क्या बने, मालिक या नौकर ? भाग - 2

             अब तो ऐसा है कि मालिक बनने के लिए कुछ भी जायज़ है । दुनिया का सारा कुकर्म ठीक है बस किसी तरह पद मिल जाए। मालिक बन जाऊं । वोट खरीदना पड़े या समान बांटना पड़े। शराब से मिले या मांस से, अगर नाच करवाया पड़े तो वो भी ठीक है । किसी भी धर्म का चादर क्यों न ओढ़ना पड़े सब ठीक है । झूठी दीलाशा और तुष्टीकरण तो आम बात है । दंगे हो रहा हो तो होने दें। नशाखोरी, फ़रेबी, व्याविचार भी चलेगा। चुनाव के लिए पैसा चाहिए कहीं से भी मिले सब ठीक है । चाहे वो पुर्व से आए या पश्चिम से, शराब बेच कर आए या ड्रक्स से, किसी भी तरह से बस आना चाहिए मुझे मेरा कुर्सी चाहिए ।   केवल इस लिए क्योंकि मुझे मालिक बनना है। चुनाव में अगर पैसा कम पड़ा तो कोई बात नहीं ज़मीन बेच दो, गाड़ी बेच दो, नौकरी को दांव पर लगाना पड़े तो लगा दो क्योंकि पुरा गांव मेरे साथ है । वैसे भी जीतने पर पुरा वसूल लुंगा बस एक बार मौका तो मिले । मालिक बनने के चक्कर में कई लोग बर्बाद हो गए । ज़मीन गया, घर गया कर्ज ऊपर से। इनमें से किसी को भी देश धर्म से कोई मतलब नहीं है । मतलब है तो केवल व्यक्तिगत स्वार्थ से ? क्योंकि महत्वकांक्षाओं कि गठरी सदा इनके सर पर होती है । रेत का महल और स्वप्नों का सम्राज्य खड़ा कर लेते हैं।
            यह केवल दिखने में शक्ल सूरत से भारतीय दिखते हैं वास्तव में ये भारतीय है नहीं। क्योंकि इनके रगों में खून भारतीयों का नहीं या तो  फिरंगियों का है या मुगलों का। वैसे भी मुस्लिम समुदाय ब्लड डोनेशन खूब करती है ताकि अधिक से अधिक लोगों में उनका खून जा सके ।
            केवल सबको मालिक बनना है । मालिक बनने की लिए सरकारों ने आरक्षण दे रखा है । और जातिगत प्रमाण पत्र भी आपके सामने है । हर 10 वर्ष पर जातिगत जनगणना होता है । ताकि आप जातिगत अनुमान लगा सकें कितना वोट आपको मिलेगा और कितना खरीदना है। ब्रिटिश सरकार द्वारा यह व्यवस्था लाई गई है । क्योंकि जिन्हें गुलाम बनाना है । उनकी संपूर्ण जानकारी होनी चाहिए उनके पास जैसे उनकी शिक्षा, व्यापार, संख्या, सम्पत्ति, उनका शक्ति सामर्थ्य आदि सब कुछ।
        किसी तरह एक बार मालिक बन गया तो पुरी ज़िन्दगी वेतन भत्ता मिलता रहेगा। आराम और सुकून कि ज़िन्दगी कटेगी। अगली सात पीढ़ी के लिए करके जाऊंगा बच्चे भी क्या याद रखेंगे।
            अच्छा इसकी भी एक समय अवधि निश्चित है 5-6 वर्ष के लिए है । इस समय अंतराल में ही लूट सकते हैं । हां वेतन भत्ता पुरी जिंदगी मिलेगी आपको। ये हैं मालिक बनने के पीछे का स्वार्थ। यह स्वार्थ आज का नया नहीं है इसका जन्म अतीत में हुआ था। 19वीं शताब्दी में भी थे कुछ राज-राजवाड़े वेतन भत्ता प्राप्त करके अपने को सदा के लिए सुरक्षित महसूस करते रहे और आम जन सेना आदि में नौकरी कर के गांव वालों के सामने रौब दिखाते रहे, चौधरी बनते रहे लंगड़ी विदेशी ज़ुबान में धौंस जमाते पर उन्हें ये अनुमान भी नहीं रहा कि उनकी यह झुठी शान धीरे-धीरे देश को परतंत्रता के मार्ग पर ले जा रहा है ।
