नवरात्र
नवरात्र अर्थात् प्रतिपदा से लेकर अगले नवरात्रि तक चांद के प्रकाश में बैठना है । और जिस भी पूजा पद्धति को मानते हो उसका पालन करते हुए अपने इष्ट देव को याद करना, मन्त्रों का जाप करना , ध्यान लगाना, मतलब जो आपको उचित लगे।
चांद के प्रकाश में ही क्यों ? क्योंकि चांद का प्रकाश ही फलों, सब्जियां ,औषधियों और फूलों में मिठास लाता है, रस भरता है, सुगंध भरता है , इसलिए चंद्रमा को हम मामा कहते हैं । और फिर हमारे शरीर में जल की अधिकता होने से हम चंद्रमा को अधिक प्रिय है । चंद्रमा अपना प्रभाव हम पर छोड़े बिन नहीं रह सकता ।
अब वर्ष में दो बार क्यों ? वासंतिय एवं शारदीय नवरात्र । मोटे तौर पर अगर हम वर्ष को विभाजित करें तो ठंडी और गर्मी दो मौसम बनते हैं । जिसे हम शरद , गरम भी कहते हैं । चैत्र शुक्ल और आश्विन शुक्ल के प्रथम नवरात्र में ही नवरात्रि क्यों ?
अब विस्तार पूर्वक समझने की जरूरत है ।सफाई जरूरी है चाहे वह घर का हो या शरीर का । हम रोज नहाते हैं ताकि शरीर को साफ कर सके । केवल पानी से सफाई अच्छी तरह नहीं हो पाती इसलिए साबुन, सेंपु, तेल, उबटन, दूध आदि विभिन्न प्रकार के द्रव्यों का प्रयोग करते हैं । शरीर को साफ करने के लिए । अगर किन्हीं कारणों से स्नान नहीं कर पाए तो पुरा दिन मन अपने स्वामी को भला-बुरा सुनाता रहता है ।
शरीर की सफाई ऊपर से करना जितना जरूरी है उतना ही अंदर से भी । नहीं तो रोग और व्याधियों का घर यह शरीर बनेगा ।
घर को साफ करने के लिए हम सप्ताह में एक दिन का छुट्टी लेते हैं । उस दिन घर की अच्छी तरह सफाई की जाती है बाकी रोज तो हम छाडु लगाते ही हैं । लेकिन अगर दीपावली आने वाला हो तो हम पूरे घर की सफाई बहुत अच्छी तरह करके रंगाई, पुताई भी करते हैं और कबाड़ आदि सब बेच देते हैं ।
काम तो यह शरीर भी करता है छुट्टी इसे भी चाहिए । जब से आप दुनिया में आए हैं तब से आपका हृदय धड़क रहा है । अगर आप हृदय को छुट्टी नहीं दे सकते तो कम से कम उसके रास्ते में जो रोड़ा है, नस -नाडियों में जो कचरा भरा पड़ा है उसे साफ करने का मौका तो दे ही सकते है । इसलिए पक्ष में एक दिन अगर आप कुछ भी बाहर से आहार न लें तो शरीर अपने स्वयं के अंदर की सफाई करके उन कचरो को बाहर निकल सके । क्योंकि बाहर से आए हुए आहार को पचाने की प्रक्रिया में अगर शरीर व्यस्त रहा हमेशा के लिए तो अंदर की सफाई वह कभी कर नहीं पाएगा । और आपका यह सुंदर शरीर रोग एवं व्याधियों का घर बन के रह जाएगा ।
सरकारी कानून है की सप्ताह में एक दिन छुट्टी दफ्तर में होना ही चाहिए डीआरडीओ में तो दो दिन का होता है । पर यहां आयुर्वेद तो पक्ष में एक दिन अर्थात् 15 दिन में केवल एक दिन की छुट्टी की बात कर रहा है यह तो मिलना ही चाहिए शरीर को।
हर पक्ष के एकादशी को ही क्यों ? ताकि शरीर को चंद्रमा का भी सहयोग मिल सके शरीर की सफाई करने में । हमारे शरीर में भी उतना ही जल है जितना पृथ्वी पर । चंद्रमा के प्रभाव के कारण जो ज्वार-भाटा समुद्र में उठता है ठीक वही प्रभाव हमारे शरीर पर भी पड़ता है । इसलिए यह उपवास एकादशी को ही कर लेते हैं ताकि पूर्णिमा का चांद हमारे ऊपर उतना अधिक प्रभावित न हो और एकादशी का चांद ऑटोफैगी (एक बायोलॉजिकल प्रक्रम ) द्वारा शरीर के प्रत्येक कोशिकाओं का मल बाहर निकालने में सहयोग प्रदान कर सके । चंद्रमा का कला जितना ही कम होगा वह आपके शरीर को उतना ही कम प्रभावित करेगा । एकादशी आधा से अधिक एवं पूर्णिमा से कम है ।
फिर साल में दो बार नवरात्रि की क्या जरूरत ? 24 पक्ष में 24 बार एकादशी आया तो शरीर की सफाई हो चुकी है फिर यह दो बार 9-9 दिन की सफाई करना क्यों जरूरी है ?
