निडर भाभी

रात के आठ बजे थे। इस समय भाभी अपनी पड़ोसन के साथ संस्कृत पढ़ा करती थीं। इसके लिए उन्होंने एक प्राध्यापक नियुक्त कर रखा था। तभी दरवाजे से कोई उन्हें आवाज लगाया। किताब एक ओर रखकर भाभी बाहर आ गई और उन्हें अंदर आने के लिए कहा।
वें धीमे स्वर में बोलें, "भाभी, एक विशेष काम है। लेकिन तत्काल नहीं बताया जा सकता।"
"तो फिर थोड़ा रुक जाइए।" यह कहकर भाभी अंदर चली गई । अध्यापक जी को कोई कारण बताकर पढ़ाई बंद कर दी। अध्यापक और पड़ोसन के चले जाने के बाद उन्होंने उन को अंदर बुलाया और काम पूछा।
"घर में पैसे पड़े है?" उन्होंने एकदम प्रश्न किया।
"हाँ, पड़े है। बताओ, कितने चाहिए?"
"जितने भी हो, सारे चाहिए।
कमर में लटका चाभी का गुच्छा निकालकर अलमारी खोली और साड़ियों के तह में 
सँभालकर रखे हुए पाँच सौ रूपया निकालकर उनको पकड़ा दिए।
हाथ में पैसे लिये वे अभी भी चिंतित दिखाई दे रहा था। सहसा उसने पूछा,
"भाभीजी, आप बाहर जा सकेंगी? इस शहर से बाहर?" 
कहां जाना है?" भाभी ने प्रश्न किया। "एक आदमी को लाहौर के बाहर पहुँचाना है। उसके साथ मेम साहब बनकर जाना होगा। काम जोखिम का है। सोचकर बताइए। शायद जान पर भी बन सकती है।"  वें उनके चेहरे की ओर देखते हुए पूछे। भाभी ने शांत स्वर में पूछा, "कौन आदमी है?"
"कोई भी हो।" उन्होंने ने बात टाली।
"जाऊँगी।" भाभी ने दृढ़ स्वर में कहां।
"ठीक है। आज रात वह आदमी यहीं रहेगा।"
सहमित मिलने के बाद वें वहाँ से चला गया। लेकिन भाभी का मन बेचैन था। वे बड़ी अधीरता से उनकी प्रतीक्षा करने लगीं।
कुछ समय बाद वह वापस आ गया। उसके साथ एक आदमी आया। उस लंबे युवक ने ओवरकोट पहन रखा था। सिर पर हैट था।
भाभी ने उस अजनबी पर सरसरी नजर डाली और उन्हें अंदर ले आई।
"उनका सेवक भी आया है।"
"उसे इस तरफ के छोटे कमरे में ठहराइए।"भाभी ने कहा। उस साँवले और नाटे-से को उन्होंने उसका बिस्तर देकर बताए हुए कमरे में भेज दिया। लेकिन भाभी सिर झुकाए बैठी हुई थीं। पराए आदमी की ओर देखने में उन्हें संकोच हो रहा था। 
लेकिन अतिथि शरारत से मुसकराते हुए उन्हें देख रहा था।
"भाभीजी, आपने इन्हें पहचाना? देखिए तो।" उन्होंने मुसकराते हुए कहा।
अब जाकर भाभी ने नजर उठाई और अजनबी को देखा। आँख मिलते ही उस आदमी को हँसी आ गई। उसे हँसते देखकर भाभी ने उसे पहचान लिया और स्वयं भी हँसते हुए बोलीं, "अरे, आप। बिल्कुल भी पहचान में नहीं आ रहे है।"
तीनों मिलकर हँस पड़े।
"और वह नौकर कौन है?"
" सेवक।" कौन है।
भाभी के मन का बोझ दूर हो गया। किसी अनजान व्यक्ति के साथ जाने के लिए वे सहमत तो गई थीं, लेकिन फिर भी उन्हें यह काम कठीन लग रहा था। अब उन्हें उन दोनों के साथ जाने में कोई परेशानी नहीं थी।
तभी वें बोलें, "भाभीजी, शचिन्द्र को भी साथ ले जाना होगा।"
उनके इस बात को सुनकर भाभी का ममता जाग उठा। अपने प्राण को संकट में डालने के लिए वे सहर्ष तैयार थीं, लेकिन अपने एकमात्र पुत्र को मौत के मुँह में ले जाना उन्हें कठीन प्रतीत हो रहा था। परंतु फिर उन्होंने अपने ममता के आवेग को रोक लिया और सहमित में सिर हिला दिया। 

प्रश्न - भाभी का नाम क्या था ? 
प्रश्न - भाभी से पैसा मांगने वाले व्यक्ति का नाम क्या था ? 
प्रश्न - लाहौर से बाहर किसे जाना था ?
प्रश्न - सेवक का नाम क्या था ? 

निम्नलिखित नं पर उत्तर भेज सकते हैं ।
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9416044828


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