भारत ।
भारत में व्यापार सब कुछ नहीं है । व्यापार जीवन का मूल उद्देश्य भी नहीं है । भारत में व्यापार केवल इसलिए की जाती है ताकी कुछ एक वस्तु जो हमारे पास नहीं है उसको हम आसपास के निकट के गांव से प्राप्त कर लें ।
पैसा कमाना भारत में ठीक नहीं माना जाता । वैश्य और वैश्या शब्द में केवल एक मात्र का अंतर है । पैसा कमाते समय अगर आपकी नीयत ठीक है तब तो ठीक है अन्यथा अगर नियत डोल गया तो वही वैश्य, वैश्या बन जाता है ।
भारत में लोग वास्तु कमाते हैं । यहां वस्तु विनिमय का प्रचलन है अर्थात एक वस्तु से दूसरी वस्तु कमाई जाती है । फसल धन, गेहूं, मक्का, ज्वार, बाजार, सोना, चांदी, हीरा, मोती, मान-प्रतिष्ठा, इज्जत-सम्मान यह सब कुछ अर्जित करना पैसे कमाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है । इन सबों में भी स्वाभिमान सबसे बड़ा है। अपने देश भारत में स्वधर्म का पालन, मूंछ का ताव और सर की पगड़ी की लाज बचाकर जीवन जीना सबसे बड़ी बात है ।
भारत में इन चीजों के सामने जीवन का कोई महत्व नहीं है । स्वाभिमान और धर्म के लिए मरना भी पड़े तो कोई बड़ी बात नहीं है । इन चीजों के आगे पैसा तुक्ष वस्तु है । इसलिए भारत को गुलाम बनाकर रखना या गुलाम बनाना इतना सरल और आसान नहीं था, ब्रिटेन के लिए। जब तक कि उनके आत्मस्वाभिमान को कुचल न दी जाए । मुगल भारत में आए और भारतीय हो गए । भारत से प्रभावित हुए । लेकिन ब्रिटिश भारत में आए और भारतियों को ब्रिटिश बना दीए । लेकिन उन्होंने कभी भी भारतीयता को स्वीकार नहीं किया। पिछले निकट लगभग 150 से 200 वर्षों में हम भारतीयों कि जीवन शैली इतनी नीचे गिर चुकी है। हम कितना दरिद्र और पतित हो चुके हैं कि आज हमारे लिए पैसा ही सब कुछ है । पैसा के लिए कुछ भी करना यह हमारी बौद्धिक और नैतिक दरिद्रता की पहचान है और यह दरिद्रता यूं ही नहीं आई है इसे लाने के लिए ब्रिटिश सरकार को बहुत परिश्रम करना पड़ा है मेरे इस लेख को पढ़ें " अगर आप गुलाम बनाना चाहते है तो"
भारत में परिवार और व्यक्ति का बहुत महत्व है । भारतीय वैदिक वाङ्गमय व्यक्ति और परिवार निर्माण की बात करता है ताकि जब व्यक्ति का निर्माण हो जाए तो वह परिवार का संरचना कर सकें और सभी एक दूसरे के साथ मिल-जुलकर समाजिक एवं राष्ट्रीय कल्याण में अपना सहयोग दे सकें । क्योंकि भारतीय दर्शन के अनुसार मोक्ष पाना अंतिम लक्ष्य है शासन करना या पराधीन बनाना नहीं। स्वयं मुक्त हो जाना एवं दूसरों को मुक्त होने में सहयोग करना ।
मोक्ष पाने की लिए जीवन की स्थिरता, बौद्ध क्षमता एवं योग में निरंतर आगे बढ़ना जरूरी है । कर्म की कुशलता ही योग है। जीवन में स्थिरता और शांति हेतु व्यापार का स्थिर होना जरुरी । व्यापार में स्थिरता के लिए परिवार का स्थिर होना जरुरी है। परिवार का निर्माण महिला से होता है और आप अपने जीवन में महिलाओं को बदलते रहे तो परिवार कभी स्थिर नहीं हो सकता। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में तलाक़ नहीं होता । यह इस्लाम और ईसाइयत से आया है । क्योंकि वहां अंतिम लक्ष्य मोक्ष नहीं है। उनका अंतिम लक्ष्य शारीरिक भोग और सामने वाले को पराधीन बनाना है। जब परिवार स्थिर हो जाए तो व्यक्ति मजबूत होता है और मजबूत व्यक्ति को गुलाम बनाना आसान नहीं होता है इसलिए परिवार को मजबूत न होने दें । महिलाओं को बदलते रहे तलाश की प्रथा को लाए । व्यक्ति टूट जाए या फिर भोग में लिप्त रहे ताकि उसे लुटना सरल हो। यह निति है इस्लाम और ईसाइयत की ।
