छुआ-छूत
भारतीय समाज में छुआ-छूत एक बहुत बड़ा अभिशाप के रूप में माना जाता है। धड़ल्ले से कहा जाता है कि यह भेदभाव, छुआ-छूत की समस्या ने भारतीय समाज में प्रत्येक वर्ग को एक दूसरे से दूर कर दिया।
समस्या है इसलिए चर्चा का विषय भी है अब यह जानने का प्रयास करेंगे, छुआ-छूत के पीछे की सच्चाई क्या है ?
भारतीय समाज में एक पिता जब अपनी कन्या का विवाह करके लड़की का समर्पण कर देते हैं तो लड़की कि मां कभी भी लड़की के घर पर नहीं जाती हैं। पिता का आगमन लड़की के ससुराल में होता है तो पिता के द्वारा यही प्रयास किया जाता है की लड़की के घर का कुछ भी खाना-पीना न किया जाए, यहां तक की जल भी ग्रहण नहीं करते हैं। हालांकि वर्तमान में बदलाव हुआ है अब लड़की की मां भी अपने बेटी के घर जाकर महीनों रहती है। लेकिन मैं उस समय की बात कर रहा हूं जब छुआ-छूत भी भारतीय समाज में अपने चरम सीमा पर था। तो पिता द्वारा जल का भी ग्रहण न करना या मां का अपनी बेटी के घर न जाना, इस प्रकार का व्यवहार करना क्या छुआ-छूत या भेदभाव के अंदर रखा जाए ?
छुआ-छूत होता तो बहु के ननिहाल में बहु के ससुराल के लोगों का आना मना होता। पर ऐसा नहीं है। क्योंकि इस घर का बेटा अर्थात बेटी के घर के ससुराल का कोई भी व्यक्ति अगर अपने बहू के ननिहाल आ जाए तो पूरे धूमधाम से घर वाले ही नहीं, पूरे कुटुंब वाले और पूरे गांव वाले दामाद जी को, समधी जी को सब किसी को बहुत ही सम्मान पूर्वक आदर करते हैं। हमारे मिथिला में पकवान तो पूछे मत 56 प्रकार के बनते है। अगर मां को यदा-कदा कभी अपनी बेटी से मिलना हो तो वह अपनी बेटी के ससुराल नहीं जाती, वह किसी खास जगह पहुंचती है वहां पर बेटी अपने बच्चों के साथ आती है जहां दोनों का मेल होता है और वह मेल इस स्तर पर बढ़ता गया कि आज वह मेला का रूप ले लिया है। भारत में अलग-अलग जगह पर अलग-अलग अवसरों पर भव्य मेला लगते हैं जिसमें महिलाएं विशेष रूप से इकट्ठा होती है और महिलाओं से संबंधित सामान भी वहां बेचे जाते हैं ताकि बेटी अपनी मां को और मां अपनी बेटी को उनके मन के अनुसार वस्तुएं खरीद कर दे सकें लेकिन मां कभी भी अपनी बेटी के घर नहीं जाती थी। तो आखिर यह, क्या व्यवहार है। क्या इसे भी छुआ-छूत या भेदभाव के अंदर रखा जाए ? अंत में समझेंगे।
यह तो दो परिवारों के बीच की बातें थी अब परिवारों में देख लेते हैं। नई नवेली जब देवरानी आती है अर्थात् छोटी बहू तो बड़े भाई अर्थात छोटे भाई जिसकी पत्नी है उसके बड़े भाई कभी भी लड़की का शरीर मतलब देवरानी का शरीर अपने जेठ के शरीर से स्पर्श नहीं होना चाहिए या जीस बिस्तर पर देवरानी सोती है उस बिस्तर का स्पर्श अपने जेठ से नहीं होना चाहिए, जीस दरी या चटाई पर देवरानी बैठी है उस दरी पर उस समय जेठ नहीं बैठ सकते हैं। ठीक यही समानांतर व्यवहार देवरानी के पति का मामा के साथ भी होता है मतलब मामा जी के जितने भी भांजे हैं उन सब कि पत्नियों का व्यवहार भी वैसा ही होता है जैसा जेठ के साथ होता है। सबके साथ दूरी बनाकर रहना है। तो अब आप यह बताएं कि यहां पर क्या है छुआ-छूत है, भेदभाव है। यह एक पारिवारिक मर्यादा है पुरुषों का अपने घर की स्त्रियों के साथ व्यवहार करने का और स्त्रियों का पुरुषों के साथ व्यवहार करने का। ठीक इसी प्रकार की कुछ मर्यादाएं समाज में भी है समाज के प्रत्येक वर्ग का प्रत्येक वर्ग के साथ आईए अब उसे समझने का प्रयास करते है ।
एक और महत्वपूर्ण बात भारतीय परंपरा में देखने को मिलाता है, अगर परिवार में किसी बच्चे का जन्म हो या परिवार में किसी व्यक्ति का देहांत हो जाए तो छुत्का लग जाता है। बच्चे के जन्म के बाद उस परिवार का व्यक्ति अभी अगले कुछ दिनों तक कहीं भी किसी जगह पर या किसी अन्य दुर जगह पर या किसी दुसरे परिवार में उत्सव में या किसी विशेष कार्यक्रम में नहीं जा सकते। जब तक बच्चे के जन्म के छः दिन के बाद छठियार न हो जाए या व्यक्ति के मरने पर उसकी 12वीं न बीत जाए तब तक उन व्यक्तियों को कहीं दुर आवागमन नहीं करना है या किसी विशेष उत्सव में शामिल नहीं होना है उनका खाना-पीना, रहन-सहन दिनचर्या सब कुछ एक धार्मिक प्रक्रिया के तहत निर्धारित कर दी जाति है। अब इसे क्या कहेंगे छुआ-छूत कहा जाए या एक जीवन शैली या मर्यादा कहा जाए ?
