महिला -2

            शास्त्रों के अनुसार 4 अरब 32 करोड़ वर्ष सृष्टि कि आयु है जिसमें 2 अरब 16 करोड़ वर्ष तक यह सृष्टि अपने केन्द्र से निरंतर दूर जाऐगी पुनः अगले 2 अरब 16 करोड़ वर्ष तक अपने केन्द्र की ओर निकट आएगी । यही सृष्टि काल चक्र है । अर्थात् सृष्टि में कालचक्र की गति लंबवत है वृताकार नहीं । मतलब आप समय यात्रा भौतिक शरीर के साथ नहीं कर सकते। हां अगर वृताकार गति होती तो शायद आप कर भी लेते । लेकिन वृताकार गति में सृष्टि संरचना अकल्पनीय है । प्रथम 2 अरब 16 करोड़ में 1 अरब 97 करोड़ वर्ष से कुछ अधिक बीत चुके हैं । अर्थात् लगभग 19 करोड़ वर्ष तक सृष्टि अपने केन्द्र से और दूर जाने वाली है । अब यहां एक बात समझना जरूरी है । 
                आप अपने मूल स्थान से जितना ही दूर जाएंगे उतना ही दुर्बल होते चले जाएंगे। आपकी शक्ति आपके मूल में ही निहित है। अर्थात् अगले 19 करोड़ वर्ष तक हम और पतन की ओर जाने वाले है । हमारा बौद्धिक स्तर धीरे-धीरे निरंतर कम होने वाला है । यही प्रकृति है । परिणाम स्वरूप वेद और वैदिक ज्ञान-विज्ञान से हम दूर होते चले गए साथ-साथ शारीरिक-मानसिक दुर्बलता बढ़ती चली गई ‌। 
            अभी अगले 19 करोड़ वर्षों तक यह सृष्टि बर्हीमुखी गति को प्राप्त होगी अर्थात् केन्द्र से दूर जायेगी और उसके बाद पुनः अन्तर्मुखी गति को अर्थात् केन्द्र की ओर वापस आयेगी। मतलब यह संपूर्ण सृष्टि ही इन दोनों बाह्य-अन्त: गति पर ही टिकी हुई है ।
 
