प्रेम
रात्रि हो गई, अंधकार चतुर्दिक व्याप्त हो गया। वह कुआं जिसमें थंगल और मौलवी ने कत्ल कराके सैकड़ों हिन्दू फेंक दिए थे, मानो आकाश की ओर निहार रहा था। अंधकार बढ़ता गया, मध्य- रात्रि हो गई। जिस प्रकार बैठे-बैठे झपकियाँ लेने लगता है, उसी प्रकार कुएँ को खोलकर अंधकार भी मानों गहरी नींद में खर्राटे भरने लगा था । उसके पेट में भयंकर पाचन क्रिया जारी थी। उस कुएँ में पड़े हुए अनेक अर्धजीवित और मरणासन्न हिन्दुओं की आहें और कराहें, जो बीच-बीच में मुनाई पड़ रही थीं उस अन्धकार के पेट में होती हुई गड़गड़ाहट-सी प्रतीत होती थी !
वह कुआं, उसमें धकेली गई लाशों, धड़ों, धड़विहीन सिरों, टूटे हुए हाथों के टुकड़ों, मांसपिंडों से आकंठ भरा हुआ था। इस कुएं की एक दीवार में एक वृक्ष फूटकर निकला हुआ था । अतः अनेक हिन्दुओं के जो शव, मांस आदि के टुकड़े फेंके गए थे वे इसमें अटक गए थे और इसकी शाखाएँ भी झुक गई थीं। इसी की एक शाखा में एक कोमल-कंठ से निःसृत आवाज उस घायल हिन्दू को सुनाई पड़ी। वह कह रही थी 'भाई, तू कहाँ है ? मुझे भय लग रहा है, अपना हाथ पकड़ा दे। उस वृक्ष में अटके हुए हिन्दू ने जब यह आवाज सुनी थी तब उसकी थोड़ी-थोड़ी वे चेतना बनी हुई थी। उसने सोचा कि यह किसी ऐसी बहिन की आवाज है कि जो मरते समय अपने भाई का स्मरण कर रही है कि उसका क्या हुआ है, अतः वह बिह्वल है। अथवा जब उसने हिन्दू धर्म का परित्याग न करने का संकल्प व्यक्त किया तो मोपलों द्वारा की जा रही मारा- मारी में उसका भाई उससे बिछुड़ गया है ! या फिर जब मोपलों द्वारा इस कुएँ में ओ अन्धाधुन्ध गिराया जा रहा है तो वह बहिन अपने भाई के हाथ का सहारा मांग रही है, जिससे कि वे दोनों ही साथ-साथ इस अन्धकूप में गिर सकें। अभी तक तो वह घायल हिन्दू अर्ध-चेतन अवस्था में ही था, इसलिए उसे अपनी पीड़ा का भान ही नहीं हो पा रहा था, किन्तु सहसा ही एक दम तोड़ते हुए व्यक्ति द्वारा पैर पटके जाने पर जब उसकी नाक पर आघात लगा तो वह सहसा ही पूर्णतः सचेत हो गया। किन्तु वह चेतना बड़ी ही भयंकर थी, मृत्यु की अचेत अवस्था से भी अधिक भयावह ! मध्यरात्रि, घिरा हुआ अन्धकार, चारों ओर गुंजती आहे-कराहें, बिलबिलाते मांसपिंड, रक्त, मज्जा, माँस और अन्तड़ियाँ, भीषण विस्मृति, भीषण स्मृतियाँ । वह घायल तरुण होश में आ गया था। अब उसके घायल कंधे और अंग-प्रत्यंग में भयंकर पीड़ा उभर उठी थी ! वह भी जोरों से चीख उठा। उसकी उन आहों और कराहों से कतिपय अन्य अर्धमृत घायल भी तड़प उठे ! मलाबार में यह एकमात्र कुआं ही नहीं था, जहाँ अर्ध- रात्रि के इस अन्धकार में आहों और कराहों के स्वर उभरे थे। ऐसे दसियों कूपों में इसी प्रकार की आहों और कराहों के गूंजते स्वरों से रावण के द्वारा की जाने वाली भयंकर गड़गड़ाहट का आभास हो उठता था ।
