मालिक बने या नौकर-4?

          एक ओर भारत से अवैध रूप से पैसा देश के  बाहर जा रहा है । दूसरी ओर एक बहुत बड़ी  जनसंख्या धन के अभाव में पैसे के किल्लत के कारण आत्महत्या करने के लिए बाध्य है ।
            नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2014 में 1,31,666 आत्महत्याएं हो रही है। मतलब 361 प्रतिदिन और घंटे भर में 15 आत्महत्याएं हो रही है । रिपोर्ट के अनुसार आत्महत्याओं के प्रमुख कारण में है पारिवारिक समस्याएं, बीमारी, दिवालियापन या ऋणग्रस्तता, परीक्षा में विफलता विवाह के संबंधित मुद्दे, नशीली दवाओं के सेवन, प्रेम प्रकरण, समाज प्रतिष्ठा में गिरावट, दरिद्रता, बेरोजगारी, संपत्ति विवाद, विवाह से संबन्धित मुद्दे, अज्ञात कारण और अन्य कारण आदि का समावेश है ।
           रिपोर्ट के अनुसार 91,820(69.7%) इनका सलाना आय 1 लाख से कम था। 35,405(26.7%) 1-5 लाख के बीच और 785(0.6%) 10 लाख से ऊपर बताया गया है ।
70,364(53.5%) शिक्षा 8वीं से कम, 27,002(20.5%) 8वीं से 10वीं,
14,428(11%) 10वीं से 12वीं,
5629(4.2%)उच्च शिक्षा,
14243(10.8%)अज्ञात शिक्षा,
     पेशा आधारित आत्महत्या में देश की कुल आत्महत्याओं में 8.1% आत्महत्याएं पेशावर/वेतनभोगी/ पेंशनर लोगों की हैं । अन्य किसान खेती कर मजदूर, गृहिणी,विद्यार्थी, बेरोजगार, स्वयं रोजगार, दैनिक मजदूरी की है ।
           मूल रूप से कहे तो यह सभी आत्महत्याएं, गरीबी, बेरोजगारी, भेद-भावपूर्ण अन्यायकारी नीतियों का परिणाम है ।
         2011 की जनगणना के अनुसार 68.8% जनता ग्रामीण है और इसमें अधिकांश लोग खेती एवं खेती पूरक रोजगार से जुड़ी हुई है । इस आधार पर कहा जा सकता है कि 1,31,666 में  कुल 68.8% ग्रामीण होने से कुल 90,586 आत्महत्याएं ग्रामिण भारत में और बाकी 41,080 नगरों में हो रही है । अर्थात् प्रतिदिन 248 और प्रति घंटा में 10 आत्महत्याएं भारत वर्ष में हो रही है । ये मरने वाले वे लोग है जो अपना खून पसीना एक करके हमारे उदर के अग्नि को शांत करते हैं । परंतु हम शहरवासी उसी अन्न को शहरीपार्टीयों में बर्बाद करते हैं । यह भी ध्यान रहे कि ये सारे आंकड़े रिकार्ड में है और जो रिकार्ड में नहीं है उसका क्या कहना ।
           जबकि सरकारों कि माने तो सरकारें किसानों की आत्महत्या छुपाने की कोशिश करती है । सरकार का या मानना है कि आत्महत्याओं में कुल किसानों की संख्या 8.73% ही है। सरकार के हिसाब से कुल किसानों की आबादी में यह संख्या बहुत कम है इसलिए विचारणीय या चिंताजनक नहीं है । जब लोकसभा में 08.07.2014 को प्रश्न क्र. 81 में इस विषय पर चर्चा हुई तो कृषिमंत्री ने किसानों की आत्महत्या के कारण प्रेम प्रकरण और नपुंसकता को किसानों की आत्महत्या का एक कारण बताने में शर्म भी महसूस नहीं की ।
कृषि परिवार की स्थिति का मूल्यांकन सर्वेक्षण 2013 के अनुसार ग्रामीण भारत के कुल 15.61 करोड़ परिवारों में 9.02 करोड़ (57.8%) किसान परिवार हैं। कुल किसान परिवारों में 8.65 करोड़ (95.90%) किसान परिवार एक लाख रुपयों से कम आय प्राप्त करते हैं। 52% किसान परिवार ऋणग्रस्त हैं। प्रति किसान परिवार का औसत 47000 रुपये का ऋण अनुमान किया गया है। 36% किसान परिवारों के पास बी.पी.एल. कार्ड और 5% किसान परिवारों के पास अंत्योदय कार्ड हैं। सर्वेक्षण की अवधि के दौरान देश में लगभग 44% प्रतिशत कृषि परिवारों के पास मनरेगा जॉब कार्ड था। यह सर्वेक्षण यह स्पष्ट करता है कि देश का अन्नदाता किसान गरीबी का जीवन जी रहा है।
             गावों में रहने वाले किसान परिवार की संख्या, एक लाख से कम आय प्राप्त करने वाले किसान परिवार की संख्या और वास्तविकता के आधार पर यह अनुमानित किया जा सकता है कि, कुल ग्रामीण आत्महत्याओं में, 70% से अधिक आत्महत्या किसान परिवार में हो रही हैं। इसके आधार पर यह अनुमान किया जा सकता है कि, कुल ग्रामीण आत्महत्याएँ 90586 गुना 70% किसान परिवार में आत्महत्या बराबर 63410 आत्महत्याएँ किसान परिवार में हो रही हैं। अर्थात ग्रामीण भारत के किसान परिवार में प्रतिवर्ष 63410 आत्महत्याएँ हो रही हैं। ग्रामीण भारत के किसान परिवार में प्रतिदिन 174 और एक घण्टे में 7 आत्महत्या हो रही हैं।
             देश में एक घण्टे में हुई कुल 15 आत्महत्याओ में से 10 आत्महत्याएँ ग्रामीण भारत में हो रही हैं, जिसमें 7 आत्महत्याएँ किसान परिवार में हो रही हैं। किसानों की यह आत्महत्याएँ किसी एक प्रदेश तक सीमित नहीं बल्कि अब पूरे देश में हो रही हैं। यह वास्तव में किसानों की दुर्दशा को प्रदर्शित करती हैं।
            शहरों में गरीबी का जीवन जीने वाले अधिकांश लोग गाँव से ही आये हैं। जो गाँव में किसानी या खेती मजदूरी या खेती आधारित रोजगार या स्व-रोजगार करते थे। शहरों में बसी गाँव की आबादी, गाँव की बदहाली की स्थिति, कृषि पर हमला और गाँव के रोजगार छीने जाने का परिणाम है। आत्महत्याग्रस्त लोगों में गाँव के खेती आधारित रोजगार करने वाले पीड़ितों की और गाँव से शहरों में विस्थापित पीड़ितों की संख्या जोड़ी गयी तो किसान परिवार में हो रही आत्महत्याओं की संख्या और अधिक बढ़ेगी। किसान आत्महत्या का सच छुपाने के बजाय देश के सामने रखना सरकार की जिम्मेदारी है। इसके लिए आवश्यक है कि किसान परिवार में हो रही आत्महत्याओं को रिकॉर्ड में दर्ज किया जाना चाहिये।
        अगले लेख में हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि बड़ी-बड़ी कंपनियों को बैंक द्वारा कितना ऋण प्राप्त हुआ और भारत सरकार द्वारा किन-किन कंपनियों के ऋण माफ़ किये गए ।
शेष क्रमशः
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9416044828

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