ब्रह्मचारी

​            घनघोर जंगल था 2 दिन से कुछ भी खाने को नहीं मिला । क्योंकि रास्ते में कहीं भी फलदार वृक्ष नहीं थे । थकान इतना हो गया था कि आगे चल न सका वे ब्रह्मचारी वहीं पेड़ के नीचे सो गए । तीसरे दिन अचानक सामने से दो भालू पास आते हुए नज़र आए अपने बचाव के लिए ब्रह्मचारी ने कोई प्रयत्न नहीं किया मन में विचार आया शायद मैं इनके काम आ जाऊं । दोनों भालू पास आए और सुंघ कर चले गए । कुछ देर बाद उनमें से एक भालू पुनः आया लेकिन उसके मुंह में मधुमक्खी का छत्ता था । वह वही ब्रह्मचारी के पास छत्ता रख चला गया । ब्रह्मचारी ईश्वर को लाख-लाख धन्यवाद देकर भरपेट शहद को खाया और आगे चल दिया ।

           दूसरी घटना है । शाम हो गया था धीरे-धीरे रात होने को था आगे कुछ ठीक से दिख नहीं रहा था । अचानक दाहिना पैर गड्ढे में पड़ा और नीचे गड्ढे में गिर गए । दाहिने पैर में बहुत चोट आई चिल्लाने पर व्याध वहां पहुंचे और वे अपने साथ एक कुटिया में लेगए उन्होंने 3 दिन तक ब्रह्मचारी का उपचार किया और खाने को फल दिया । खूब सेवा कि जब स्वस्थ हो गए तो सुलभ रास्ते पर छोड़ गए । 

            तीसरी घटना। अबकि बार ब्रह्मचारी के साथ एक और सन्यासी थे । जंगल में दोनों आगे बढ़ते जा रहे थे । थकान होने पर एक पेड़ के नीचे दोनों आराम कर रहे थे तभी अचानक बहुत अधिक संख्या में वराह वहां पहुंच गए । सन्यासी जी तो बहुत तेजी से पेड़ पर चढ़ गए और चिल्लाने लगे ब्रह्मचारी तुम भी ऊपर आ जाओ पर ब्रह्मचारी को पेड़ पर चढ़ाना उतना नहीं आता था । इसलिए वह नीचे रखकर ही डंडे को जमीन पर दो तीन बार धब-धबाए और निडरता से खड़े रहे टस से मस नहीं हुए । इतने में वराह वहां से भाग खड़े हुए। 

              चौथी घटना :- चाणोद में रहते समय दिन में केवल जल-मिश्रित दूध पी लेते थे और रात में फल। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं खाते थे। सभी आश्रमवासियों के लिए अगल- बगल के गांवों के रहने वाले लोग दूध भेज देते थे। दोनों गुरुओं के चले जाने के बाद ग्रामवासियों ने समझा कि अब आश्रम में कोई नहीं है, इसलिए दूध लाना बन्द कर दिया। प्रथम दिन तो केवल जल पीकर और फल खाकर ही ब्रम्हचारी ने दिन काट लिया । दूसरे दिन एक दुग्धवती गाय कहीं से भागकर कुटिया के सम्मुख खड़ी होकर रम्भाने लगी। पीछे से वहाँ गाय के स्वामी दो भाई भी पहुंच गये । गाय के स्वामियों ने ब्रम्हचारी से कहा कि "इस गाय का दूध प्रतिदिन आप आश्रमवासियों की सेवा में भेजता था। हम लोगों ने सुना था कि आप लोग सब के सब कहीं चले गये हैं, इसलिए कल हमने दूध नहीं भेजा। आज सबेरे ही गाय भाग गई । ढूंढते-ढूंढते यहां आपके कुटिया के सामने गाय मिली। हम घर जाकर आपकी सेवा में दूध भिजवा देंगे।" पर गाय आश्रम को छोड़कर घर जाना नहीं चाहती थी। सबको समझ में आ गया कि कल दूध नहीं भेजा गया था, इसलिए आज दूध पिलाकर ही गाय घर को जाएगी। बछड़ा वहां लाया गया, दूध दुहा गया और ब्रम्हचारी को दूध पिलाने के बाद गाय बछड़े को लेकर मालिकों के साथ अपने घर चली गई ।

