शतरंज , Chess

स्वामी जी के दर्शन के लिए एक दिन केदारनाथ खत्री, गुरुसहायमल के साथ पाठशाला में पहुंचे। 
स्वामी जी भांप गये, गुरुसहायमल से बोले इन्हें कह दो यहां शतरंज नहीं है । 
         उत्साह से खत्री जी, मैं अभी लिये आता हुं। अब स्वामी जी क्या करते ? खत्री जी शतरंज लाए । 
स्वामी जी ने आठ प्रकार के भिन्न-भिन्न शतरंजों के विषय में बताया। 
         फिर नयनसुख ( एक नगर वासी रत्नाकार  जो स्वामी जी मिलने आता रहता था ) को निर्देश दिए - नयनसुख देखो तुम दो काम करना , जो मोहर मैं कहूं वह चलना और लाला (खत्री जी ) जो मोहर चलें वह मुझे बता देना। 
नयनसुख - हां जी  
स्वामी जी - अब बादशाह का प्यादा चलो। 
नयनसुख, चल दिया, महाराज । 
स्वामी जी, लाला क्या चले हैं ? 
नयनसुख, वह भी बादशाह का प्यादा ही चले हैं।
                इस प्रकार नयनसुख स्वामी जी के आदेशानुसार उनके मोहरे चलाते रहे। कुछ समय पश्चात् खेल समाप्ति पर था। 
स्वामी जी ने कहा अब तक हम दोनों की एक सौ इकहत्तर चालें हुई हैं। मैं अब एक सौ बहत्तरवीं चाल चलता हूँ। 
स्वामी जी ने घोड़े की किश्त दिलाई। केदारनाथ खत्री ने बाईं ओर हाथी के पास बादशाह को हटा लिया। तब स्वामी जी कहने लगे किश्त ऊंट की भी लग सकती है परन्तु वजीर की शय दो और कह दो मात । 
नयनसुख अभी वजीर को छूने ही लगे थे कि "खत्री जी"अपने बादशाह की हालत पर हैरान हो गए। वे अनायास बोल उठे. क्या खूब करामाती मात है ! 

स्वामी जी का पुरा नाम प्रजाचक्षु "गुरुवर विरजानंद  दण्ड़ी" है । ये वही संन्यासी है जिनके शिष्य महर्षि दयानंद सरस्वती थे । जिन्हें स्वामी दयानंद व्याकरण के सुर्य कहते थे । 

प्रश्न - स्वामी जी चाल चलने हेतु नयनसुख को क्यों कहते थे ।
उत्तर - दण्ड़ी जी लगभग पांच वर्ष की आयु से ही नेत्रहीन थे। 

              बताते है कि इसके बाद गुरुवर दण्ड़ी जी कभी शतरंज नहीं खेलें । 

वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9416044828

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