जवानी

मैं सब समझता था 
पर कुतर्क करता था
सुनने की आदत न थी 
सुनाता रहता था 
खून में जवानी थी
हर बात में रवानी थी
मुझे समझाने वाली हर किस्ती पुरानी थी
मैं उबाल में था 
मेरा हर कथन बबाल में था 
मैं खुद असिद्ध था 
पर सिद्ध करना चाहता था 
रोकना चाहा हर किसी ने मुझे
पर मैं तो आकाश में था
उड़ते चमन से मैं बात करता 
हवा था हवा के साथ बहता
बुजुर्ग नादान कहते मुझे
धरा कि न मैं परवाह करता 
पर न जाने कब शाम हो गई 
सफ़ेद आकाश लाल हो गई 
ताऊ की बात साफ़ हो गई 
आकाश तमस से घिर गई 
न रहा साथी कोई
न रही संगाथी कोई 
रंग फीका पड़ गया
वदन ढीला पड़ गया 
न अब जवानी रही 
न कोई कहानी रही 

वैदिक सुप्रभात 
उत्तम प्रकाश 
9416044828





















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