सुत्रधार भारत के भविष्य का।
भारत के भविष्य का
कई बार हम यह भूल जाते हैं, पद के साथ-साथ जिम्मेदारियां बढ़ जाती है । जो राज सिंहासन पर नहीं बैठे हों उन्हें राज सिंहासन पर बैठने की बड़ी लालसा रहती है । पर राज्य एवं राज सिंहासन सुरक्षित बचा के रखना कितना कठिन और दुष्कर कार्य है यह उनकी कल्पना से भी परे की बात है जो लोभ को आधार बनाकर शासक बनना चाहते हैं । मीर जाफर उन गद्दारों में प्रमुख था जो सिराजुद्दैला से गद्दारी करके बंगाल का शासक बनना चाहता था।
कहते हैं कि इस गद्दारी के बाद भारत की दासता की कहानी आरंभ होती है और ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल का शासक बन जाता है ।
धीरे-धीरे सभी गद्दार मार दिए जाते है जो शासक बनना चाहते थे । क्योंकि उन्हें पता था जो अपनी मिट्टी से गद्दारी कर सकता है वह हमारा कभी नहीं हो सकता ।
मतलब स्पष्ट है लोभी का कोई साथी नहीं होता ।
विस्तारवादी नीति आरंभ हुई धीरे-धीरे ईस्ट इंडिया कंपनी देश के अन्य राजवाडों को अपने अंतर्गत लेती चली गई । आधार छल-कपट,षड्यंत्र एवं संधि को बनाया गया । "अतिथि देवो भव:" वाला यह देश फिरंगियों को समझ न सका।
जिस प्रकार बीसवीं शताब्दी में हम इन निम्नलिखित काण्डों को भुला दिये जैसे :-
1. मानगढ़ हत्याकांड 17 नवंबर 1913 मानगढ
2.जलियांवाला बाग हत्याकांड 13 अप्रैल 1919
3. मालाबार विद्रोह अक्टूबर 1921 मालाबार,
4.पाल-चितरिया हत्याकांड 7 मार्च 1922,
5.कोहाट दंगे 9-11 सितंबर 1924 कोहाट
,6.कलकत्ता दंगे 15 जुलाई 1926 कलकत्ता
,7.संयुक्त प्रांत दंगे 1923 से 1927 ,
8.नागपुर दंगे 4 सितंबर 1927 नागपुर
,9. किस्सा ख्वानी नरसंहार 23 अप्रैल 1930 पेशावर ।
10.अमको सिमको नरसंहार 25 अप्रैल 1939,
11.कलकत्ता दंगे 15 अगस्त - 17 सितंबर 1946
,12.भारत का विभाजन 1947 पंजाब , दिल्ली और सिंध , भारत का प्रभुत्व और पाकिस्तान का
प्रभुत्व ।
13.जम्मू नरसंहार सितंबर से नवंबर 1947 जम्मू संभाग , जम्मू और कश्मीर ।
14.हैदराबाद नरसंहार 1948 हैदराबाद राज्य ।
15.मतिखरू नरसंहार 6 सितंबर 1960 ।
16.1966 गौहत्या विरोधी आंदोलन 7 नवंबर।
17.किल्वेनमनी नरसंहार 25 दिसंबर 1968 नागापट्टिनम तमिलनाडु ।
18.1969 गुजरात दंगे ।
19.तुर्कमान गेट विध्वंस और दंगा 1976 दिल्ली।
20.मरीचझापी नरसंहार 31 जनवरी 1979 पश्चिम बंगाल।
21.मुरादाबाद दंगे 1980 उतार प्रदेश।
22.मंडई नरसंहार 1980 त्रिपुरा 255-500 बंगाली हिंदू शरणार्थी
1980 के बाद भी बहुत बड़े-बड़े नरसंहार हुए हैं इस देश में । इन सभी घटनाओं को भुलाकर आज भी हम इस देश में भाई-भाई की तरह रहते हैं बस उसके दो कारण है। या तो हमें केवल अपने परिवार से मतलब है या फिर हम शासक बनना चाहते है । हमको अपने पद का लोभ है, पैसे की लालच है चाहे वह आरक्षण से मिले चाहे चुनाव जीतके बाद।
