अर्धनग्न समाज का कुतर्क
"अर्धनग्न समाज का कुतर्क"
महिलाओं की एक शिकायत मर्दों से हमेशा रहती है । वें अपना सोच क्यों नहीं बदलते हमारे कपड़ों पर ही उनका ध्यान क्यों अटकता है ? मर्दों को अपनी सोच बदलनी चाहिए और अपनी नियत को साफ रखना चाहिए । ऐसा उपदेश अक्सर सुनने को मिलता है ।
आईए इस विषय पर थोड़ी बहुत चर्चा कर लेते हैं ।
बात सोच बदलने या नीयत को साफ करने की नहीं है । बात यहां मानवीय प्रवृत्ति , चेतनता का विकास एवं मनोविज्ञान को समझने की है ।
मेरी अगर आप सुनें तो इस विषय पर और गहराई से विचार करना चाहिए । मनुष्यों को छोड़कर दुनिया का कोई जीव ऐसा नहीं है जो वस्त्र पहनता हो । चुकी मनुष्य का विकास वर्तमान विज्ञान के कथानानुसार जानवरों से हुआ है । तो फिर मनुष्य के वस्त्र पहनने का क्या मतलब है ? और अपने देश भारत की कहें तो यहां पर एक सन्त हुए हैं । जिन्होंने कहा कि वस्त्र पाहनने की कोई जरूरत है ही नहीं है । यह स्वतंत्र वायु और आकाश ही हमारा वस्त्र है ।
अब हमारे संत ने ही हमें नंगे रहने का उपदेश दे दिया हो तो बेचारी इन अल्पबुद्धि वाली महिलाओं पर क्या दोषारोपण करें । और अब पश्चिमी देश वालों को भी कुछ कहना समिचीन नहीं है ।
अब विचारणीय विषय यह नहीं रहा कि वस्त्र कम पहने या अधिक । अब विचारणीय विषय है कि वस्त्र पहने या नहीं , क्या नंगे रहना ठीक है ? या वस्त्र पहने ? चुकी हम सबों को छोड़कर, दुनिया में कोई ऐसा तो है ही नहीं जो वस्त्र पहनता हो ।
अब पुनः विषय पर आते हैं और विचार करते हैं ।
वस्त्र पहनने या न पहनने का संबंध व्यक्ति की अपनी चेतना के विकास पर निर्भर करता है । चेतन तत्व अर्थात् विवेक और जड़ तत्व बुद्धि का विकास जीवों में किस प्रकार हुआ है । इस विषय पर विचार करते हैं । जिससे स्पष्ट होगा कि वस्त्र पहनना या न पहनना कहां तक उचित है ।
दो प्रकार की जीव पूरे संसार में , आपको दिखाई देंगे एक वह जो स्वपोषी ( अटोट्रौप्स ) होते हैं । अपना भोजन स्वयं सूर्य के प्रकाश से फोटाॅन ,वायुमंडल से ऑक्सीजन और जमीन से जल एवं पोषक तत्व प्राप्त करके बना लेते हैं । जिन्हें हम प्लांट किंगडम कहते है । पेड़-पौधा, यह जीवों का वह स्वरुप है । जिनके पास तंत्रिका तंत्र नहीं होता । सोचने समझने के लिए किसी भी प्रकार का तंत्र या क्रियात्मक प्रतिक्रिया देने का कोई तंत्र नहीं होता है। ब्रेन यहां नहीं होता है । अध्यात्मिक दृष्टिकोण से कहें तो 5 कोषो में केवल इनके पास अन्नमय और प्राणमय कोष ही होता है । परिणामतः इन्हें सुख-दुख की अनुभूति नहीं होती है । इनके शरीर का मुख्य भाग "जड़" जमीन के अंदर स्थित होता है । उसकी प्रवृति सुर्य के प्रकाश से दूर , अंधकार की ओर जाना है प्ररिणामतः ईश्वर ने उन्हें तंत्रिका तंत्र , नर्वर सिस्टम दिया ही नहीं है ।
दूसरे वें जीव जो परपोषी है, हेटेरोट्रौप्स वे जो अपना भोजन खुद नहीं बनाते , भोजन को प्राप्त करने के लिए दूसरे जीवों पर या फिर पौधों पर निर्भर रहते हैं । इनको भी आप दो भागों में बांट सकते हैं । एक तो वह जिनके शरीर का आकार क्षैतिज और दूसरे वे जिनके शरीर वर्टिकल होता है । वर्टिकल जीवों में केवल मनुष्य और क्षैतिज में अन्य सभी जीव-जंतु आते है ।