हमें पता है की मौसम का प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ता है । प्रत्येक मौसम का खानपान भिन्न-भिन्न है । जिस मौसम में जो भोज्यपदार्थ उत्पादित होता है उस भोज्यपदार्थ पर उस मौसम का प्रभाव पड़ता है और वह भोज्यपदार्थ आपके शरीर को भी उसी मौसम के हिसाब से प्रभावित करता है ।
अगर मौसम गर्मी का है तो आपके शरीर में धीरे-धीरे पित्त का संचय होता जाएगा । क्योंकि आपने वही सब कुछ खाया है । लेकिन अब गर्मी के बाद ठंड आने वाला है । गर्मी का यह पित्त मौसम बदलने पर रोग उत्पन्न करने वाला है । गर्मी में संचित पित्त बरसात के मौसम में विभिन्न प्रकार के ज्वर उत्पन्न करते हैं और उससे बाहर निकल पाना बहुत ही दुर्लभ होता है । इसी मौसम में यमराज हर गली-मोहल्ले में भैंस पर बैठकर हर पचाटी के आगे घूमते हुए आपको दिख जाएंगे । इसीलिए हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं "जीवेम शरद: शतम्" अर्थात् हे भगवान हम 100 शरद ऋतु देख सके । क्योंकि बरसात के मौसम में विभिन्न प्रकार के कीट, विषाणु एवं जीवाणु प्रकृति में उत्पन्न होते हैं जो विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करेंगे । और आपके शरीर के अंदर उत्पन्न हुए पित्त आपको रोगी बनाएंगे ।
दुर्ग अर्थात् भवन, दुर्गा अर्थात् भवन का स्वामी । फिर माता क्यों ? क्योंकि आत्मा शब्द स्त्रीलिंग है । शरीर अगर दुर्ग है तो उसमें रहने वाली आत्मा दुर्गा है ।
दुर्ग नामक शरीर में रहने वाली यह जो दुर्गा है उसे अपने दसों इंद्रियों (अर्थात् हाथों ) पर बस करके और पित्त जनित पदार्थ का त्याग करके उपवास करना है । केवल उन्हीं वस्तुओं को भोज्य पदार्थ के रूप में लेना है जिससे पित्त का शमन होता हो । मतलब चतर-पटर कुछ भी नहीं खाने ।
पित्त जनित पदार्थ अर्थात् जिनके पचने पर अम्ल उत्पन्न होता है उसे नहीं खाने जैसे :- नमक, मिर्च, मसाला ( दालचीनी, तेजपत्ता, लौंगादी ),सूखे मेवा (काजू, किशमिश, पिस्तादी ), कोई भी खट्टे फल संतरादी, चाय-कॉफी, गर्म तासीर की कोई भी सब्जी अरबी,बैंगन, कटहल आदि नहीं खाने है । मतलब स्पष्ट है कटु, अम्ल, लवण रस का सेवन नहीं करना है इससे पित्त बढ़ता है । मधुर, तिक्त और कषाय रस का सेवन करना है इससे पित्त घटना है । मुनक्का, जामुन, आंवला, कोहड़ा, अमरूद सिंघाड़ा,चौलाई का शाग, उगा हुआ जौ ग्रहण कर सकते हैं यह सब पित्तनाशक होता है । केला छोड़ कर । कोई बर्दाश्त न कर सके तो सेंधा नमक ले सकते हैं ।
