पत्थर
पत्थर हुं साहब
आग उगलता हुं
ख़ामोश रह कर भी
चोट करता हुं ।
मत पूछो दर्द मेरा
दुनिया जूता घसीटती है मुझ पर
कब्र बनाती है मुझ से
ताज हो या किला
महल हो या मक्बरा
मत पूछो आसियाना मेरा
पथिक का पथ हुं मैं
राही का राह गिर हुं मैं
अतीत का प्राण हुं मैं
राजा के लिए अर्थ हुं मैं
कृषक के लिए व्यर्थ ही मैं
मत पूछो सामर्थ मेरा
शीर्ष हुं मैं दुनिया का
पानी को शुद्ध करता हुं
हवा को अवरूद्ध करता हुं
चट्टान हुं साहब
जो मुझे तोड़ते
वही एक दिन पुजते है ।
मंदिरों में राम हुं मैं
घर-घर में श्याम हुं मैं
कालो का काल हूं
हर चौराहे पर हलूमान हुं।
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
9416044828
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