18वीं और 19वीं शताब्दी में भी हम परिवार से ऊपर कुछ नहीं सोच पाए अपने जातियों तक सीमित रहें और व्यक्तिगत उन्नति पर ज्यादा ध्यान देते रहे । काश उस समय भी हमारा धर्म, हमारी मिट्टी हमें प्यारी होती तो आज हमारा अतीत कुछ और होता । कुछ राजवाड़े थे जो अपने प्राचीन गौरव को पुनः प्राप्त करना चाहते थे और कुछ ऐसे भी थे जिन्हें राष्ट्र से ज्यादा अपने सिंहासन से प्रेम था अंग्रेजों की चापलूसी में अपनी सुरक्षा समझते रहे ।
प्लासी युद्ध के बाद निरंतर नरसंहारों से यह देश त्रस्त था । बहुत तेजी से कंपनी सरकार फल-फूल रही थी पर भारतीय जनमानस में, राजवाडों में क्रांति का लौ जलाए कौन ? तत्कालीन समय में यह सबसे बड़ा प्रश्न था। स्वामी पूर्णानंद (110 वर्ष) जो नाना साहब पेशवा के परिवारिक गुरु थे । पिछले 100 वर्षों में देश में हो रही संपूर्ण घटनाओं के दृष्टा थे । अंग्रेजों द्वारा भारत में चलाई जा रही गौ हत्या, मैकाले द्वारा लाई गई नई शिक्षा नीति जो भारत में लागू होने वाली थी उस सन्यासी के लिए असहनीय था जिससे गुरुकुलिये शिक्षा पद्धति समाप्त हो जाती । परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे वे देश में जन समुदाय के बीच क्रांति की ज्वाला को महसूस करने लगे और उस ज्वाला में घी डालने के लिए उद्यत हुए। भगवत् कृपा से उन्हीं दिनों एक नैष्ठिक ब्रह्मचारी सन्यास के दीक्षा लेने चाणोद पहुंच गए । इस ब्रह्मचारी को उन्होंने दीक्षा तो दिया पर साथ ही धड़कती इस क्रांति की ज्वाला को दिशा-निर्देश देने का सुझाव भी दिया। स्वामी पूर्णानंद इस ब्रह्मचारी को उपदेश देते हुए बोलें कि इस कार्य को योग सिद्धियों के बाद करना सरल और आसान होगा। नैष्ठिक ब्रह्मचारी का नाम दयानंद रखा गया | दयानंद जी 6 वर्ष योग सिद्धियों को सीखने के पश्चात 1855 में कुंभ मेला में स्वामी पूर्णानंद जी, उनके गुरु ओमानंद (140वर्ष) जी के पास आदेशानुसार पुनः पहुंच गए ।
अपने गुरु पूर्णानंद जी एवं ओमानंद जी द्वारा आशीर्वाद प्राप्त कर दयानंद जी हरिद्वार कुंभ में आये हुए संपूर्ण साधु-सन्यासियों और क्रांतिकारियों को राष्ट्रीय क्रांति हेतु प्रेरित करना प्रारंभ कर दिये । 1855 से 1858 तक स्वामी जी देश में घूमते रहे और देशवासियों को क्रांति के प्रति प्रेरित करते रहे विभिन्न राजा-राजवाड़ों से मिलते रहे देश में क्रांति की ज्वाला में घी डालते रहे । पूरे भारतवर्ष में निश्चित दिवस 31 मई रविवार को 11 बजे संमुर्ण क्रांति की घोषणा कर दी गई । पर इससे पूर्व ही 29 मार्च को बैरकपुर छावनी में क्रांति भड़क गई । समय से पूर्व अंग्रेज समस्याओं को भांप गए । ग्वालियर, हैदराबाद निजाम एवं अन्य राजवाड़ो का सहयोग अगर ईस्ट इंडिया कंपनी को नहीं मिला होता तो यह तय था कि भारत उसी समय स्वतंत्र रूप में खड़ा हो जाता ।
