क्या बनें मालिक या नौकर ?

            क्या बने मलिक या नौकर ? कुछ लोगों का यह मंतव्य है कि बनना ही है तो मालिक बने नौकर क्यों ? यह विचार पश्चिम से आया है बाहरी सभ्यता-संस्कृति के लोग जब भारत वर्ष में आए तो यह विचारधारा साथ में लेकर आए थे । उन्होंने कहा कि बनना ही है तो मालिक बनो नौकर क्यों ? जबकि भारतीय सभ्यता-संस्कृति को अगर हम समझने की कोशिश करें तो ये हमें पता लगेगा कि यहां सब सेवक बनना चाहते हैं मालिक नहीं । राजा हरिश्चंद्र पलभर में सेवक बन गए । मुर्दा हट्टी में मुर्दा जलाने लगे । शाम को कहा गया कि कल सुबह राज्याभिषेक होगा । पर सुबह होते ही पता चला वनवास जाना है बेहिचक चल पड़े पुरे 14 साल के लिए । सेवक बने वनवासियों के लिए। जिन्हें राज गद्दी मिला उन्होंने कहा मैं तो उनका दास हुं, मैं स्वामी कैसे बन सकता हुं ? मैं तो सेवक हुं उनका ‌। वे नहीं तो उनका चरण पादुका ही सही, मैं उसी कि सेवा करूंगा । मेरे स्वामी वन में रहे और मैं महल में यह कैसे संभव है ? चाहते तो लंका का राजा बन सकते थे या किसी एक भाई को बना भी सकते थे परन्तु भाव तो सेवा वाली थी । राजा को मोह होता है सेवक को नहीं। विभीषण को राजा बनाकर अयोध्या वापस लौट आए । राज्य तो दुर्योधन को भी नहीं चाहिए था । बस केवल पांडवों से ईर्ष्या, द्वेष थी । कर्ण को अंग देश का राजा बना दिए एवं इंद्रप्रस्थ प्राप्त होने पर भी स्वयं राजा न बनाकर द्रोणाचार्य को राज्य सौंप दिये । ताकि वैर की जा सके । श्री कृष्ण चाहते तो मगध को भी अपना बना लेते । पर जरासंध के बेटे को ही देकर चले आए । चक्रवर्ती सम्राट राजा अशोक वैराग्य को प्राप्त कर संतुष्ट हुए। भर्तृहरि आरण्य को चल दिए विक्रमादित्य को सौंप कर । भाव सेवा का था इसलिए आधुनिक युग में भी वल्लभभाई पटेल अधिक वोट प्राप्त करने के बावजूद भी पद त्याग करने में संकोच नहीं किये । परंतु वे दोनों ईसाइयत और इस्लाम से प्रभावित थे इसलिए उन्हें मालिक बनना था । अभी जो वर्तमान में हैं वे कभी भी अपने आप को मालिक नहीं समझे आज भी खुद को प्रधान सेवक कह कर पुकारते हैं ।

            ये दोनों शब्द नौकर और मालिक भारतीय मूल भाषाओं के नहीं है मालिक शब्द उर्दू से आया और नौकर अंग्रेजी से । हालांकि मालिक बनाने का झांसा देकर उन्होंने सबको नौकर बनाया और आज जो जितना बड़ा नौकर है वह उतना ही अधिक प्रतिष्ठित है समाज में। 

             एक चीज उन्होंने हमें और सिखाया काम कोई भी करो उसमें लाभ जरूर होना चाहिए अगर लाभ नहीं होता तो काम बेकार है । परिणाम यह हुआ कि हम मालिक बनना चाहते हैं और मालिक बनकर लाभ कमाना चाहते हैं जबकि यह सिद्धांत के विरुद्ध है । 

            अब दूसरी ओर भारतीय सभ्यता- संस्कृति हमें सेवक बनने का आदेश देता हैं। मतलब आपको सेवा करनी है । सेवा क्यों करनी है ? क्योंकि कर्तव्यों का पालन करना है ? कर्तव्यों का पालन क्यों करना है ? क्योंकि अधिकार मिला है । अधिकार क्यों मिला है ? क्योंकि हमने कभी कर्म किया था । कर्म क्यों किया था ? क्योंकि शरीर प्राप्त होने पर आप बिन कर्म किये नहीं रह सकते। 