विवाह के बाद आप एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते यही कारण है कि भारत में विवाह के पहले बहुत सारे गुण-धर्म, जन्म पत्री आदी सब कुछ मिलाये जाते हैं । ताकि जीवन में स्थिरता आ सके। तलाक़ न हो । परिवार को स्थिर करना है इसलिए व्यापार में स्थिरता अनिवार्य है। व्यापार में स्थिरता परंपरा से आती है। जो व्यक्ति, समाज, या समुह मिट्टी से लोहा अलग करता है उसे लोहा संबंधी ज्ञान है। उसकी अगली पीढ़ी उस ज्ञान, विधि, या हुनर को देख-देखकर बहुत सरल और आसान तरीके से सीख लेती है। और समय आने पर उसको वह रोजगार बहुत आसानी से प्राप्त हो जाता है । अर्थात लोहार का बेटा लोहार, कुम्हार का बेटा कुम्हार, स्वर्णकार का बेटा स्वर्णकार, बढ़ई का बेटा बढ़ई, लकड़हारे का बेटा लकड़हारा, धोबी का बेटा धोबी, तुरहा (सब्जी उत्पादक) का बेटा तुरहा, क्षत्रिय का बेटा क्षत्रिय, ब्राह्मण के बेटा ब्राह्मण, पंडित का बेटा पंडित। मतलब जन्म के बाद आप एक विशेष प्रकार का हुनर सीख लिए और समय आने पर आपको रोजगार मिल गया । रोजगार संबंधी तनाव भारतीय समाज में नहीं था ।
प्रोसेस पेटेंट, प्रोडक्ट पेटेंट, कोपी राइट आदि कानून बनाए गए हैं। ताकि आपके द्वारा किए गए अनुसंधान, रिसर्च, वर्षों तक किए गए परिश्रम द्वारा प्राप्त हुनर पर आपका एकाधिकार हो सके। कोई भी कंपनी अपने मूलभूत तकनीकी को कभी शेयर नहीं करती । जो उसके व्यापार का मुख्य आधार है ।
भारतीय समाज में भी एक समुदाय या समाज अपने व्यक्तिगत पारंपरिक हुनर, कला को दूसरे समूह के साथ कभी भी साझा नहीं करती थी। मतलब प्रत्येक समुदाय अपनी कला या हुनर का साझा अपने समुदाय के लोगों के साथ ही करती थी जैसे लोहार लोहार के बेटे को छोड़कर, स्वर्णकार स्वर्णकार के बेटे को छोड़कर, कुम्हार कुम्हार के बेटे को छोड़कर, पंडित अपना कर्मकांड पंडित के बेटे को छोड़कर आदि अन्य किसी को अपना पारंपरिक कला नहीं सीखाते थे भारतीय समाज में धर्म के रूप में इस व्यवस्था को मानी जाती थी। हर व्यक्ति अपने पारंपरिक हुनर या कला को सीखाना-सीखना अपना धर्म समझता था और यह सारी व्यवस्था फ्री की थी इसमें किसी भी प्रकार का धन व्यय नहीं होता सीखने वाले युवक का और सिखाने वाले को फ्री का श्रम प्राप्त हो जाता था।
हां गुरुकुल में जाकर आप वेदादि संपूर्ण वैदिक वाङ्मय में को बहुत आसानी से किसी भी समाज का कोई भी व्यक्ति विद्या ग्रहण कर सकता था।
ब्रिटिश सरकार को यह फ्री की व्यवस्था पची नहीं उसने कहा इन सभी व्यवस्था को बिकाऊ बनाओ और इसको बेचो, बेचकर पैसा कमाओ । उसने कागज के टुकड़ों पर हूनर को बेचना शुरू किया । जिसके पास उसके कागज का टुकड़ा नहीं है वह अवैध है। उसे रोजगार नहीं मिल सकता । वह बेकार है।
परिणाम यह हुआ कि पारंपरिक ज्ञान और पारंपरिक रोजगार दोनों समाप्त होने लगे और एक बहुत बड़ी बेरोजगारी की फौज देश में खड़ी हो गई ।
शेष क्रमशः आगे
वैदिक सुप्रभात
9416044828
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