क्या बनें मालिक या नौकर - 6 ?

जब युद्ध तय हो गया तो 21 जून 1757 को सिराजउद्दौला फ़ौज लेकर हुगली के पूर्वी तट पर कीचड़ मिट्टी के साथ कई नालों को पार करता हुआ प्लासी पहुँच गया। नाला पार करते समय ही उसकी सेना के हालत पस्त हो गया था। उसकी फ़ौज में उसके दो विश्वासपात्र मीर मदन 5,000 घुड़सवार और मोहन 7,000 पैदल सेना लेकर चले। तीन विश्वासघाती सेनापति मीरजाफ़र व लुत्फ़ खान 15,000 घुड़सवार और रॉय दुर्लभ 30,000 पैदल सेना के साथ पहुँचे। एक फ़्रांसीसी जो इनकी ओर से लड़ रहा था तोपख़ाना लेकर पहुँचा।
            दूसरी ओर कलकत्ता से क्लाइव 3,000 कुल सैनिक जिसमें 800 अंग्रेज़ और 2,200 हिंदुस्तानी सेना लेकर 200 नाव में रसद गोला बारूद लेकर चला। साथ में एडमिरल वाटसन 50 नेवी सिपाहियों के साथ ०ट से चला और 20 जून को कटवा के क़िले पर तैनात किलेदार को भगाकर क़ब्ज़ा कर लिया। कटवा से वह हुगली के पश्चिमी किनारे- किनारे 22 जून 1757 को उस जगह पहुँचा। सिराजूदौला के साथ 53 भारी तोप और क्लाइव के पास 8 हल्की तोप और 2 हेविट्जर थीं। दोनो सेनाएँ युद्ध के लिए तैयार थीं।
        क्लाइव और मीर जाफ़र के बीच तय हुआ था कि जाफ़र और उसके दो गुर्गे लुत्फ़ खान और राय दुर्लभ फ़ौज लेकर मैदान में तो रहेंगे परंतु युद्ध नहीं करेंगे क्योंकि क्लाइव के पास घुड़सवार सेना नहीं थी इस कमज़ोरी का काट उसने यह निकाला था। साथ में मीर जाफर ने सिराजुद्दौला के व्यूह रचना का विवरण भी एक जासूस द्वारा क्लाइव को भिजवा दिया ।
          संयोग बस वर्षा होने लगी । तब सिराजुद्दौला ने मीर जाफ़र को हमला करने का आदेश भिजवाया तो जाफ़र के तोपचियों ने कहा कि सारा बारूद गीला हो गया है तोप नहीं चल सकतीं। उसने बहाना बना दिया । सिराजुद्दौला को जाफ़र की दगावाजी का पता चल चुका था तो उसने अपने दो स्वामिभक्त मीर मदन और मोहन को आक्रमण के लिए बोला। मुग़ल अपनी घुड़सवार और बंदूकचियों को लेकर तेज़ी से आगे बढ़े। क्लाइव इसी अवसर की ताक में था उसने तोपों के मुँह खोल दिए एक घंटे में मीर मदन सहित 500 सैनिक मारे गए और मोहन बुरी तरह घायल होकर पीछे हट गया सारी फ़ौज में भगदड़ मच गई। क्लाइव ने तोपमारी रुकवा दी। सिराजुद्दौला ने मीर जाफ़र को बुलवाया तो वह नहीं पहुँचा उसकी जगह राय दुर्लभ ने पहुँच कर नवाब से कहा कि वो वहाँ से सुरक्षित निकल जायें मीर जाफ़र के साथ वे मोर्चा संभाल लेंगे। सिराजुद्दौला एक टुकड़ी के साथ मुर्शिदाबाद की ओर कूच कर गया। उसके बाद मीर जाफ़र, राय दुर्लभ और लुत्फ़ खान की सेना क्लाइव की सेना से जा मिली। क्लाइव ने युद्ध जीत लिया। वह इंग्लैण्ड का सबसे बड़ा हीरो बन चुका था। उसका स्टैचू आज भी लंदन में चर्चिल वार रूम के सामने शान से उसकी इस उपलब्धि की याद दिलाता हुआ हमारा मुँह चिड़ाता है। हिंदुस्तान गुलामी की दहलीज पर क़दम रख चुका था। युद्ध पाँच बजे शाम को समाप्त हो गया। क्लाइव ने आयरलैंड में एक बड़ी जायदाद ख़रीदी वह आज भी प्लासी स्टेट के नाम से जानी जाती है। 
             ध्यान रहे क्लाइव और उसके साथ मात्र 800 अंग्रेजी सेना थी । बाकी उसके सेना में 2200 भारतीय ही थे और मीर जाफर गद्दार तो था ही । 
              क्लाइव युद्ध इस लिए जीत पाया क्योंकि मीर जाफर पद का लालची था उसे भी मालिक बनना था । ठीक उसी प्रकार जैसे 1947 में उन दोनों को प्रधानमंत्री बनना था चाहे देश बट ही क्यों न जाए । अब आगे देखते हैं ।
