऐसे भी हैं जो न शास्त्र पढ़ना चाहते हैं और न ही किसी विशेष प्रकार की कला को सिखना चाहते हैं । जिन्हें युद्ध में ज्यादा रूचि है वह युद्ध संबंधी कार्यों को सिखना चाहते है उन्हें युद्धा बनना है। और राजाओं के साथ रहकर युद्ध करना चाहते है । राष्ट्र रक्षा में उनकी ज्यादा रुचि है मतलब वह स्वाभाविक रूप से क्षत्रिय है ।
यह भारत का सामाजिक आर्थिक तंत्र था । जिसमें कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं हो सकता था । वह बहुत आसानी से किसी विशेष कला को सीख कर अपने पैतृक रोजगार द्वारा अपने जीवन को बहुत आसानी से चला सकता था ।
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के पोषक ब्रिटेन वासी जब इस देश में आए तो उनका मूल उद्देश्य इस देश को लूटना था लूटने के लिए यहां की रोजगार व्यवस्था को अपने अधिकार में लेना अनिवार्य था । इस रोजगार व्यवस्था को उन्होंने जातिगत व्यवस्था बोलना प्रारंभ किया ।
रोजगार की विभिन्न अलग-अलग व्यवस्थाओं को वे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के रूप में बदलना चाहते थे । अर्थात् एक पूंजीपति के हाथ में रोजगार की अलग-अलग व्यवस्था हो और हजारों लोग उसके नीचे उसकी गुलामी करें और उस वस्तु से संबंधित जो भी कला है वह कोई भी व्यक्ति सामान्य रूप से न सीख पाए अगर किसी को सीखना हो तो कॉलेज यूनिवर्सिटीओं में जाकर डिग्री द्वारा उसको प्राप्त करे उसे सीखे ।
मतलब स्पष्ट है कि आज के वर्तमान समाज में हमारे पास डिग्रियां तो है परंतु कला नहीं है । "आज हम डिग्री प्राप्त हुनर विहीन है" ।
परिणाम स्वरूप जीरो लेवल की तकनीकी से उत्पन्न वस्तुओं को भी आज बड़ी-बड़ी कंपनियां बना रही है ।
पहले हमारे समाज में दूध से संबंधित कार्य यादव समाज के लोग किया करते थे । पर आज देश की बड़ी-बड़ी कंपनियां सुधा, मदर-डेयरी, बापूधाम आदि कर रही हैं ।
मसाला,चटनी,आँचार,आटा, दाल, चावल,सब्जी,तेल आदि विभिन्न प्रकार की वस्तुएं जो सामान्य जन बेच कर अपना रोजगार चलाते थे । आज बड़ी-बड़ी कंपनियां इन कार्यों में उतर चुकी है और सरकारों द्वारा उन्हें बहुत बड़े पैमाने पर संरक्षण दिये जा रहे है । और हमें यह ज्ञान दिया गया तुम पढ़ो-लिखो, हमसे आरक्षण प्राप्त करो और बड़े-बड़े कंपनियों में बड़े-बड़े पदों पर ऑफिसर बनो । मतलब स्पष्ट है कि हम उनका गुलाम बने और वह रोजगार करें ।
दूसरी ओर इन कंपनियों से प्राप्त वस्तु किसी भी प्रकार से उपयोग के लिए शुद्ध नहीं होते ।
भारतीय समाज के 2 स्वरूप है एक वह जिन के पास कला है और दूसरे वह जिनके पास विद्या है जो कला सम्पन्न है वे कैसे कला विहीन हो जाए । इसके लिए उनके दिल में जो विद्या संपन्न है उनके प्रति भेदभाव उत्पन्न करना अनिवार्य था । इसलिए भारतीय आर्थिक तंत्र को तोड़ने के लिए जातिगत व्यवस्था उत्पन्न की गई और कला से संबंधित लोगों को प्रेरित करके उन्हें विद्या के प्रति आकृष्ट किया गया और वह विद्या जो कभी जीवन में काम नहीं आती शास्त्र संबंधी कोई ज्ञान नहीं बस केवल आधुनिक टेक्नोलॉजी संबंधी ज्ञान जिसका उपयोग केवल बड़ी-बड़ी कंपनियों में ही हो सकता था ताकि आप पढ़ लिखकर इन बड़ी-बड़ी पूजीपतियों के हाथों के गुलाम बन जाए और अपने पैतृक कला को बिल्कुल जड़ मूल से भूल जाए ।
अगर यह छोटे-मोटे जितने भी कला संबंधी कार्य है जो जीरो लेवल की तकनीकी पर आधारित है यह अगर बड़ी-बड़ी कंपनियों को नहीं दी जाती या बड़ी-बड़ी कंपनियां इन कार्य में अपना रोजगार प्रारंभ नहीं करती । यह संपूर्ण रोजगार सामान्य आमजन के लिए आरक्षित होता तो जो विद्यार्थी बहुत ज्यादा पढ़ाई करने के बाद भी ऑफिसर नहीं बन पाते हैं वह पुनः वापस आकर अपने पैतृक कला संबंधी रोजगार तो कर सकते थे न ।
किसी भी प्रकार के रोजगार कार्य को सीखने का एक खास उम्र होता है । ऑफिसर नहीं बनने के कारण वापस जब वह विद्यार्थी अपने पैतृक रोजगार को सीखना चाहते हैं तो एक तो उनका उम्र समाप्त हो गया होता है । दूसरा वह पैतृक रोजगार बड़ी-बड़ी कंपनियां कर रही है फलतः अब सामान्य जन द्वारा उत्पादित वस्तुए बाजार में नहीं उतर पाती है और वह विद्यार्थी उस कार्य में कुशल नहीं हो पाता है परिणाम स्वरुप वह विद्यार्थी न घर का होता है और न घाट का ।
परिणाम स्वरूप भविष्य में अब यह दिख रहा है कि घर में स्वयं ही भोजन बना कर खाना महंगा और बाजार में होटल में बैठकर खाना खाना सस्ता मालूम पड़ने लगेगा। ऐसा क्यों ? ऐसा इसलिए ताकि आप घर में खाना बनाना छोड़ दें और तीनों चारों वक्त का खाना बाजार से ही खरीद के खाए परिणाम स्वरूप बड़ी-बड़ी कंपनियों का रोजगार निरंतर चलता रहे ।
और वर्तमान में आज की नई आधुनिक महिला पीढ़ी बड़े-बड़े कोर्स करके बहुत बड़े-बड़े कंप्यूटर संबंधी कार्य कर सकती हैं लेकिन अपने घर में सामान्य रूप से भोजन बनाना उनके लिए कठिन है ।
मतलब स्पष्ट है जातिगत भेदभाव फैलाकर भारतीय आर्थिक व्यवस्था को बिल्कुल ध्वस्त कर देना और विकास का वह मार्ग प्रशस्त करना जो केवल और केवल बौद्धिक एवं आर्थिक गुलाबी का मार्ग है ।
शेष क्रमशः आगे
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9460 4428
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