           1857 में कुल 3,56,000 हजार सैनिकों में मात्र 45,000 हजार ही यूरोपीयन सैनिक थे । बाकी 3,11,000 हजार भारतीय सैनिक ही ईस्ट इंडिया कंपनी में। जो अपने झुठी शान के लिए कंपनी में नौकर बने रहे । दुसरी ओर भारत की छोटी बड़ी सभी रियासतों को मिला लें तो लगभग 3,75,000-3,85,000 हजार सैनिकों का आकार था । 70,000 घुड़सवार और 11,000 तोपची एवं 4,000 तोपें थी।
           जो कंपनी से किसी भी तरह से बड़ी संख्या थी । और अगर कंपनी में कार्यरत भारतीय और रियासतों में कार्यरत सैनिकों को मिला दें तो ( 3,11,000 + 3,75,000 ) 6,86000 हजार ये बहुत बड़ी संख्या थी । कंपनी को भारत से बाहर करने के लिए।
         स्वयं अकेले भी भारतीय रियासतों की सैनिकों का आकार कंपनी से बड़ी थी । पर क्या करें व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा भी कोई चीज होती है। राजवाड़ों और आम जनता (जो कंपनी में नौकर थे ) का निजी स्वार्थ मालिक बनने का झुठी शान आड़े आता रहा और हम भारत मां को हम एक छत के नीचे न ला सके ।
          परिणाम ये हुआ कि कंपनी गई और रानी आ गई। नये - नये कानून बने और भारतीय संपूर्ण प्राकृतिक संपत्ति को सरकारी घोषित कर दिया गया । भारत का सभी जैसे :- सोना, चांदी, हीरा, मोती,लोहा, तांबा, अलमुनियम सभी धातुएं, कोयला आदि अर्थात् जमीन के अंदर का सब कुछ,जमीन के ऊपर के अनेकों प्रकार का चंदन,  सखुआ, सागवान, शीशम आदि सभी अमूल्य लड़कियां अर्थात् जंगल, पहाड़, शिक्षा, न्याय, गांव का ज़मीन जो कभी व्यक्तिगत नहीं था उसे निजी संपत्ति बना दिया गया मतलब आप क्रय-विक्रय कर सकते हैं ।
         मतलब यूं कहे तो धीरे-धीरे सब कुछ ब्रिटिश सरकार का हो गया । झूठी शान और मालिक बनने की प्रवृत्ति ने भारत को कितना लुटवाया है यह मैं अब आंकड़ों से बताता हूं ।
          आज से 220-30 वर्ष पुर्व 1793 से 1803 तक 20 लाख पाउंड स्टर्लिंग प्रतिवर्ष भारत से ब्रिटेन गया । अब के तुलना में कई अरब पाउंड के बराबर । जो उनके औद्योगिक क्रांति का कारण बना । इससे पुर्व भारत के लूट से ही 1760 में ब्रिटेन डच एवं अन्यों के कर्ज़ से मुक्ति पा सका था।
         ब्रिटेन ने भारत से जो लुटा उसकी एक अनुमानित आंकड़ा मुग़ल काल से दादा भाई नौरोजी के समय तक 1885 तक लगभग 350 लाख पाउंड स्टर्लिंग प्रतिवर्ष बताई गई है।
         आपके मन में यह प्रश्न होगा कि भारत में इतनी संपत्ति आई कहां से थी । पुरी दुनिया में भारत वस्त्रों, रेशम और मसालों के बदले केवल सोना लेता रहा। क्योंकि उनके पास सोना को छोड़ कर कुछ दूसरा नहीं था भारत को देने के लिए। और भारत के पास क्या ऐसी कमी थी कि जो सोना छोड़कर दूसरा कुछ लेता । पिछले 20 शताब्दियों से भारत विश्व का 70-80% जीडीपी चीन के साथ मिलकर नियंत्रित करता था ।

शेष क्रमशः आगे
उत्तम प्रकाश
9416044828

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