           पांचवी घटना :- ब्रह्मचारी अकेले ही थे । उस दिन शाम होने वाली थी । सामने नदी थी। अमावस्या की अंधेरी रात होने वाली थी। आज कि रात्रि कैसे कटेगी ब्रह्मचारी सोच रहा था। देखते-देखते और सोचते-सोचते अंधेरा हो गया। दूर से हर्षध्वनि की आवाज आने लगी। धीरे-धीरे भीड़ नदी के किनारे पहुँच गया। ब्रह्मचारी ने दूर से देख लिया कि एक दस वर्ष के बालक को लोग नहला रहे हैं। सब पुरुष हर्ष के कारण नाच रहे हैं। और स्त्रियां गाना गा रही हैं। एक माता बार-बार उस लड़के को पकड़ने के लिये जाती थी, किन्तु लोग माता को धकेल देते थे। यह क्या बात है, इसे जानने के लिये ब्रह्मचारी वहां पहुंचा। तब उसे बताया गया कि "आज अति पुण्य तिथि मौनी अमावस्या है। काल भैरव की गुफा में आज मध्य रात्रि को काल भैरव की सेवा में इस निष्पाप, निर्दोष और शुभ लक्षणयुक्त ब्राह्मण- बालक को बलिवेदी पर चढ़ाया जाएगा जिससे इसके माता-पिता और वंश धन्य हो जाएंगे। ऐसा सौभाग्य सब के लिये नहीं होता है। इस एकमात्र पुत्र के पिता को पुजारियों की तरफ से ५० पचास रुपये प्राप्त हुए हैं। पिता काल भैरव की कृपा को अनुभव करके धीर स्थिर और शान्त है किन्तु मूर्ख और अभागिनी माता ने काल भैरव की इतनी बड़ी कृपा को नहीं समझा। प्रति वर्ष केवल एक बार इस मौनी अमावस्या की पुण्य तिथि में काल भैरव को इस रूप से एक-एक सुलक्षणयुक्त ब्राह्मण बालक भेंट के रूप में दिया जाता है, इसमें रोने की क्या बात है ? आज मध्यरात्रि को ही यह बालक बलिदान के साथ-साथ मनुष्य देह को छोड़कर गन्धर्व लोक को चला जाएगा। 24 वर्ष के इस ब्रह्मचारी को यह करुण और भयंकर दृश्य नहीं देखा गया। काल भैरव का यह स्थान धर्मपुरी से लगभग दो योजन की दूरी पर जंगल के अन्दर रास्ते के पास वारंगा नाले के साथ-साथ मध्यप्रदेश में था । बलिदान की शोभा यात्रा के अन्दर जाकर रक्त चन्दन से अनुलिप्त रुद्राक्षमाला परिहित प्रधान पुरोहित से ब्रह्मचारी ने कहा- "कृपया आप इस बालक को छोड़ दीजिये, इसके बदले मुझको ले चलिए। मैं भी ब्राह्मण का बालक हूं।” पुरोहित ने कहा – “यह सौभाग्य सबको नहीं मिलता। इस बालक को नहीं छोड़ सकता हूं, क्योंकि यह काल-भैरव को पहले ही उत्सर्ग किया जा चुका है। तुम भी चल सकते हो, वहाँ पुरोहित राज कापालिक की आज्ञा होगी तो इस बालक को छोड़ दूंगा और तुमको ही बलि पर चढ़ा दूंगा।" ब्रह्मचारी सहर्ष राजी होकर शोभा-यात्रा में शामिल होकर चलने लगा । लड़के की माता के कण्ठ की आवाज अति रुदन के कारण बन्द हो गई थी। केवल पगली की तरह शोभा- यात्रा में शामिल होकर आ रही थी। शोभा यात्रा काल भैरव की गुफा के सम्मुख पहुंच गई, जहाँ भयंकर भीड़भाड़ थी। सात कपड़े की पट्टियाँ सिर पर बांध कर करीब पचास आदमी कटारी हाथों में लेकर नाच रहे थे। करीब सौ स्त्री-पुरुष शराब पी-पीकर वहां गाना गा रहे थे। ब्रह्मचारी के बारे में पुरोहित और कापालिक के अन्दर जब बातचीत हो गई तो उन्होंने ब्रह्मचारी से कहा - "अगर तुम राजी हो तो काल भैरव की सेवा में तुमको ही बलिदान किया जाएगा।" तब वह तत्काल राजी हो गया और पुत्र-शोकातुरा जननी को उसका पुत्र वापस दिया गया । तव पुत्र को आलिंगन करके माता बेहोश होकर गिर पड़ी ।

            अगले दिन ब्रह्मचारी को पुरोहितों ने स्नान करवाया, वदन में रक्त-चन्दन लगवाया । फूलों की माला पहना पुरोहित सिर पर हाथ रखकर मन्त्र-पाठ करने लगा। कपाल में कुमकुम लगवाया गया । खड्ग की पूजा हुई । काल भैरव की गुफा के सम्मुख काठ की बेदी पर ब्रह्मचारी के सिर को रखवाकर पुरोहित लोग मिलकर मन्त्रपाठ करने लगे। चारों तरफ से 'कालभैरव बाबा की जय' का उद्घोष होने लगा। ब्रह्मचारी उपस्थित समूह को एक बार देखकर अपनी आँखें बन्द कर ली और बलिदान के लिये तैयार हो गया। पुरोहित ने कान में मुख लगा कर मन्त्र पढ़ा- "ओम् नर एवं बलि रूपेण मम भाग्यादुपस्थितः। प्रणमामि ततस्त्वां वं गच्छ त्वं गन्धर्व- सदनम् ॥ यज्ञार्थे पशवः सुष्टा यज्ञार्थे पशुघातनम्। यज्ञे च मरणे त्वं हि भुवं गन्ता त्रिविष्टपम् !"

               इस मन्त्र को पढ़कर पुरोहित ने खड्ग को घातक के हाथों में दे दिया और ब्रह्मचारी के आंखों को कपड़े की पट्टी से अच्छी तरह कसकर बांंध दिया गया । 

        भविष्य में यह ब्रह्मचारी देश और समाज के लिए बहुत ही कल्याणकारी सिद्ध हुआ। 

प्रश्न:- इस ब्रह्मचारी का नाम क्या था ?

कमेंट में बताएं। 

वैदिक सुप्रभात 

9416044828

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