अब मूल बात समझने का प्रयास करते हैं बच्चे की जन्म के तुरंत बाद मानव शरीर विभिन्न प्रकार के बाहरी प्रवेशों से लड़ने का काम करता है बाहर की विभिन्न प्रकार की सुक्ष्म जीव शरीर में प्रवेश करते हैं तो माता और बच्चा दोनों को एक विशेष कमरे में रहते हैं और कमरे से बाहर आग जलाकर रखा जाता है। अगर किसी व्यक्ति को उस कमरे में प्रवेश करना है तो अपने शरीर को उस अग्नि के चारों ओर एक बार घूम कर के प्रवेश करना होता है। ताकि शरीर के किसी अंग पर कहीं भी कोई सूक्ष्म जीव हो तो वह निष्क्रिय हो जाए। फिर वह माता के पास जाते हैं बच्चे से मिलने के लिए अब बच्चे के शरीर में एंटीबॉडी या बाहर से आए हुए जीवाणु से लड़ने के लिए जो इम्यून सिस्टम है उसको तैयार होने में कम से कम 6 से 7 दिन लग जाता है 7 दिन के बाद वह शरीर बाहर से आने वाले कीटाणुओं के लड़ने के लायक हो जाता है ठीक वही स्थिति जब व्यक्ति मरता है तो मरने के तुरंत बाद मृत शरीर से निकलने वाले रोग कारक सूक्ष्म जीव सबसे पहले उन व्यक्तियों पर आक्रमण करते हैं जो मृत व्यक्ति के खास संबंधी है अर्थात जिनके साथ रक्त का संबंध है क्योंकि उस शरीर में वह बहुत तेजी से ग्रो करेगा विस्तार को प्राप्त होगा। इसलिए यह अनुमान होता है कि वह कीटाणु या सूक्ष्मजीव निकट संबंधियों के शरीर में प्रवेश किया होगा और वह उनको लोगों का रोगग्रस्त करेगा। इसलिए प्रतिदिन हवन करते हैं । विभिन्न प्रकार की औषधियां को जलाकर शरीर को शुद्ध करते हैं और लगभग 10-12 दिन में शरीर पुनः काफी अच्छी तरह एंटीबॉडी बना करके उनसे लड़ने के लिए तैयार हो जाता है फिर हम 12वीं करने के बाद या 16 दिन के बाद उस तरह तैयार हो जाते हैं कि हम कहीं भी आ जा सकते हैं ताकि जो बीमारी फैलने वाली है उसका विस्तार अब न हो। जिसका छुआ-छूत से कोई सम्बन्ध नहीं है ।
कुछ लोगों का यह शिकायत है कि हम समाज में छठे हुए लोग है, हमारे साथ वें बैठकर भोजन नहीं करते, हमारे घर का दिया हुआ या स्पर्श किया हुआ पानी नहीं पीते, खाना, खाना तो दूर की बात है । मतलब वह हमें छोटा समझते हैं हमसे भेदभाव करते हैं छुआ-छूत की भाव मानते हैं। हमारा दिया हुआ नहीं खाते। जिन लोगों का यह शिकायत है वह शिकायत अपने जगह पर बिल्कुल ठीक है लेकिन अब समझने का प्रयास करते हैं कि यह भाव आया कहां से और इसके मूल में क्या सच है।
अब इसे एक उदाहरण से समझते हैं,
विश्वविद्यालय में हर प्रकार की विद्यार्थी पढ़ते हैं कभी यदि अपने सीनियर के साथ अगर जूनियर चले गए, किसी रेस्टोरेंट में या किसी होटल में कुछ खाने पीने तो जब पैसा देने की बारी आती है तो सीनियर पैसा देते हैं अगर जूनियर आगे से आकर पैसा दे रहे हों तो वें मना कर देते हैं कि नहीं हम बड़े हैं, पैसा हम देंगे, तुम अपने पास अभी रखो तुम्हारे काम आएगा । मतलब सीनियर जो विद्यार्थी है वह अपने जूनियर विद्यार्थी को पैसा देने नहीं देते हैं। क्योंकि वह मानते हैं कि नहीं हमारे होते हुए यह पैसा नहीं देंगे हम बड़े हैं तो हम पैसा देंगे और जूनियर विद्यार्थी पैसा दें और हम सीनियर होकर के जूनियर विद्यार्थी से पैसा खर्च कारायें तो यह व्यावहारिक रूप से ठीक नहीं है ऐसा हमें नहीं करना चाहिए। यह सामान्य व्यवहार है।
