आओ हम सब गुलाम बने भाग -2
बाहुबल का प्रयोग करके आप गुलाम बना सकते हैं परंतु वे मजबूत होकर अपनी स्वतंत्रता को पुनः प्राप्त कर सकते है। आप बहुत लंबे समय तक किसी को गुलाम नहीं बना सकते परंतु अगर सदा के लिए आप उन्हें गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं तो इसका सबसे सरल और आसान तरीका है । उनके व्यापार के केंद्र में प्रयोग किए जाने वाले विनिमय के संसाधन को ही अपने अधिकार में कर लें । ताकि उसका संपूर्ण व्यापारिक तंत्र आपके अधीन हो जाए । उसके व्यापार में प्रयोग किए जाने वाले संसाधन आपके द्वारा उत्पादित की जाए और आपसे लेकर वह अपना व्यापार चलाएं । अगर यह आपने कर लिया तो समझ लीजिए सदा सदा के लिए वें आपके गुलाम हो ही जाएंगे ।
अपने देश भारत में वस्तु विनिमय हेतु सोने - चांदी के सिक्के का प्रयोग लंबे समय तक होता रहा । उन सोने - चांदी के सिक्के अलग-अलग रियासतों का अपना-अपना अलग-अलग होता था जिसके मूल्य भी आपस में भिन्न होते थे।
चुकी देश को गुलाम बनाना था इसलिए विनिमय संसाधन को अधीनस्थ करना ज़रूरी था। इसके लिए बाहरी आक्रामकताओं ने देश में बैंक खोलना आरंभ किया और उन बैंकों के माध्यम से ( अर्थात विधिवत कानूनी तौर तरीके से भ्रष्टाचार का बीजारोपण हुआ ) कागज के नोट जारी किए गए ब्रिटिश इसमें नंबर वन बने । धीरे-धीरे इन बैंकों में सोना इकट्ठा होता रहा और कागज के टुकड़े हमारे हाथ में आते रहें । मतलब हमारे हाथ में धीरे-धीरे कागज के टुकड़े आते गए और उनके पास हमारा रखा हुआ सोना जाता रहा ।
अब आइए एक बार बैंकिंग सिस्टम को समझ लें । मान ले किसी बैंक के पास 1000₹ है उसके पास पांच अलग-अलग आदमी 100₹ - 100₹ रुपए का लोन लेने गए । प्रत्येक व्यक्ति को 1 साल के बाद 110₹ लौटाना है ।
अब बाजार में 5 लोगों के पास छोटे बड़े सभी नोट मिलाकर कुल 500₹ ही है परंतु 1 साल के बाद बैंक को 550₹ लौटाने है सवाल यह बनता है कि 50₹ कहां से आएगा कोई आम जनता अपना व्यक्तिगत नोट बनाकर दे नहीं सकता । पहले से बाजार में नोट नहीं है।
अब अंत में यही होगा कि चार व्यक्ति मिलकर 440₹ बैंक को लौटा देंगे और एक व्यक्ति पूर्णतः दिवालिया हो जाएगा अर्थात् उसकी सारी संपत्ति को बैंक अपने अंतर्गत ले लेगी और उसकी बोली लगाएगी कुछ लोग बैंक से ही लोन लेकर उसकी संपत्ति को खरीद लेंगे और यह कर्म धीरे धीरे चलता रहेगा।
अब एक और उदाहरण से समझे, मान लें किसी बैंक के पास कुल दस 10000₹ है और 5 व्यक्ति ने एक-एक हजार का लोन बैंक से ले लिया। अब बैंक के पास कुल 5000₹ बचना चाहिए था क्योंकि 5 व्यक्तियों ने 1000₹ करके कुल 5000₹ लोन लिया है। पर ऐसा नहीं हुआ बैंक के पास कुल ₹8500 बचे हुए हैं । कैसे ?