उसे लगा कि मानो उससे पूछा जा रहा है, "हिन्दू धर्म छोड़ता है कि नहीं? मुसलमान होता है कि मरता है ?" और वह चीख उठा, "जी नहीं होता, जी नहीं छोड़ता ! मैं हिन्दू हूँ ! मारो तुम कितना मारते हो। परन्तु कुछ ही समय उपरान्त उसे अनुभूति हो गई कि वह कहाँ है। उसका प्रकृति-प्रदत्त धैर्य पुनः उदित होने लगा । उसके समीप ही किसी हिन्दू का पैर लटक रहा था और उससे रक्त की धारा उसके मुख पर टपक रही थी। वह उस लटकते हुए पैर पर चढ़ गया । किन्तु तभी उसके मन में एक टीस-सी उठी कि कहीं उसके द्वारा. किसी हिन्दू हुतात्मा की देह का अपमान तो नहीं हो रहा। किन्तु उसने अपने मन के इस संकोच को शान्त किया और कुएँ में उगे हुए उम् वृक्ष को पकड़ कर कुएं से बाहर निकलने का प्रयत्न किया । किन्तु वह डाली छूट गई और वह घड़ाम से गिर गया। इसका परिणाम यह हुआ कि कुएँ में दूसरी ओर शवों का जो ढेर लगा हुआ था वह उस ऊपर खिसक कर जा गिरा। थोड़ी-सी चूक हुई ही थी कि उसका पीतक का भाग शवों आदि की उस ढेरी में धँस गया। उसने उस ढेरी से निकल कर एक ओर खड़े होने का प्रयास किया ही था कि उसका पैर एक व्यक्ति के पेट पर पड़ गया और पेट फूटते ही उस शव की अंतड़ियाँ, मांस, नसें, अन्न-मल सभी कुछ निकल कर बिखर पड़ा । इससे बनी कीचड़ में उसका पाँव फंस गया था। उसे संहसा ही अत्यधिक भय प्रतीत होने लगा किन्तु उसने येन-केन-प्रकारेण उस भय से अपने आपको उबारा और झटका देकर अपना पैर खींचा। उसने पास ही पड़े एक सिर विहीन घड़ को कुएँ की दीवार के सहारे खड़ा किया और उस पर पांव रखकर पुनः उस वृक्ष की टहनी को पकड़ा। उसके मन में बार-बार एक ही विचार आ रहा था कि वह सिरहीन हिन्दू हुतात्मा कौन था ? राष्ट्र के रहने के लिए मरण का भी वरण करने वाले उसके समान लोग थोड़े ही हैं। और तू उस सिरविहीन हिन्दू हुतात्मा की पीठ और कंधे पर पग रखकर बचने के लिए इतने हाथ-पैर मार रहा है, तुझे लज्जा नहीं आती ?
किन्तु सिरविहीन हुतात्मामों के कन्धों पर चढ़कर ही तो कोई राष्ट्र पतन के गर्त से अपना सिर ऊंचा करके निकल पाता है। मरण के अंधकार से पुनर्जीवन के उदयाचल की ओर बढ़ने के लिए शीशदान देने वाले ऐसे ही हुतात्माओं के शवों की ढेरियाँ तो किसी राष्ट्र को खड़ी करनी पड़ती हैं।
अतः हे हिन्दू तरुण ! संकोच न कर। चढ़ इस ढेरी पर, पकड़ ले वह डाली, और आगे बढ़ा अपना हाथ तथा उस कुएँ की लकड़ी को पकड़कर इस मृत्यु के मुख से बाहर निकल आया । उसके अंग- प्रत्यंग, नख-शिख सने हुए, किसी के रक्त से तो किसी की मज्जाओं से बहते रस से । मुसलमानों द्वारा उस पर किए प्रहारों से उसके कंधे आदि पर भी भयंकर घाव लगे थे और उनसे रक्तस्त्राव हो रहा था, असह्य वेदना हो रही थी। परन्तु खुली वायु में श्वांस लेकर वह तरुण अपने को कुछ हलका अनुभव कर रहा था। परन्तु घोर अन्धकार । वह गहन कूप ! वह घोर स्मृति और गहन विस्मृति ! किन्तु वह सहसा ही चौक-सा पड़ा। उसने देखा कि पास के वृक्षों के पीछे कोई खड़ा है। फिर उसे स्पष्टतः दिखाई देने लगा कि वहाँ कोई स्त्री खड़ी है। उसने समझा कि यह कोई मोपला नारी है।