क्षैतिज शरीर वाले सभी जीव अद्ध्यात्मिक रुप से अन्नमय , प्राणमय और मनमय कोष वाले होते हैं ।
जिनमें तंत्रिका तंत्र होता है । मष्तिक्ष आगे और शरीर का शेष भाग पीछे होते है । जौसे- सभी जलचर,थलचर, भूमि में रहने वाले एवं नभचर इनमें मनुष्य को छोड़कर । चुकी इन सभी जीवों के शरीर का आकार क्षैतिज है । परिणामतः इनके शरीर का अग्र भाग जमीन के अंदर धंसा हुआ नहीं रहता । परिणामतः इनके शरीर में मस्तिक्ष, तंत्रिका तंत्र अल्प विकसित होता है । मनुष्य के तुलना में ।पर इन में भी जो निकृष्ट जीव है जैसे कीट आदि ( आर्थोपोडा फैमिली के) अंधेरे में अर्थात् जमीन के अंदर रहना पसंद करते हैं । अब अगर चेतना की बात करे तो इन जीवो में चुकी तंत्रिका तंत्र है । इसलिए चेतन शीतलता बुद्धि, यहां उपस्थित है और फिर क्रिया-प्रतिक्रिया भी दिखाई देती है । ये सुख-दुख का अनुभव भी करते हैं पर यह चुकी भोग योनी के है और इनका मस्तिक्ष पुर्णतः ऊपर सुर्य के ओर भी नहीं होता है । इसलिए इनके बुद्धि का विकास सीमित ही हो पाता है। कुछ नैमीतिक ज्ञान इन्हें प्राप्त होता है । बहुत ज्यादा बुद्धि- विवेक का विकास नहीं होता है। उनकी बुद्धि विवेक का विकास एक सीमित क्षेत्र तक ही रह पाता है । ये सभी जीव शब्द नहीं केवल ध्वनियों को उत्पन्न कर पाते हैं । एकाद जीव को छोड़कर जैसे- तोता ।
अब बात मनुष्य की करें तो मनुष्य अध्यात्मिक दृष्टि से चार कोषों वाला है । अन्नमय , प्राणमय ,मनमय और विज्ञानमय कोष । मनुष्य उभय योनि में आता है इन्हें भोगने के साथ-साथ कर्म करने की भी पुरी स्वतंत्रता हैे । चुकी तंत्रिका तंत्र की दृष्टि से यह अत्यधिक विकसित है । और यह अपने कर्मों के अनुसार अपने तंत्रिका तंत्र को बहुत असीमित विकसित भी कर सकता है । मनुष्य चाहे तो उभय योनि से केवल कर्म योनी अर्थात् आनंदमय कोष में भी जा सकता है। इनकी चेतना की कोई सीमा नहीं है । इसकी चेतना , सीमाओं में बंधी हुई नहीं है ।
पेड़-पौधा और जीव-जंतु सभी भोग योनि के अंतर्गत आते हैं । पेड़ पौधों में तंत्रिका तंत्र नहीं होता है। इसलिए वहां पर शरीर के संरचना के आधार पर बहुत ही ज्यादा विभिन्नता है। जीव जंतु में चुकी तंत्रिका तंत्र है इसलिए यहां पर उतनी भिन्नता नहीं है जितनी पेड़-पौधों में हैं । अब मानव की बात करें तो इनमें तंत्रिका तंत्र सबसे ज्यादा विकसित होता है । इस लिए शारीरिक रूप से लगभग सब एक जैसे ही होते हैं ।
अब बात मनुष्य की करें तो मनुष्यों में भिन्नता मुख्य रुप से बौद्धिक ए़वं प्रवृति के स्तर पर है । पर शारीरिक रूप से लगभग सब एक जैसे ही होते हैं । उनके शरीर में जो अंतर होता है वह पर्यावरण पर आधारित है । हो सकता है कोई लंबाई में अधीक हो , कोई गोराई में, कोई मोटाई में और कोई सुंदरता में । पर शारीरिक ढांचा लगभग सबका एक जैसा ही होता है । यहाँ भिन्नता शरीर में नहीं पर बौद्धिक स्तर , मनुष्य एक दूसरे से बहुत ही अत्यधिक भिन्न होते है । जीव-जंतु में यह भिन्नता बहुत कम है । शेरों की अपनी बौद्धिक क्षमता लगभग सबकी समान होती है । अन्य सभी जीवो में भी ऐसा ही है वह आपने प्रकृति एवं परिवेश के साथ जीना सीख लेते हैं । पर जीवन को और ज्यादा बेहतर कर पाए इसकी समझ उनके पास नहीं है ।