             फलत: आपको कर्म करना पड़ेगा। अब प्रश्न है ? मालिक बनकर कर्म करें या सेवक बनकर ? सेवक बनकर । क्यों ? क्योंकि हमें उस मालिक को, स्वामी को ढुंढना है जिसने हमें इस गतिशील संसार में कर्म करने के लिए भेजा है । अगर हम मालिक, स्वामी बनकर कर्म करेंगे तो उसे कभी भी नहीं ढुंढ पाएंगे जिसे पाने के लिए हम संसार में भटक रहें । क्योंकि अगर आपको यह भ्रम है कि आप मालिक, अखिल सम्राज्य के स्वामी है, यह संपूर्ण अथाह संपत्ति मेरी अपनी है मैंने इसे अर्जित किया है, मेरा इस पर अधिकार है , जब-तक यह भ्रम टुटेगा नहीं तब-तक आप उसे नहीं पा सकते जिसे पाने के लिए आप इस संसार में आए हैं । 

            अब रही दूसरी ओर ईसाइयत और इस्लाम में तो उन्हें यह नहीं मालूम, आए कहां से हैं ? इस संसार में और जाएंगे कहां ?, इस संसार से । वहां न मोक्ष होता है और न कर्म के फल, तो कर्तव्य पालन किस बात का । सीधे मालिक बनो, सेवक क्यों ? 

            पश्चिमी दुनिया से आयी हुई इस विचार को आत्मसात करने के कारण आज हर व्यक्ति अपने आप को मालिक समझता है । मेरे में क्या कमी है ? मालिक मैं भी बन सकता हुं । मेरे पास डिग्री है, पढ़ा लिखा हुं । धन कि कोई कमी तो है नहीं । फिर से, मेरा कुटुम्ब भी बड़ा है अपने जाती का मत ( वोट ) भी तुलना में अधिक है । इस बार मैं जरूर लडुंगा। कोई वार्ड पार्षद बनना चाहता है, कोई गांव का मुखिया तो कोई प्रधान, कोई विधायक बनना चाहता है, कोई सांसद और तो और किसी को देश का प्रधानमंत्री बनना है । प्रधानमंत्री बनने के चक्कर में ही आज देश कई भागों में टुट गया। पाकिस्तान बना, बंगलादेश बना, तिब्बत बना, सियाचिन, POK आदि, पहले देश टूटा, फिर राज्यों के टुकड़े हुए, फिर नये नये जिले बने,। केवल मालिक बनने के चक्कर में समाज में विखराव उत्पन्न हुआ। पंचायत भी अब नहीं रहा । संयुक्त परिवार से हम एकल परिवार तक आ गए । अब तो एकल परिवार भी नहीं रहा । हालांकि शादी से पहले एक साथ जीने-मरने कि कसमें खाईं थी । पति-पत्नी अलग-अलग कमाते हैं । एक दुसरे से उधार बाकी चलता है। जिन्होंने साथ जीने मरने कि कसमें खाईं थी अब वे केवल निभा रहे हैं वो भी तब-तक जब विकल्प न हो । नहीं तो मौका मिलते ही तलाक़ हो जाता। महिला के अपने बहाने है, मैं अकेले भी जी सकती हुं, मैं उसकी क्यों सुनू, मैं उसकी पत्नी हुं नौकर नहीं ।जो व्यक्ति खुद को मालिक समझता हो तो उनके भी अपने तर्क होते हैं ।

             ऐसा हुआ क्यों ? क्योंकि अब हर व्यक्ति खुद को मालिक समझता है। छोटा भाई हो या बड़ा, छोटी बहु हो या बड़ी । मालिक बनने के पैमाने सबके अपने-अपने, अलग-अलग हैं । कोई कहता है मैं बड़ा हुं तो कोई कहता है मैं पढ़ा-लिखा हुं, मेरे पास डिग्री है। किसी को धन का अभिमान है तो किसी को अनुभव का । मेरे पिता, भाई, चाचा, ताऊ थे तो मैं भी हो सकता हुं। 

            अब तो ऐसा है कि मालिक बनने के लिए कुछ भी जायज है । दुनिया का सारा कुकर्म ठीक है बस किसी तरह पद मिल जाए। मालिक बन जाऊं। 

                                                                                                                                             शेष क्रमशः आगे

वैदिक सुप्रभात

उत्तम प्रकाश 

9416044820

          

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