                  मीर जाफ़र को गुप्त संधि के तहत 2,34,000 क्लाइव को युद्ध का ख़र्च 4,00,000 कम्पनी को और 1,50,000 रुपये कम्पनी के अफसरों को देना था। सो क्लाइव चुकारा लेने 29 जून को मुर्शिदाबाद जा धमका। सबसे पहले क्लाइव ने उसे बंगाल बिहार उड़ीसा का सूबेदार नियुक्त करने की रस्म निभाई जिसका उसको कोई अधिकार नहीं था क्योंकि सूबेदारी दिल्ली का मुग़ल बादशाह देता था जो ख़ुद भागा-भागा फिर रहा था।
               तत्पश्चात ख़ज़ाना खोला गया जिसमें ज़्यादा माल नहीं निकला। क्लाइव ने अपना हिस्सा लिया और बाक़ी अर्धवार्षिक क़िस्तों में तीन साल तक चुकाना मंजूर किया साथ में 24 परगना की 1400 किलोमीटर जागीर जो मुर्शिदाबाद से दक्षिण में बंगाल की खाड़ी तक फैली हुई थी कम्पनी के नाम लिखवा ली। कलकत्ता में अंग्रेज़ी बस्ती बसाने और क्लाइव को 40 गाँव की व्यक्तिगत जागीर भी लिखवाई गई। कम्पनी परदे के पीछे बंगाल की मालिक बन चुकी थी मीर जाफ़र दिखावे भर का नवाब बन कर रह गया । 
            ख़ज़ाना से धन अर्जित करना और अगले तीन साल तक धन की उगाही जारी रखना क्लाइव का उद्देश्य था ताकि नवाब के पास इतनी रक़म ही न बचे की वो सेना का रख रखाव कर सके। उसने बंगाल के सबसे उपजाऊ जिले चिटगाँव, मिदनापुर और वर्धमान सहित 24 परगना की 1400 एकड़ ज़मीन कम्पनी के नाम पर हासिल करके लगान और कच्चा माल उगाही शुरू करवा दी। टैक्स न चुकाने की कारोबारी छूट और कम्पनी द्वारा अपने कर्मचारियों और व्यापारियों को कर छूट दिलाकर लाभ पहुँचना शुरू कर दिया। 
            कम्पनी द्वारा हड़पी गई ज़मीन में सुंदरवन का इलाक़ा आता है जहाँ saltpetre नामक एक नमक जिसमें potassium nitrate होता है और जिसका उपयोग माँस को सुखाकर रखने और बारूद बनाने में किया जाता है। क्लाइव ने मीर जाफ़र से एक खुला फ़रमान लिखवा लिया कि कम्पनी का इस नमक के व्यापार में एकाधिकार रहेगा। इसके परिणाम दूरगामी थे। अगले सौ साल अंग्रेज़ों को रसद और असला के रख रखाव में इसकी ज़रूरत पड़नी थी।
             इस बीच क्लाइव ने फ्रान्स से चन्दननगर और डच से चिनसुरा की फ़ैक्टरी छुड़ा कर क़ब्ज़ा कर लिया। पूरा दक्षिण बंगाल कलकत्ता सहित अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े में आ गया।
               ये सब क्लाइव अनाधिकृत रूप से कर रहा था। उसे सिर्फ़ कलकत्ता पर क़ब्ज़ा करने कमान सौंपी गई थी। रॉजर ड्रेक उस समय वहाँ का गवर्नर था। एक साल बाद जुलाई 1758 में कम्पनी ने क्लाइव को कलकत्ता रेज़िडेन्सी का प्रेजिडेंट यानि गवर्नर नियुक्त कर दिया। वह जनवरी 1760 तक इस पद पर रहा और मीर जाफ़र को बरबादी के कगार पर पहुँचाकर ही इंग्लैंड लौट गया। 
          अंत में उसके गालब्लेडर में पथरी हो गया। मात्र 49 वसंत देखने के बाद भयानक दर्द से छुट्टी पाने के लिए उसने अपने धारदार छुरे से अपना गला काट लिया था। ध्यान रहे क्लाइव के नितियों के कारण ही 1769 से 1773 तक चार वर्षो में बंगाल और बिहार में एक करोड़ लोग मरे साथ ही ब्रिटेन माला-माल हुआ ।
                 मीर जाफर की अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ मालिक बनने की चाह, शासक बनने की चाह भारत को डुबो दिया । 
                तब से लेकर आज तक मीर जाफर मरा नहीं, अभी भी जीवित है आपके आस-पड़ोस में इधर-उधर समाज में नेताओं में कहीं न कहीं दिख जाएगा । कोई पदाधिकारी बनना चाहता है, कोई पद का लालची है, कोई कुर्सी का लालची है, कोई धन का लालची है । पता नहीं आज का आधुनिक भारत किस ओर चल दिए । 
शेष क्रमशः आगे.....
वैदिक सुप्रभात 
उत्तम प्रकाश 
9416044828

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