इधर श्रीरंगम देवालय के समीप से एक प्रचण्ड जयघोष सुनाई पड़ा, "हर हर महादेव ।" हिन्दू युवक यह विचार कर प्रसन्न हो उठा कि इतने जोरों से हर हर महादेव का जयघोष गुंजाने में समर्थ हिन्दू अभी भी विश्व में जीवित हैं। उसका रोम-रोम प्रफुल्लित हो उठा और सुध-बुध भूलकर उस प्रिय और पूज्य जयघोष को तन्मयता सहित सुनने लगा और स्वयं भी बोल उठा, "हर हर महादेव ।"
उस तरुण के मुख से यह ध्वनि सुनते ही वह झाड़ी के पीछे खड़ी हुई आकृति भी चल पड़ी। उसने अपनी साड़ी के पल्ले के पीछे छिपाया दीप निकाला और उसके उजाले की रेखा उस जयध्वनि करने वाले व्यक्ति पर पड़ने लगी । वह स्त्री तत्काल उसकी ओर "दामू ! हे वीर- वर ! " कहते हुए दौड़ पड़ी। आश्चर्य, आनन्द, आभार और अभिमान से उसका शरीर कंपित हो उठा। उसके हाथ से जलता दीप गिर पड़ा । उस दीप के गिरने के साथ ही उसके धैर्य का बाँध भी टूट गया । "दामू जानते हो कि नहीं? वीरवर मैं हूं तुम्हारे द्वारा मुक्त की गई लक्ष्मी ।" एक सांस में ही यह कहती हुई वह युवती दामू से लिपट गई। उसकी छाती से लिपट कर वह युवती बोली, "मुझे संभाल दामू, अब तक इस श्मशान में भी मुझे भय नहीं लग रहा था, किन्तु मैं अब क्षण-भर भा खड़ी नहीं रह सकती।"
यह चिन्तामणि शास्त्री की वही कन्या थी जिसे शास्त्री के शांति- कुटीर में सोए हुए सुमति समझकर पकड़ा गया था। और उसके बाद उसने कितने संताप, छल, भीति, बलात्कर, प्रहार और आशा तथा निराशा सहन की ! उसे भी बन्दी बनना पड़ा था, कितु विजयी गोरखों ने सभी बन्दी बनाई गई हिन्दू कन्याओं को स्वतन्त्र कर दिया था। यह युवती, लक्ष्मी भी उन्हीं के साथ मुक्त हुई थी। इतने कष्टों और दुःखों से लक्ष्मी टूट-सी गई थी। अपनी आंखों से अपनी गर्भवती बड़ी बहन को चित्कारते हुए देखा था। जब विधर्मी उसके साथ बलात्कार कर रहे थे। उसके गर्भ को फाड़ते हुए देखा था । उस रात्रि को उसने अपने स्वजनों के अंग-प्रत्यंगों को विखरते हुए देखा था। उसने अपनी आंखों के सामने गांव के झोपड़ियों को आग के ग्रास में जाते हुए देखा था।परन्तु अब उसके जीवन का बन्धन भी टूटने ही वाला था, जब उसकी दामू से भेंट हुई । इतने दिनों के उपरान्त उसे कोई अपना मिला था। यह पगली स्त्री जाति ! संकटकाल में झेले सभी दुखों को वह एकदम भूल गई । दुखों के आघात से उसकी जो जीवन-डोरी टूट नहीं पाई थी वह सूख का यह अतिरेक सहन न कर पाई। और दामू मुझे संभाल ले, कहती- कहती वह उस युवक के बाहुपाश में इस प्रकार अबद्ध हो गई कि फिर न हिली । उसने इतना ही कहा "दामू ! मेरा दामू ! मेरा..." और लजा गई । परन्तु अधूरे वाक्यों का उच्चारण यही तो प्रेम का पुरातन अभ्यास है ! दामू ने भी उसे सान्त्वना दी - "लक्ष्मीबाई ! भयभीत न हो, मैं तुम्हारे साथ हूँ।"
क्रमशः
वैदिक सुप्रभात
9416044828
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