महादेव जी (श्रधांजलि )
विद्वानों कि यह मान्यता है अगर आप अपने बच्चे को किसी विशेष मार्ग का सुपथिक बनाना चाहते है तो उन्हें बालपन में ही उस सांचे में ढालना होगा जैसा आप उन्हें चाहते है।
मां के गर्भ में अगर संस्कार पड़ा हो तो जीवन के किसी भी पड़ाव पर कुंजी मिलते ही संस्कारों का ताला खुलना तय है। जिस प्रकार मुंशीराम स्वामी श्रद्धानन्द बन गए। सातवलेकर जी कि रुचि तो चित्रकारी में थी पर उन्हें विवाह के पश्चात् कुंजी मिलते ही चमत्कार हुआ। आज उनकी गिनती वेदभाष्य कारों में होती है।
त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चन्द्र जी रावण पर विजय प्राप्त करने हेतु देवों के देव महादेव जी की आराधना किये थे। पर कलियुग तो विपरीत का नाम है यहां महादेव जी श्रीराम चन्द्र जी के उपासक है, रामलीला में, नाटक और गायन के माध्यम से याद करते रहे। समय-समय पर कुंजी भी बनाते रहे ताकि जीवन का ताला खोला जा सके। अपनी भी और सामने वाले की भी।
एक दिन रामलीला करते-करते और ताला खोलते-खोलते श्रीराम चन्द्र जी कि कृपा हुई श्रीराम चन्द्र जी तो खुद नहीं मिले। चुंकि युग बदल चुका था महादेव जी को रामेश्वर जी मिल गए और रामेश्वर जी उन्हें वही कुंजी थमाई जिससे बुद्धि की ताला खोला जाता है। सत्यार्थ प्रकाश यह वही ग्रंथ था जो कभी 1933 से पुर्व प्रभु जी के हाथ लगी थी तब नरकटियागंज में आर्य समाज की नींव डाली गई और बहादुर जी कमान संभालते हुए आगे लेकर चल पड़े। श्री प्रभु नारायण आर्य एवं श्री जंगबहादुर आर्य प्रथम पीठी के सशक्त आर्य समाजी थे। तब प्रभु नारायण आर्य जी का निर्णय अंतिम निर्णय होता था। दुसरे पीठी में महाराज जी का पर बात तीसरी पीठी कि करें तो श्री महादेव जी का निर्णय ही अंतिम निर्णय सिरोधार्य था और अगर उनकी बात न मानी जाए तो सभी के सभी भुक्त-भोगी होते थे। फिर बाद में संभालना उन्हीं को पड़ता था और नीलकंठ की तरह दोषों को पीकर भी डकारते नहीं थे। जैसे किसी ने कुछ किया ही न हो।
महादेव जी उपदेशक तो नहीं थे पर जलसे के लिए बहुत ही उच्च कोटि के उपदेशकों का चयन करते थे। पुरोहित भी नहीं थे पर पौरोहित्य कार्य के लिए चयन उच्च कोटि का होता था। चुंकि बुद्धि का ताला खुल चुका था। कुंजी हाथ में थी युवाओं के बुद्धि का ताला खोलते रहे। सुमन के साथ सुबोध भी , आदेश के साथ अवधेश भी आदि अनेक युवाओं को तैयार किए।
देवें के देव महादेव अपने तीसरे नेत्र से काम देव को भस्म कर दिये। जब-जब आर्य समाज नरकटियागंज एवं आर्य पुस्तकालय पर कुछ अल्प ज्ञानियों कि कुदृष्टि पड़ी तब-तब महादेव जी अपने तीक्ष्ण बल-बुद्धि के प्रहार से उन्हें परास्त किये।
भिक्षु चाहे कोई भी हो महादेव के दर से खाली कभी कोई नहीं जाता देव हो या दानव। पर समय विपरीत है। इस युग के महादेव जी संभल-संभल कर कदम रखते हैं ताकि कोई दाग न लगे। समाज में कुछ लोग खुश हैं कुछ लोग नाखुश। पर अगर बात आर्य समाज की हो तन-मन-धन से डट कर खड़े रहते थे। आर्य समाज मंदिर में धन के अभाव में निर्माण कार्य 2003 में रुक गया था। सुमन जी कोषाध्यक्ष थे समझ में नहीं आ रहा था क्या करें महादेव जी अपने फिक्स डिपॉजिट तोड़ कर निर्माण कार्य पुरा करायें। मंत्री मंडल बदला, बेचारे महादेव जी स्वयं भिक्षु बन गए। पर शिकायत कहीं न की।
महादेव नाम था, क्रोधी होना तो स्वभाविक था चुंकि भाईयों में सबसे बड़े थे। इन्हें कौन डांटता।
रामेश्वर जी ने कुंजी थमाई थी। राम जी खुद व्यापार संभालते रहे। महादेव जी को प्रयाप्त समय मिलता रहा। समाज सेवा करते रहे।
स्वयं स्वस्थ नहीं रहते, पर सबसे मिलते रहते,
रुठ अगर आप जाएं उनसे तो वे मनाते रहते,
युद्ध समय-समय पर सबने किया उनसे पर उनके विनम्रता के आगे सब झुकते रहते,
उनके डांट में भी प्रेम था, मोह था, लगाव था, अपनेपन का एहसास था।
दाग बहुतों ने लगाना चाहा, पर बेदाग रहे वो, शिकायत सबसे सुनी है उनकी,
पर ना समझी और नादानी सदा वे कहते रहे वो,
एक नहीं अनेकों विदाईयां की गरीब बेटियों की।
महादेव कालों के काल महाकाल है। काल बार-बार आता रहा, गुहार लगाता रहा, पर महाकाल टस से मस नहीं हुए क्योंकि हस्तिनापुर को चहुं ओर से सुरक्षित करना चाहते थे। जब आर्य समाज अपने ही अजीज मित्र रामेश्वर जी जिन्होंने कुंजी थमाई थी उनके हाथ में सुरक्षित हो गई ,भवन नया बन गया। कन्या का विवाह हो गया। पुत्र वधू घर आ गई। इन्द्रप्रस्थ तक व्यापार की उंचाई गई। फिर काल की गुहार सुनी न गई कहा अधिक मोह ठीक नहीं चलो अब चलते हैं।
स्वयं तो चले गए पर एक सम्राज्य छोड़ गये। हमनें तो बहुत कुछ सिखा उनसे और आप? ओम् शांति शांति शांति।
विनम्र श्रद्धांजलि
उत्तम प्रकाश
9416044828
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