पहाड़ों से बहती हुई आ रही नदी में घंटों स्नान करने से भी पित्तदोष दूर हो जाते हैं। क्योंकि यह जल पत्थरों से चोट खाती हुई आई है रात्रि में चंद्रमा और दिन में सूर्य की प्रकाश से यह पोषित है । इसलिए यह जल पित्तनाशक है । ये बात हुई शारदीय नवरात्रि की जो आश्विन मास में पड़ता है ।
अब वसंतीय नवरात्रि की बात करते हैं ।
यह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से अगले 9 दिन तक चलता है । ठंड समाप्त हो चुकी है अब धीरे-धीरे गर्मी आने वाली है । ठंड के कारण हमारे शरीर में कफ बहुत अधिक बढ़ चुका है । शरीर के अंदर संचित कफ पित्त की तरह जानलेवा नहीं है क्योंकि इस मौसम में सूक्ष्मजीव एवं कीट उत्पन्न नहीं हुए हैं । परंतु रोग कारक यह भी है ।
अब हमें वे सारे चीज नहीं खाने जिससे कफ शरीर में बढ़ता हो । मधुर, अम्ल और लवण रस से कफ बढ़ता है । सारे मीठे फल, खट्टे फल, नमक, मसाला, केला, घी, दूध, दही, खोआ, चीनी, मैदा, ईख का रस, नारियल, खजूर, कटहल, महुआ , बेर, गूलर, बादाम, पिस्ता, अखरोट, चिलगोजा, चिरौंजी आदि नहीं लेना है ।
कटु, तिक्त एवं कषाय रस कफ नाशक होता है । अनार, आंवला, करेला, अमरूद, दालचीनी , अदरक, जीरा, जामून ,जौ की रोटी मूंग के दाल के साथ ले सकते हैं । मन न माने तो सेंधा नमक प्रयोग कर सकते हैं ।
इस प्रकार शारदीय नवरात्र में पित्त नाशक पदार्थ का सेवन एवं पित्त कारक पदार्थ का त्याग । ठीक उसी प्रकार वसंतीय नवरात्र में कफ कारक वस्तुओं का त्याग एवं कफ नाशक वस्तुओं का प्रयोग करके हम इन नवरात्र के उपवास को पूरा कर सकते हैं जिससे हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करने वाले कफ एवं पित्त का जो संचय मौसम अनुसार हुआ है वह शरीर में पूर्णतया सम हो जाता है और फिर हम अगले 6 माह के लिए पूर्ण स्वस्थ हो जाते है।
आत्मा अपने इंद्रियों को अधिकार में लेकर शरीर के उन रोगाणुओं से लड़ती है जो यमराज है वही आत्मा दुर्गा है । आपके मन में एक सवाल अभी भी रह गया होगा कि यह उपवास लगातार 9 दिन क्यों चला ।
आज के टेक्निकल भाषा में बाहर से आए हुए रोगाणु को एंटीजन कहा जाता है। जिसे मारने के लिए हमारा शरीर बी कोशिकाओं का श्रेणी एंटीबॉडी बनता है। जिसको बनने में लगभग शारीरिक दक्षता, रोग प्रतिरोधक क्षमता के अनुसार 6 से 7 दिन लग जाते है । अगर प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो तो दिन अधिक भी लग सकते हैं । इसलिए 9 दिन तय कर रखा है । विस्तार के भय से लेख यही समाप्त करता हुं ।
शेष क्रमश:-
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9416044828

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