परंतु मीर जाफर केवल शरीर बदला था उसकी आत्मा अभी भारत में थी । गद्दारी मातृभूमि के साथ फिर हुआ भारत की स्वतंत्रता खजूर के पेड़ से गिरकर ब्रिटेन की रानी के गोद में चला गया । लोहे के चने को चबाने के बाद भी ईस्ट इंडिया कंपनी अपने बहुत बड़े घाटा को पूरा नहीं कर सकती थी परिणाम यह हुआ कि ब्रिटेन की रानी ने इस घाटे को पूरा करके भारतवर्ष को पुनः पराधीनता के नये डगर पर लेकर चल पड़ी । गुलाम बनाने के तौर तरीके बदले गए। भारत की संपूर्ण प्राकृतिक संपत्ति को सरकारी घोषित किया गया, हथियार रखना अवैध माना गया, डिग्रीधारी हुनर विहीन को लागू कर गुरुकुलिय शिक्षा प्रणाली को समाप्त किया गया, अंग्रेजी थोपी गई, नौकरी का लालच भी दिया गया तथा इतिहास में भयंकर परिवर्तन करके इस देश को दासता के नये मार्ग की ओर ले जाया गया।
स्वामी जी समझ गए अब जब तक देश को धार्मिक रूप से एक नहीं किया जाएगा तब तक यह देश स्वतंत्र नहीं होने वाला है । देश के अंदर व्याप्त धार्मिक मतभेदों को समाप्त करना होगा । भारतीय सभ्यता-संस्कृति की गौरवपूर्ण इतिहास को उजागर करना होगा । सनातन धर्म की मूल अवधारणा को जनसामान्य के सामने परोसना होगा । संस्कृत साहित्य में अनर्गल धार्मिक मतभेदों को लोगों के सामने परस्पर सत्यासत्य का अंतर बताना होगा। व्याकरण संबंधी विभिन्न अवधारणाओं को समाप्त करना होगा तथा आर्ष- अनार्ष ग्रंथों में अंतर स्पष्ट करना होगा | भारतीय जनमानस को भारत की सीमा बतानी होगी तथा चक्रवर्ती सम्राटों का अतीत उजागर करना होगा।
1864-65 के बाद स्वामी जी देश में धीरे -धीरे जनसामान्य के सामने सभी वैदिक मूल सिद्धांतों को बताना प्रारंभ कर दिए।
सत्यार्थ प्रकाश, संस्कार विधि, ऋग्वेदादिभुमिका आदि कुछ प्रमुख ग्रंथ लिखे एवं स्वदेशी का प्रचार किये, राम,कृष्ण एवं विभिन्न महापुरुषों के विषय में चर्चा की, विभिन्न मत-मतान्तरों के साथ शास्त्रार्थ किये । देश के अंदर स्वराज-स्वधर्म की ज्वाला को पुनः जागृत किये । आर्य समाज की स्थापना किये जो आर्य-समाज फिरंगियों के लिए नासूर बन गया | जिसने अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए नीव बनाना शुरू किया । आर्य समाज ने भारत में प्रथम भारतीय बैंक पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना किया ताकि देश का पैसा देश में रहे | अंग्रेजी माध्यम में विद्यालय खोला चर्चों के विरोध में । अनाथालय प्रारंभ किया । विधवा विवाह प्रारंभ किया । स्वदेशी का पुरजोर प्रचार किया । शिल्प विद्या आदि को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया आदि विविध प्रकल्प आर्य-समाज तथा आर्य समाजियों द्वारा प्रारंभ किया गया ।
स्वामी जी के अंदर राष्ट्रप्रेम तथा ब्रिटेन के प्रति द्वेष अंग्रेजी अधिकारी समझ गए और वह स्वामी जी के प्रति विशेष ध्यान देने लगें परिणाम स्वरूप स्वामी जी को अपना शरीर त्यागना पड़ा षड्यंत्र का मार्ग बना और उन्हें विष पिला दिया गया।
अंग्रेज मुखौटा बने और बेचारे सेवक और नर्तकी को षड्यंत्र करी
बताया गया।
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9416044828
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