महिला
बहिर्मुखी-अंतर्मुखी मनुष्य दो प्रकार के होते है । मन के पांच दोष है काम, क्रोध, लोभ, मोह और इर्ष्या। ये पांचों दोष बहिर्मुखी प्रवृत्ति वाले मनुष्यों में अधिक एवं अंतर्मुखी वालों में कम पाए जाते । बहिर्मुखी प्रवृत्ति वाले लोगों का स्वभाव भौतिकवादी, श्रृंगारप्रिय , वस्तुओं में मोह , अत्यधिक संसाधनों को इक्कठा करना एवं दुसरों में दोष देखने की प्रवृत्ति अधिक होती है। ये लोग जीवन में कभी भी सुखी नहीं होते चाहे कितना भी संसाधन इनके पास क्यों न हो । ये लोग खुद दुखी रहते हैं और दुसरों को भी दु:खी करते रहते है। ऐसे लोग सदा सामने वाले को अपने अधीन रखना चाहते है । आलस्य, प्रमाद, बहाने ऐसे लोगों में आपको खूब मिलेंगे ।
अंतर्मुखी प्रवृत्ति वाले लोगों में मन के पांचों दोष कम पाए जाते है । ये लोग आध्यात्मिक, कम श्रृंगारप्रिय, वस्तुओं में कोई मोह नहीं, कम से कम संसाधनों में जीवन व्यतीत करना और दुसरो में नहीं पर स्वयं में दोष देखना एवं गलती स्वीकार करने की प्रवृत्ति होती है। ऐसे लोग सदा खुश रहते है, कम बोलते हैं बहुत कम दोस्त बनाते हैं । संसाधनों को जरुरत से ज्यादा इकट्ठा करना इन्हें पसंद नहीं है। ये लोग नियमित रहते हैं और किसी को भी स्वयं के नियमों में जबरन बान्ध कर नहीं रखना चाहते। आलस्य,प्रमाद आदि दोष ऐसे लोगों में कम पाए जाते।
पुरुष के तुलना में महिलाओं में ये पांचों दोष अधिक पाए जाते हैं । बहिर्मुखी प्रवृत्ति के कारण ही किसी ने ठीक ही कहा है कि लड़कियों को घर-घर नहीं घुमाना चाहिए और लड़कों घर में बांध कर नहीं रखना चाहिए। साथ में यह भी कहा गया कि पुरुष के तुलना में स्त्री को शिक्षित करना ज्यादा जरूरी है। क्योंकि मन के पांचों दोष कम करने है । महिलाएं श्रृंगार पसंद होती है। ब्युटी पार्लर जाना इन्हें अधिक पसंद है। अब जो लड़की या स्त्री अधिक श्रृंगार करती है या यु कहे ब्युटी पार्लर जाती है उनमें मन के वे पांचों दोष अधिक, श्रृंगार कम करती है तो कम पाए जाते हैं। इन्हीं मन के पांच दोषों के अधिकता के कारण पांच स्त्री एक ही कमरे में अधिक लम्बे समय तक एक साथ नहीं रह सकती। झगड़ा होना तय है । पर पांच युवा सालों- साल एक साथ रहते है ।
अगर आप एक स्त्री है अधिक श्रृंगार करना आपको पसंद नहीं है। वस्तुओं में अधिक मोह नहीं है। आपकी मित्रमंडली बड़ी नहीं है और अगर आप स्वयं में दोष देखतीं हैं । तो आप अंतर्मुखी है। जो अंतर्मुखी वाले लोग हैं वे अपना जीवन बहिर्मुखी वाले के साथ व्यतीत कर सकते हैं पर जो बहिर्मुखी वाले लोग होते है वो अंतर्मुखी वालों के साथ सदा दुःखी ही रहते है। ऐसी स्थिति में जीवन बहुत कष्टदाई हो जाता है। इस लिए जो लोग अंतर्मुखी है उन्हें अंतर्मुखी वालों से ही और जो बहिर्मुखी है उन्हें बहिर्मुखी वालों से ही विवाह करना चाहिए। तब जीवन दोनों का आनन्दायक हो जाता है।
महिलाओं में ये मन के पांचों दोषों का होना स्वाभाविक है और अत्यंत जरूरी भी, नहीं तो घर का संचालन नहीं हो सकता। गृहस्थी संभालना, घर सजाना, बच्चों का पालन-पोषण करना, धन इकट्ठा करना, गहने खरीदना ये महिलाओं का स्वभाविक गुण है। मोह,माया,दया,करुणा, प्रेम कि धनी होती है महिलाएं । इसलिए ये मन के पांचों दोष महिलाओं में होना जरूरी भी है पर अगर विद्यायुक्त हो तो सोने पे सुहागा लेकिन विद्या विहीन हो तो घर नर्क बन जाता है। महिलाओं में इन पांच दोषों के कारण ही ऐसा कहां गया है कि पुरुष शिक्षा और भौतिक संपदा के दृष्टि से स्त्री से अधिक होना चाहिए। नौकरी पेशा वाला व्यक्ति बेरोजगार लड़की से विवाह कर सकता है पर नौकरी पेशे वाली लड़की कभी भी बेरोजगार लड़का से विवाह नहीं कर सकती ।
