क्या बने, मालिक या नौकर ? भाग -3

    ब्रिटेन ने भारत से जो लुटा उसकी एक अनुमानित आंकड़ा मुग़ल काल से दादा भाई नौरोजी के समय 1885 तक लगभग 350 लाख पाउंड स्टर्लिंग प्रतिवर्ष बताई गई है।
एक आकलन के अनुसार (Colonial Damage in Numbers by Vishal Kale)
• मीर जाफर ने 1757 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को 39 लाख पाउण्ड का भुगतान किया।
• मीरजाफर के उत्तराधिकारी 23 लाख पाउण्ड प्रतिवर्ष का भुगतान करते रहे।
• बंगाल, बिहार और उड़िसा से प्रतिवर्ष 1932900 पाउण्ड ले जाया गया।
• 1793 से बंगाल का वार्षिक राजस्व 26.8 लाख पाउण्ड ।
• उपनिवेशी शासन बढ़ने के साथ-साथ अकालों का प्रकोप बढ़ा
• इलाहाबाद से प्रतिवर्ष राजस्व 1682306 पाउण्ड (1800 के आसपास)
• मराठा क्षेत्रों से प्रतिवर्ष राजस्व 1,500,000 पाउण्ड (1800 के आसपास)
• 1857 में भारत पर कर्ज 51000,000 पाउण्ड
• 1862 में भारत पर कर्ज 97,000,000 पाउण्ड
• 1901 में भारत पर कर्ज 200,000,000 पाउण्ड
• 440 लाख पाउण्ड वार्षिक भारत से इग्लैण्ड को। इस आँकड़े को 150 से गुणा किया जाय तो करीब 6.6 अरब पाउण्ड । अब पुनः इस आँकड़े पर 8% चक्रवृद्धि ब्याज किया जाय तो यह हो जायेगा 370 खरब पाउण्ड-या लगभग 730 खरब डालर । मार्च 2011 में भारत पर कुल विदेशी कर्ज 345.8 अरब डालर ।
• केवल एक वर्ष की ब्रिटिशर्स को राजस्व आमदनी 243 'अरब पाउण्ड-लगभग 480 अरब डालर-हमारे ऊपर विदेशी कर्ज से ज्यादा केवल एक वर्ष की लूट।
•अब 1757 में 15 लाख पाउण्ड को 244 वर्षो तक 8% की चक्रवृद्धि ब्याज करें तो आपको 2320 खरब पाउण्ड या 4750 खरब डालर की रकम बैठेगी।
       यह सारे आंकड़े 1947 से पुर्व के है । जरा वर्तमान में भी देख लें।

         पीएन निवेश ऐसे लोगों द्वारा किया जाता है । जिनका अतापता बाज़ार नियामक 'भारतीय प्रतिभूति एवं - विनियम बोर्ड' (सेबी) को बिल्कुल भी नहीं रहता। इनके लिए KYC मानक ताक पर रख दिए जाते हैं । विदेशी संस्थागत सेबी में ऐसे सब-एकाउंट्स खोलते हैं जिनके माध्यम से अज्ञात, पताविहीन लोग या फण्ड्स निवेश - करते हैं। ज़्यादातर पीएन धारक निवेशक भारतीय कारोबारी, राजनेता और नौकरशाह हैं । जो अवैध रूप से अर्जित धन को ऑफशोर कर-पनाहगाहों में रखते हैं और फिर उसका पुनर्निवेश भारतीय स्टॉक मार्केट में पीएन रूट के जरिये करते हैं। यह भी गौरतलब है कि ऑफशोर कर-पनाहगाह देशों-द्वीपों में भारत से धन का बहिर्गमन तेज़ी से बढ़ता जा रहा है। जो धन चोरी से इन कर-पनाहगाहों में गया है, उसके बारे में तो यही कहना मुनासिब होगा कि वह अकूत है।
           जो धन सरेआम जा रहा है, उसके आँकड़े भी कम चौंकाने वाले नहीं हैं। 1996-2007 के दौरान वैध कहे जाने वाले तरीकों से 31 अरब डॉलर धन देश से बाहर गया है। बाहर गये इस धन का एक-तिहाई से ज़्यादा ऑफशोर कर-पनाहगाहों में गया है। इस सम्बन्ध में आँकड़े इस प्रकार हैं- चैनल आईलैण्ड्स (540 करोड़ डॉलर), मारीशंस (260 करोड डॉलर), विर्जिन आईलैण्ड्स (100 करोड़ 80 लाख डॉलर), साइप्रस (136 करोड़ 10 लाख) और केमैन आईलैण्ड्स (10) करोड़ 40 लाख डॉलर)। एक छोटे-से द्वीप चैनल आईलैण्ड में देश से 540 करोड डॉलर की धनराशि 1996-2007 की अवधि चली जाय, इससे बढ़कर हैरान करने वाली बात और क्या हो सकती है ।

              सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता  श्री राम जेठमलानी जी की तरफ से दायर एक जन्म हित याचिका नंबर 176 ऑफ 2009 में विदेश में जमाधन के बारे में कहा गया है । वर्ष 2002 से 2006 तक 14 खरब अमेरिकी डॉलर लगभग 70,00,000 करोड़ रुपए देश से बाहर गए। वर्ष 2011 में आडवाणी जी के अनुसार 28 लाख करोड़ बाहर गए। उस समय BJP के अनुसार अगर बाहर से काला धन जाया जाए तो प्रत्येक भारतीय को 15,00,000 लाख रुपए मिलेंगे। मतलब 12,50,00,000 * 15,00,000 =   18,75,00,00,00,00,000 इतना 18 नील 75 खरब कालाधन देश से बाहर गया है ।
                दुसरी ओर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अरुण कुमार के 20 खरब डॉलर के बराबर कालाधन देश के बाहर जमा है ।  मतलब रुपए में बदले तो 1300 खरब रुपए होते हैं । 1 लाख 30 हजार अरब बैठते हैं ‌।
                वाशिंगटन स्थित स्वतंत्र शोध संस्था ग्लोबल फाइनेंसियल इन्टेग्रिटी (GFI) के अनुसार वर्ष 2003 से 2012 तक भारत से 440 अरब डॉलर लगभग 28 लाख करोड़ रुपए अवैध रूप से बाहर गए। अकेले वर्ष 2012 में 6 लाख करोड़ भारत से बाहर गए।
                CBI ने 2012 में बताया कि भारतीयों का 500 अरब डॉलर कालाधन कर-स्वर्गो (Tax-Havens देशों में ) में जमा कर रखा है ।   
               फरवरी 2015 में इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने एक 1195 उन भारतीय नामों की सूची जारी की जिन्होंने एचएसबीसी बैंक की जेनेवा ब्रांच में खाता खोल रखा है । इस सूची में उद्यमियों, हीरा व्यापारियों और राजनेताओं का नाम शामिल है । 1195 व्यक्तियों का कुल कालाधन एचएसबीसी में 25,420 करोड़ रुपए जमा था ।
                अब एक दूसरा आंकड़ा यह भी बताता है कि विदेशों में जमा अवैध भारतीय धन 1500 अरब डॉलर है जो भारत पर चढ़ी विदेशी कर्ज से 13 गुना ज्यादा है ।
                 ध्यान रहे ये सारे आंकड़े 1996 के बाद के है।
                                          एक ओर भारत से अवैध रूप से पैसा देश के  बाहर जा रहा है । दूसरी ओर एक बहुत बड़ी  जनसंख्या धन के अभाव में पैसे के किल्लत के कारण आत्महत्या करने के लिए बाध्य है ।
                यह सब कुछ केवल इसलिए हो रहा है क्योंकि मालिक बनना है और मालिक बनकर लाभ कमाना है मालिक बनने के लिए सब कुछ जायज है । ऐसा वे मानते हैं।
                                शेष क्रमशः आगे
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9416044828
    

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