लोन लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति के पासबुक में 1000₹ उन्होंने लोन लिया ऐसा शब्दों में और अंकों में लिख दिया गया परंतु ऐसा हुआ नहीं। हर व्यक्ति ने अपनी जरूरत के हिसाब से 100, 200 ,300, 400 एवं 500₹ ही बैंक से निकाले है बाकी उसके बचे हुए सारे पैसे बैंक में ही है।
बैंक के पास अपनी मूल पुजी 10000₹ है। 5 लोगों के द्वारा एक-एक हजार रुपया करके जो लोन लिया गया है उसमें से मात्र उन्होंने कुल मिलाकर 1500₹ ही निकाला है बाकी 3500₹ बैंक में पड़े हुए अर्थात बैंक के पास अभी ₹8500 है
बैंक से जिन लोगों ने लोन लिया है वह बारी-बारी बैंक से पैसा निकालते भी हैं और बैंक के अपने खाते में पैसा डालते भी। यह शिल-शिला चल रहा है।
मतलब यह है कि कोई व्यक्ति 500₹ निकलता है फिर कुछ दिन के बाद 300₹ डाल देता है फिर 400 निकलता है फिर से 100₹ डाल देता है इस प्रकार करके हर व्यक्ति पैसा डालते और निकालते रहते हैं ।
बैंक में बची हुई 3500₹ ( बैंक ने 5000₹ दिया था लोगों को लोन के रूप में पर उन में से लोगों ने मात्र 1500₹ ही निकाला है बची हुई राशि 3500 ₹) में से बैंक ने फिर 5 व्यक्तियों को एक-एक 1000₹ करके लोन दे दिया और उन पांच व्यक्तियों द्वारा भी कुल राशि 1000₹नहीं ली गई उन्होंने भी कुल मिलाकर के 1500₹ ही बैंक से निकाला फिर भी 2000₹ बैंक के खाते में अभी बचा हुआ है तो कुल मिलाकर बैंक ने 10000₹ रुपए लोगों को लोन दे चुकी है लेकिन बैंक के पास अपनी पूरी पुजी में से मात्र 3000₹ रुपए ही खर्च हुए हैं और साल भर के बाद बैंक को कुल मिलाकर 11000₹ ब्याज सहित प्राप्त होने वाला है और बैंक के पास अपनी बच्ची 7000₹ है कुल मिलाकर साल भर में बैंक के पास 10000₹ से 18000 रूपया हो गया। अब अगर बैंक में बची राशी 7000₹ को बैंक का लोन देता रहे तो और भी अधिक आमदनी कर सकता है।
अब तक बाजार में कुल मिलाकर बैंक ने ₹3000 दिए हैं परंतु उसको बाजार से ₹11000 ब्याज सहित कैसे प्राप्त होगा।
बिल्कुल सीधी, सरल और आसान सी बात है इसमें से अधिकतर लोग दिवालिया होंगे। जो लोग दिवालिया वाला समान खरीदेंगे वह पुन: बैंकों से लोन लेंगे । धीरे-धीरे छोटे व्यापारी बर्बाद होंगे और बड़ी-बड़ी कंपनियां बहुत तेजी से फलेंगी-फुलेंगी। और अब आप पूरे भारत को अपनी पैनी नजरों से देख सकते हैं। भारत के जितने भी लघु उद्योग थे और जितने भी गांव में काम करने वाले कामगार थे वह सब समाप्त हो चुके हैं।
आधुनिक समय आया, भारत की आम जनता ने बैंकों में पैसा रखना प्रारंभ किया। बड़ी-बड़ी कंपनियों को लोन के रूप में बौंको से बहुत अधिक पैसा मिला (जो आपने जमा कर रखा था वही पैसा लोन के रूप में कम्पनिओं के पास गया ) और उन्होंने इस देश में विभिन्न प्रकार की कंपनियों को खड़ा किया ।
पैसा हमारा है, जमीन हमारा है, प्राकृतिक संसाधन हमारा है, इन कंपनियों में काम करने वाले मजदूर हमारे है , अभियंता (इंजीनियर ) भी हमारे ही है, इनको कानून बनाकर प्राकृतिक संसाधन लुटने का अधिकार देने वाली सरकारों को हमने ही चुना है, बाजार हमारा है, ग्राहक हम खुद है, व्यापार उनका चला और दरिद्र हम हुए , भ्रष्ट हम हुए, बेरोजगार हम हुए, बीमार हम हुए।
आधुनिक शिक्षा से पढ़कर निकलने वाले जिनका पेट भरा हुआ है। उन्होंने इन सभी समस्याओं का मूल जड़ देश की जनसंख्या को बताया। और हमने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। बेरोजगार इंसान रात में क्या करेगा?
शेष आगे......
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9416044828
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