प्रेम ( उपन्यासांश )

                    मकान के बाहर दिये धरने की रस्म के बाद जूही मोतीबाई के घर आई। जूही यौवन के वसन्त में थी। बडी आँखो में चमक। नीचे देखने के समय लम्बी बरौनिया लाज के पावडे से डालने वाली। परन्तु कुछ उदास थी। मोतीबाई ने नौकरानी को पौर में विठला दिया और जूही के साथ एकान्त में बातचीत करने लगी।

पूछा, 'आज उदास क्यों हो ? क्या बात है ?"
जूही ने उत्तर दिया, 'वे आये हुए है विठूर वाले सरदार।' 

मोतीबाई - 'तब तो तुम्हें प्रसन्न होना चाहिये था। देखती हूं बिलकुल उल्टा। मुंह लटका हुआ।"

जूही - आज पहली बार ही बात हुई रूखे बोले।' 
मोतीबाई - किस प्रसंग पर ।"
जूही  - 'उन्होंने अपने निवास स्थान पर बुलवाया। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। मुझे संकोच हुआ। परन्तु हिम्मत करके चली गई। सामने पहुंचने पर मैं शरम से डूबने लगी। मुश्किल से मुस्कराकर हाथ जोड़े और चुपचाप खड़ी हो गई।'

मोतीबाई - अभिनय तो बुरा नहीं था?"
जूही - अभिनय ही तो नहीं था अभिनय करना चाहा, नहीं कर सकी। मैं अपने को भूल गई। उन्होंने भौंहें सिकोड़ कर कहा क्या सेना में जाकर ऐसी ही खड़ी हो जाती हो? मैंने तब कुछ निवेदन किया। 

मोतीबाई - 'वे जल्दी में होंगे । उतावली कर गए....
जूही -'मुझे तो अचरज हुआ। पहले कई बार देखा-देखी हुई थी।

मोतीबाई- 'आजकल में?
जूही- 'नहीं, कई महीने पहले जब वे कर्नल साहब के यहां आकर ठहरे थे।'

मोतीबाई – 'तब क्या हुआ था, में समझी नहीं ।

जूही- 'उनको देखकर न जाने मन मे कैसी उथल-पुथल हो जाया करती थी। उन्होंने देखा एक क्षण भर । उसी क्षण के भीतर कुछ इस प्रकार देखें कि मुझको ऐसा लगा मानो घण्टों देखते रहे हो। मैंने तो शीघ्र आंखें हटा ली थी। फिर मकान के पास से निकले । मैं आहट पाकर उनकी आंख के रास्ते में आ गई। उन्होंने बहुत कम देखा. परन्तु मैं बहुत देर बार-बार देखती रही। वे चले गये। मुझे बहुत खला ।

मोतीबाई - 'होता है। फिर क्या हुआ ?"
जूही - 'वे यहां दो-तीन दिन रहे। मैंने निरन्तर उनकी अच्छी तरह देख भर लेने की कोशिश की। उन्होंने देखा ।  मैं घबरा गई। मैंने फिर उनकी दृष्टि को पकड़ने का प्रयास किया, परन्तु वह किसी ख्याल में ऐसे मस्त थे, कि उनको जूही के मकान का भी स्मरण न रहा होगा। जिस दिन जाने लगे, मैंने खिड़की में से निर्लज होकर उनको नमस्ते किया। उन्होने बिना किसी लिहाज के मुस्कराकर मेरी नमस्ते का जबाब दिया ।' 

मोतीबाई - 'तब और क्या होता ?"
जूही- 'उनको जाते-जाते कुछ समय मिल गया। घर पर आने की कृपा की।'

मोतीबाई - 'तब तुमने बतलाया था।"
जूही-- 'मैं सहम गई। सिर नीचा किये खटी रह गई। बोले, यदि मुझको खुश करना चाहती हो, तो मोतीबाई जी जो कुछ काम बतलावें, उसको बहुत होशियारी के साथ किया करो। मैंने हामी का सिर हिला दिया, परन्तु मुख से बोल नहीं निकला। उन्होंने कहा, हृदय की बात जीभ को न मालूम होने पावें । मुझको तुम्हारा हाल मालूम होता रहेगा । ईश्वर तुम्हारी मदद करें और वे चले गये। मैंने बहुतेरा उनकी आंख के चमत्कार को देखने का प्रयत्न किया, पर वे नहीं मुड़े । मैंने उनकी पीठ को इस तरह निगाहें गड़ाकर देखा जैसे वे देख हो रहे हो । चले गये । उसके बाद जो कुछ करती रही हू, आपको मालूम है।'

मोतीबाई - मैं महारानी साहब को सुनाती रही हूँ। वे सरदार साहब को सूचना देती रहती है।"
जूही- 'अभी बीच में एक दिन के लिये और आये थे।' 

मोतीबाई- 'हूं ।'
जूही- 'तब भी घर पर आये थे बहुत थोडी देर के लिये । मैंने निश्चय कर लिया था— उनको जी भरकर देखूंगी। न देख पाया । उन्होंने कुछ बातें पूछी। कुछ बतलाई । मेरा सिर और आंखे इतनी भारी हो गई थी, कि उठा न पाई। उनकी सुनती गई और मंजूर करती चली गई। नीचे-नीचे जरा सा देख लेती थी, वे बात कर मुस्कराते थे और मुझको मन में गुदगुदी सी झकझोरती थी, मैं खूब हंस कर कुछ कहना चाहती थी। हंस कतई नहीं पाई, बात भी कम कर पाई। जो कुछ बात हुई आपको सुना दी थी, परन्तु और सब कहने का उस दिन मौका न आया था ।

मोतीबाई- 'अरि पगली, इसमें उदास होने की कौनसी बात हुई ?" 
जूही- 'नहीं बाई जी । मैं जो कुछ कर रही हूं । आपके और अपने राजा-रानी के नमक से अदा होने के लिये। चाहे मैं मार भले ही डाली जाऊँ, परन्तु क्या वे मेरे सिर पर एक बार हाथ भी नहीं फेर सकते थे ?"