चुकी मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र हैं और अपने कर्मानुसार अपनी बौद्धिक क्षमता को भी बहुत ही असीमित कर सकता है । इसलिए मनुष्य में बौद्धिक भिन्नता बहुत अधिक है और फिर यहां भावनाओं के संचरण के लिए शब्द, शब्दावली भी है। साथ ही मनुष्य के अंदर शुक्राणु बनने की प्रक्रिया पूरे वर्ष रहता है । यह जरूर है कि साल के दो- तीन महीने अधिक मात्रा में बनता है । पर जीव-जंतु में शुक्राणु साल भर नहीं बनते परिणामतः काम वेग एक निश्चित समय में होता है परंतु वही मनुष्य में कामवेग पूरे साल बना ही रहता है । ठंड के मौसम में कामवेग और ज्यादा बढ़ जाता है । यही कारण है कि हमारे यहां ठंड के ठीक बात वसंत में लगन प्रारंभ होता है ।
जीव-जन्तुओं की तरह अगर मनुष्य की बौद्धिक क्षमता सबकी एक समान होती तो सभी एक जैसा ही सोचते । जैसे पशु में कोई एक पशु एक दिशा की ओर चलता है तो सारे सभी उसी दिशा की ओर चलने लगते हैं कतार बनाकर । पर मनुष्य में ऐसा नहीं है । मनुष्य की बौद्धिक क्षमता , बौद्धिक विकास में इतनी ज्यादा भिन्नता है कि सब अपनी तरह से अलग-अलग सोचते हैं सब की सोचने समझने की दिशा और प्रवृति अलग-अलग है । सबकी सभ्यता, संस्कृति,रहन-सहन ,खान-पान, आओहवा, आत्मिक भावनाएं भिन्न-भिन्न होता है । परंतु पशुओं में यह सारी चीजें लगभग एक समान होती है । मानसिक भावनाएं एवं कामवेग भी सीमित दायरे तक रहती है ।
अतः मनुष्यों की बीच शरीर के उभार और उत्तेजक अंगों को ढ़क के रखना ही ठीक है । अन्यथा मनुष्य समाज एक उम्र के बाद कामवासनाओं में ही फंसकर रह जाएगा । मनुष्य जीवन शारीरिक आनंद में ही फंसकर रह जाएगा । ज्ञान का मार्ग प्रशस्त ही नहीं हो पाएगा । आप उदाहरण के लिए भारतीय संस्कृति को छोड़कर दुनिया की अन्य संस्कृतियों को देख सकते हैं । वहां संस्कार के नाम पर विवाह और अन्तेष्ठी संस्कार ही होते है। भारत में 16 संस्कार करने की परंपरा है ।
अतः मेरे हिसाब से मानवीय समाज को वस्त्र पहनना ही उचित है । क्योंकि यहां मनुष्यों में बौद्धिक भिन्नता बहुत अधिक है । और कामवेग पूरे साल बना ही रहता है । भावनाओ के संचरण के लिए यहां शब्द भी उपलब्ध है । यही कारण रहा होगा की हमारे मनीषियों ने मनुष्य समाज में वस्त्र पहनने के परंपरा प्रारंभ की । यूरोप अमेरिका आदि देशो में वर्तमान में toplessness की परंपरा विकसित हो रही है । कमर के ऊपर किसी भी प्रकार का वस्त्र नहीं पहनना है ।
मैं अपनी ओर से बहुत कोशिश किया हूं आपको अपनी बात समझाने की । पर संभवत हो सकता है इसको , आपको दो तीन बार पढ़ना भी पडे़ ।
कृप्या अगर लेख में किसी प्रकार की कोई त्रुटि या कमी हो तो जरुर बताएं । ताकी मैं उसे सुधार करपाऊँ ।
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वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9416044828
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