            अर्थात् संपूर्ण सृष्टि संरचना हो या परिवार कि संरचना, इन दोनों वृत्तियों का होना अनिवार्य है । जड़ और चेतन (केवल अल्पज्ञ आत्मा) सृष्टि के आधार है जिनमें ये दोनों क्रमशः बाह्य, अन्त: वृत्तियों के द्योतक है। जिसमें जड़ जगत मोहक है, आकर्षक है, लुभावनी है, भौतिकवाद की प्रेरक है । ये प्रकृति चेतन को अपनी सुहावनी आकर्षक में फंसा कर रखने वाली है इसलिए यह बर्हीमुखी स्वभाव वाली है । 
                चेतन (आत्मा )अंतर्मुखी है । यह सुख और आनंद की खोज में प्रकृति में भटकता है और प्रकृति से ही आनंद पाने की चेष्टा करता है। पर ये बहिर्मुखी स्वभाव वाली प्रकृति उसे आनंद से दूर विभिन्न एषणाओं, कामनाओं, मन के पांचों दोषों कि ओर ले जाती है फलत: दु:ख के सिवाय चेतन को कुछ और प्राप्त नहीं होता। पर विद्या प्राप्त करके अगर चेतन प्रकृति के वास्तविक स्वरूप को समझ लें एवं प्रकृति का सदुपयोग करे तो यही लुभावनी प्रकृति उसे मोक्ष प्रदान करने वाली है । जो चेतन इस प्रकृति और उसके स्वभाव को समझकर अंतर्मुखी मार्ग कि ओर जाता है वही परमानंद को प्राप्त होता है । 
            अब बात स्त्री जाति की करते हैं । स्वयं स्त्री भी चंचल है, सुन्दर है, कोमल है, लुभावनी है, प्रेम प्रदत है, मनमोहक है, आकर्षित करने वाली है, उसका स्पर्श आनन्दायक है । इस लिए ये भी बहिर्मुखी ही है । यही कारण कि एक कन्या सुन्दर दिखना चाहती है, अपने को सजाना-संवरना चाहती है, स्वतंत्र रहना चाहती है, अगर स्वतंत्रता उसे पसंद है, भौतिकता में जीना चाहती है तो यह उसका दोष नहीं है यह उसकी प्रकृति है जो स्वभाविक है । यही कारण है कि उसे शास्त्रों में दुहीत्री अर्थात् जो अपने मूल से दूर जाने पर तरण को प्राप्त होती है । उन्नत होती है विकास को प्राप्त होती है । जैसे धान के फली को उसके मूल खेत से निकाल कर दूर खेत में लगाए जाते है । ताकी फसल कि उपज अच्छी हो। 
            लेकिन कन्या कि बर्हीमुखी प्रकृति विद्या विहीन हो तो अधोगति को प्राप्त होना तय है । यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में कन्या पिता के घर, पिता और भाई के संरक्षण में तथा विवाह के बाद पति एवं बेटा के संरक्षण में रहती है । अपने देश भारत में महिलाओं के संरक्षण एवं बर्हीमुखी प्रवृत्ति को कम करने का मूल स्तंभ धार्मिक मान्यताएं हैं एवं दिनचर्या में सामिल व्रत,उपवास, पर्व आदि है । जो उन्हें बार-बार ध्यान, गीत-संगीत, भजन, पुजा-पाठ, जप आदि द्वारा मानसिक चंचलता को रोक कर अन्तर्मुखी बनने हेतु मार्ग प्रशस्त करता है । 
            दुनिया के जिस कोने में महिलाओं को उपर्युक्त मार्ग प्राप्त नहीं हो सका वहां आज तक ढंग का परिवार नहीं बन पाया। वहां परिवारिक संबंध तथा उन्हें व्यक्त करने के लिए शब्द भी नहीं बन पाएं है ।  कन्या के बहिर्मुखी स्वभाव के कारण ही भारतीय परंपरा में यह प्रचलित है कि कन्या को घर-घर नहीं घुमाना चाहिए । क्योंकि वह बहिर्मुखी है । जबकि हमें (चेतन को) अंतर्मुखी होना है । यह बहिर्मुखी स्वभाव महिला को उसके मूल मार्ग से दूर लेकर चली जाएगी। और पुत्र के विषय में कहा गया कि उसे घर में कैद कर के नहीं रखना चाहिए,  उसे दुनिया देखने का अवसर देना चाहिए ।
            पुरूष अगर बहिर्मुखी स्वभाव वाले इस प्रकृति के वास्तविक स्वरूप को समझकर प्रकृति का सदुपयोग करें साथ ही जन्म से प्राप्त प्राकृतिक स्वभाव वाली बहिर्मुखी स्त्री जाति विद्या युक्त हो, भारतीय वैदिक परंपरा से अवगत हो तो पुरुष के लिए ये दोनों मोक्ष मार्ग प्रशस्त करते हैं । पुरूष के लिए मोक्ष पाना आसान हो जाता है । यहीं कारण है कि भारतीय परंपरा में प्रत्येक ऋषि-मुनि विवाहित होते थे । 
            समाज,परिवार, राष्ट्र के संपूर्ण विकास हेतु उपर्युक्त दोनों वृत्तियों का होना अनिवार्य है । समान्य रूप से भारतीय सभ्यता संस्कृति अंतर्मुखी मार्ग का द्योतक है । यही कारण है कि भारत में अध्यात्म का, धर्म का, ईश्वर के सुक्ष्म स्वरूप का, प्राकृतिक ज्ञान-विज्ञान का, गणित का, ज्योतिष का, खेती का, यज्ञ-हवन आदि ज्ञान विज्ञान का प्रथम उदय यही हुआ है । भौतिक विकास में हम थोड़े पीछे रह गए । (इसकी पीछे आर्थिक कारण भी है जिसके लिए मैं अलग से एक लेख लिखूंगा) 
            क्योंकि हम भारतीय अंतर्मुखी थे। देर-सवेर जब भी दुनिया की दूसरे कोने में भारत से ज्ञान- विज्ञान पहुंचा तो वे मुख्यत: भौतिक विकास में ही उलझ कर रह गए अध्यात्म में वह आगे नहीं बढ़ पाए। क्योंकि वह स्वभावत: बहिर्मुखी है और बहिर्मुखी स्वभाव वाले व्यक्ति के विषय में मैं इसके पिछले वाले लेख में बता चुका हूं । 
            दुनिया में जितनी भी कहानियां हो सकती है । दुनिया में जितनी भी कल्पनाएं हो सकती है । दुनिया में जितनी भी साहित्य कि गहराई हो सकती है । सारे के सारे भारतीय ग्रंथों में आपको मिल जाएगी सिवाय भूत प्रेत जीन के कहानियों के । 
            यह ज्ञान का वही सार है जिसे पाने के लिए नचिकेता यमराज के पास पहुंचता है । 
                                                                                                                                                                                 क्रमशः-
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9416044828


            

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