मोतीबाई-'यह उनकी गलती है। काम करने वालो का मन रखने के लिये, बढ़ावा देने के लिये बहुत मिठास वरसना चाहिये ।' 
जूही-'वह तो आप से मुझको बहुत मिल जाता है।"

मोतीबाई — 'किसी दिन रानी साहब के सामने तुमको पेश करूंगी । वह बहुत देर बात करेंगी ।" 
जूही- 'मेरा जिकर तो होता होगा "

मोतीबाई — 'बहुत बार, परन्तु वे अभी बहुत लोगों से मिलना उचित नहीं समझती । एक दिन आवेगा, जब तुम उनकी सहेली सेना में भर्ती हो जाओगी।
जूही - मैं चाहती हूँ उनके कदमो में मेरा सिर कटकर गिरे ।'

मोतीबाई – 'सरदार साहब के पूछने पर तुमने क्या निवेदन किया ?"
जूही - उनकी रुखाई से मन टूट सा गया था। इसलिये पहले तो मैं जमीन को अंगुठे से खोदने लगी, फिर हिम्मत करके बतलाया कि फौज के हिन्दू-मुसलमानो को ईसाई बनाने की कोशिश की जा रही है, उन्होंने ब्योरा मांगा । मैंने कहा कि सिपाहियों को लोभ दिया जा रहा है, कि यदि वे ईसाई हो जायें तो उनका वेतन भत्ता बढ़ा दिया जावेगा और जो सिपाही पहले ईसाई होगा उसको तुरन्त हबलदार का पद दे दिया जावेगा। बाकी कुछ नहीं कह सकी, क्योंकि रो डालने को जी चाहता था । यह कहकर चली आई कि फिर बतलाऊँगी, अभी पूजा करनी है। मुश्किल से लक्ष्मी पूजन करके दिए धर कर आपके पास चली आई हूं।

मोतीबाई ने जूही को लिपटा लिया। उसने जूही को रोने नहीं दिया।
बोली, 'योही फुसफुसा नहीं जाना चाहिये देखो वे कितना कठिन और कितना नाजुक काम कर रहे हैं। नाटक-शाला में जो लोग तमाशा देखने आते थे, क्या वे घर से हंसते-हंसते आते थे ? संसार के दर्द को विसारने के लिये लोग नाटकशाला में बैठ जाते हैं। उनकी रुखाई या अवहेलना को देखकर यदि हम लोग रंगमञ्च पर उदास या उदासीन हो जाए, तो खेल बनेगा या विगड़ेगा ?"

जूही ने मोतीबाई के कन्धे पर अपनी आखें छिपाकर कहा, 'रंगमंच पर हम अपने असली रूप में जाते ही कब हैं ?" 
मोतीबाई ने जूही को ठेस को समझ लिया । बोली, 'मैं उनका जवाब तलब करू ?"

जूही ने तुरन्त आंखें गडा़कर कहा, 'आपसे कैसे बनेगा ?"
मोतीबाई — 'अपने को भूल जाऊंगी और अभिनेत्री वन जाऊँगी । तुम सिपाहियों के सामने क्या किसी प्रकार का भी लाज संकोच करती हो ?" 

जूही- 'बिलकुल नहीं। मुझको मालूम ही नहीं पड़ता कि मैं-ऐ- गैरो से बात कर रही हूं और क्या खुरापात बके जा रही है । आंखें मेरी कुछ नहीं देखती - कान अलबत्ता खूब खुले रहते हैं ।' 

मोतीबाई — 'और उनके सामने ?"
जूही ने भोलेपन के साथ कहा, 'उनके सामने तो रोमाञ्च हो हो आता है-पसीना सा आ जाता है। सिट्टी सो भूल जाती है। क्या आप उनसे कुछ कहोगी ?"

मोतीबाई बोली, 'आज ही मिलुंगी और कहूंगी।'
जूही ने अनुनय के साथ कहा, 'नहीं मेरी ओर से कुछ न कहियेगा - कम से कम, मैंने जो कुछ कहा है, वह न बतलाइयेगा । शायद मेरा भ्रम ही हो ।
वे बुरा मान जायेंगे। शायद रानी साहब बुरा मान जावें । मैं रानी साहब को अपना देवी देवता समझती हूं। 

मोतीबाई-'मैं मुर्ख नहीं हुं । इस तरह न कहुंगी कि वे समझे तुमने कोई शिकायत की है। तुम्हारा काम व्योरेवार बतलाऊंगी। खुश होंगे और तुमसे मिलेंगे। 

'कर्नल साहब की हवेली पर ?'
मोतीबाई-'फिर कहां ? तुम्हारे मकान पर ?'
जूही -- 'आपके मकान पर आ जाऊंगी।'
मोतीबाई-'देखुंगी , वे जहां उचित समझें।


( प्रश्न - वह रानी कौन है। )
( प्रश्न - जूही किससे प्रेम करती है।)

निम्नलिखित नं पर उतर भेजें ।

वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9416044828









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