समान्य रुप से भारतीय आमजन अंतर्मुखी होते है । यही कारण है कि सम्पूर्ण धर्म शास्त्रों का मूल लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है । जो ईश्वर प्राप्ति को परिभाषित करता है। परन्तु ऐसा भी नहीं है कि बहिर्मुखी प्रवृत्ति का सम्मान भारतीयता में न हो । परिवार, समाज और राष्ट्र के सम्पूर्ण विकास हेतु दोनों प्रकार के बहि: एवं अन्त: प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों का होना अनिवार्य है। कला संबंधी जितने भी कार्य है उनका संबंध बहिर्मुखी प्रवृत्ति से ही है । शिल्पकलादि लेकिन उन सभी शिल्पों से भी आध्यात्मिक ज्ञान ही बाहर निकल कर आया।
महिलाओं के बहिर्मुखी स्वभाव का अपने देश भारत में बहुत सम्मान किया गया है। महिलाओं के श्रृंगार में 100 से भी अधिक आभुषण एवं विभिन्न प्रकार के अंग वस्त्र, उपवस्त्र समलित किये गए हैं। पर वर्तमान में महिलाओं के इस प्रवृत्ति का दुर्पयोग आधुनिक समाज कर रहा है। जो न्याय संगत नहीं है। श्रृंगार के नाम पर अश्लीलता, फुवडपन, बेशर्मी, शरीर के उभार महिलाओं द्वारा परोसी जा रही है । यह महिलाओं के स्वाभाविक प्रकृति का द्रुपयोग किया जा रहा है ।
महिलाओं में बहिर्मुखी प्रवृत्ति को महिलाएं स्वयं अपने अधिकार में कर सके इस लिए भारतीय परंपरा में धर्म संबंधी सभी कार्य में महिला को ही आगे रखा गया है। हर व्यक्ति को सजना-संवरना चाहिए इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन कुछ लोग सजने- संवरने के चक्कर में घर के कई काम नहीं करते। नाखुन बढ़ा लेते हैं आदि आदि। कई बार अपवाद भी होता है ।
भारत में विभिन्न प्रकार के पर्व, त्योहार, व्रत, उपवास आदि कई चीजें महिलाओं के दिनचर्या में सामिल किये गए ताकी महिलाएं अंतर्मुखी हो सके । हमें पता है कि स्त्री जाति स्वभाव में पुरुषों से अधिक चंचल और चटपटा रस स्वादन पसंद करती हैं। इसलिए भक्ति मार्ग को आधार बनाकर अपने इष्ट देव के प्रति समर्पण भाव उत्पन्न करके भारतीय शास्त्र कारों ने उन्हें समय-समय पर उपवास एवं व्रत का मार्ग दिखाया। ताकी महिलाओं का संकल्प शक्ति दृढ़ हो सके और घर के विभिन्न उलझनों से उनका मन हटा कर भक्ति मार्ग में लगाया जा सके ।
ये व्रत, उपवास, पुजा-पाठ आदि भक्ति मार्ग ही है जो भारतीय परिवारिक व्यवस्था को बनाए रखा है और पति-पत्नी के बीच होने वाले झगड़ों को समाप्त करता रहता है। नहीं तो दुनिया के अलग-अलग विभिन्न संस्कृतियों में तलाक़ दर आप देख सकते हैं । आप महसूस किये होंगे पाश्चात्य शिक्षा पद्धति से होस्टल सिस्टम से पढ़ कर निकलने वाली लड़कियां अपने अधिकारों की बात करती है और शादी के कुछ ही समय बाद तलाक़ की स्थिति बन जाती है और तलाक़ के बाद जब पुनः विवाह नहीं होता तो आगे का कष्ट उन्हें ही पता है । जीवन काटना दुष्कर अर्थात निरस हो जाता है । जीवन में कोई ऐसा भी नहीं होता जिससे आप अपने दिल की बात कह सके ।
कितने दूरदर्शी थे वे लोग जिन्होंने यह व्यवस्था बनाई। आजकल इस व्यवस्था का कुछ लोग पाखंड , ढकोसला आदि नाम देकर इसके पीछे के विज्ञान एवं रहस्य को समझने का प्रयास बिल्कुल नहीं करते और पुरजोर विरोध करते हैं । हो सकता है नासमझी के कारण कुछ त्रुटि इस व्यवस्था में आ गई हो, तो उस त्रुटि को समझ कर उसे दूर करना चाहिए न कि उसका विरोध।
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9416044828
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