महाशिवरात्रि
आज महाशिवरात्रि है पूरे देश में शिवलिंग पर दूध चढ़ाया जाएगा और यह तब होगा जब देश में सामान्य तौर पर दूध का कीमत ₹50 लीटर है । क्या दूध की बढ़ती कीमत के साथ साथ इस परंपरा को निभाना कहां तक उचित है । और यह परंपरा शुरू ही क्यों हुई थी ?
तो आइए अब इस परंपरा के मूल में ध्यान देते हैं ।
देशी गाय का दूध पुर्ण पौष्टिक आहार होता है । जिसमें लोह्य तत्व (आयरन) को छोड़कर अन्य सभी पोषक तत्व पाए जाते हैं । जो बच्चों के विकाश के लिए पूर्ण पोषक आहार माना जाता है । दूसरी ओर दूध वह जैव- उत्पाद ( बायो प्रोडक्ट ) है । जिसका प्रयोग किसी भी प्रकार के खुशी के अवसर, उत्सव, पर्व-त्यौहार आदि में विभिन्न प्रकार की मिठाइयों को बनाने में किया जाता है । और तब शिवलिंग पर इस दूध को व्यर्थ ही बहा देना कहां तक उचित है ?
इस देश में दूध दही की गंगा बहती थी, जिस समय यह बात कही गई होगी । उस समय गाय से प्राप्त दूध को हम पीने में प्रयोग करते थे बच जाने पर दही जमाने, घी बनाने । विभिन्न प्रकार की मिठाइयों को बनाने में दूध का भरपूर प्रयोग होता रहा । उसके बाद भी अगर दूध बच जाए तो पशुओं को वापस पिला दिए जाते थे । फिर भी दूध का खपत न हो पाए तो दही से बालों को साफ करना, दूध से स्नान करना तब एक लोकोक्ति बनी "दूधो नहाओ पूतो फलो", उसके बाद भी अगर दूध बच जाए तो बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए दूध का प्रयोग करना । पर फिर भी दूध बचा रह जाए तो आयुर्वेदिक औषधियों में दूध का भरपूर प्रयोग करना । मकान बनाने के लिए चुना पत्थर के साथ दूध का मिश्रण करके सीमेंट जैसा पदार्थ बनाना जिससे ईटों की जुड़ाई की जाए । परंतु इन सभी प्रयोगों के बाद भी अगर दूध बच जाए तो अब आदमी उसका क्या करें ?
तब एक नई परंपरा शुरू हुई । कौन सी वह परंपरा थी आईए ध्यान दें । भारत के प्रत्येक गांव में लगभग 2 तालाब कम से कम होते ही थे । मतलब 700000 गांव की बीज 1400000 तालाब और ये जितने भी तालाब थे इन तालाबों के पानी का प्रयोग खेतों की सिंचाई के लिए, पशुओं के स्नान करने के लिए, घरों के बर्तन आदि के सफाई के लिए , कपडो़ की साफई करने के लिए, स्नानादि के लिए इन तालाबों का भरपूर प्रयोग होता था । मुख्यत तालाब और नदियों के पानी का भरपूर प्रयोग खेतों की सिंचाई के लिए होता था । उस समय किसी भी प्रकार के मोटर की सुविधा या नहर की सुविधा नहीं होती थी। किसी भी व्यपारिक प्रतिष्ठान से कचरा एवं शहर की गंदी नालियों का पानी इन तालाबों या नदियों में नहीं गिराए जाते थे । तब आम जनता तालाब एवं नदियों के पानी को स्वच्छ बनाने रखने के लिए प्रयत्न रत् रहती थी क्योंकि यही जल उनके जीवन का मूल आधार था।
अब यह जल स्वच्छ बना रहे , इसमें दूषित किटाणु न पनपे , इसका जल उपजाऊ हो, इस जल में पोषक तत्व बढ़ता रहे , इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए । प्रत्येक तालाबों एवं नदियों के किनारे अलग-अलग विभिन्न प्रकार के शिवमंदिरों का निर्माण किया गया । अब बचे हुए दूध का प्रयोग इन शिव मंदिरों में चढ़ावा के रूप में चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई और दूध ही नहीं दूध के साथ-साथ अन्य कई प्रकार के पदार्थ चढ़ाए जाते हैं जैसे नारियल का फोड़ना अर्थात् नारियल के अंदर का पानी जो बहुत ही ज्यादा पौष्टिक होता है । आजकल इस जल का प्रयोग बायोटेक लैब में भी किए जाते हैं । विभिन्न प्रकार की आयुर्वेदिक औषधियों का प्रयोग जैसे बेलपत्र , भांग,शहद आदि शिव मंदिर में चढ़ाने कि परंपरा प्रारंभ की गई। ये सभी पदार्थ उन तालाबों एवं नदियों में गिरता था । जिसके कारण नदियों एवं तालाबों के पानी की शुद्धता बनी रहती थी एवं उस पानी में औषधीय गुण आ जाते थे । अब उन्हीं तालाबों एवं नदियों का जल खेतों में विभिन्न कार्यों के लिए एवं जीव-जंतु के लिए यही जल पीने आदि के लिए प्रयोग किए जाते थे ।
परंतु वर्तमान में आज हम इतने ज्यादा विकसित हो गए हैं कि दूध का कीमत आसमान पर है और तालाब एवं नदियों के पानी का प्रयोग हमारे दैनिक जीवन में अब नहीं के बराबर है। परंतु वह प्राचीन परंपरा आज भी भारतीयों में चली आ रही है । इस परंपरा को रोकना तो मेरे विचार से ठीक नहीं है परंतु पुनः तालाब एवं नदियों के पानी का प्रयोग सिंचाई एवं विभिन्न प्रकार के कार्यों में होना चाहिए साथ ही उन कंपनियों को बंद करना भी जरूरी है जो भूमि, वायु एवं जल को किसी भी प्रकार से प्रदूषित करते हैं ।
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