व्यावहारिक रूप में भी यह ठीक लगता है अगर हम अपने बड़े भाई के साथ कहीं किसी जगह पर जाते हैं वहां जो भी खर्च आता है तो बड़े भाई खर्च करते हैं और बड़े भाई अपने छोटे भाई को खर्च करने से मना करते हैं, वह बोलते हैं कि मैं अभी हूं और हम मान भी जाते हैं क्योंकि हमें लगता है कि नहीं यह ठीक है मतलब बड़े भाई के होते हुए छोटा भाई अपना पैसा खर्च नहीं करते हैं और यदा-कदा कभी परिवार में किसी कारणवश बड़े भाई के पास पैसा नहीं होता है तो घर की जितनी छोटे लोग हैं सब अपना-अपना खजाना खोल देते हैं ताकि बड़े भाई समाज में दबे नहीं पूरी हिम्मत के साथ परिवार के साथ खड़े रहें। महाराणा प्रताप के संघर्ष के दौरान जब मेवाड़ के संसाधन बहुत कम हो गए, तब भामाशाह ने बड़ी मात्रा में धन उपलब्ध कराया, जिससे प्रताप अपना सैन्य संघर्ष जारी रख सके।
अगर पति-पत्नी के बीच भी कभी पैसे खर्च करने की बात आती है तो भारतीय समाज में पुरुष वर्ग दिल खोलकर खर्च करते हैं यह उन्हें उम्मीद नहीं होती है की पत्नी अपनी ओर से पैसा खर्च करेगी या पत्नी पैसा खर्च करें तो पति को स्वाभाविक रूप से ठीक नहीं लगता है पति चाहता है की पत्नी अपनी पैसा अपने पास रखें खर्च की समस्या तो मैं खुद देख लूंगा। पत्नी को खर्च करने कि कोई जरुरत नहीं है। पत्नी का पैसा तब काम आता है जब पति पूरी तरह से टूट गया हो और कहीं कोई रास्ता न दिखता हो तो पत्नी अपना गुल्लक लेकर आती है और कहती है कि मेरे पास अभी कुछ पैसा है तो पति उस पैसे को बड़े भाव से स्वीकार करते है और अपनी पत्नी को धन्यवाद करते है। फिर पति पुनः खड़ा होकर के पत्नी को उससे अधिक देकर के पत्नी को खुश करता है।
यह भारतीय समाज में सामान्य व्यवहार की चीज हैं हर व्यक्ति अपने धर्म को पूरा करता है बड़ा व्यक्ति यह समझता है कि मेरी बड़ी जिम्मेवारी है और मेरा धर्म है कि उनकी जरूरत को हम पूरा करें ऐसा न हो जीवन में हमें उनकी सहायता लेनी पड़े जहां हमें उनकी सहायता नहीं लेनी चाहिए। हां जीवन के हर कदम पर हम उनके साथ रहे, हम उनकी जरूरत को पूरा करें, यही हमारा धर्म है, छोटे भाई क्या समझते हैं कि बड़े भाई के प्रति या जो हमसे बड़े हैं उनके प्रति हमारा धर्म है कि हम उनकी सेवा करें और उनके धर्म पालन में कोई समस्या न आए हम उनके साथ हों, जीवन के हर मोड़ पर ताकि वह हमारे प्रति जिम्मेदारी पूरा कर सकें और वह अपनी जिम्मेदारी पूरा कर सकें इसके लिए हम उनका सहयोग करें उनके आदेशों का पालन करें और उनकी सेवा करें इसी में हमारा धर्म है।
यही कारण रहा कि क्षत्रिय समाज के 12- 12 वर्ष के नौजवान देश की अस्मिता को बचाने के लिए शहिद होते रहें। ब्राह्मण समाज के छोटे-छोटे बच्चे शास्त्रों को रट कर याद करके शास्त्रों की रक्षा करते रहे। उपनयन की रक्षा करते-करते शहीद हो गए। लेकिन कभी भी अपने धर्म के साथ समझौता नहीं किया।
मतलब स्पष्ट है कि सभी अपने धर्म की रक्षा करते रहें। परिणाम यह रहा कि ईसाईयत और इस्लाम पूरी दुनिया में फैला लेकिन भारत में आकर ब्राह्मण और क्षत्रियों के सामने झुक गया और ब्राह्मण और क्षत्रियों ने भारत के शास्त्रों को और यहां की परंपराओं को जीवित रखा ।
अब आईए मूल विषय पर बात करते हैं। मतलब स्पष्ट है जो समाज, जो व्यक्ति, जो वर्ग मेरे घर पर, मेरे खेत में, मेरे परिवार में काम करते है, जिसके घर का चूल्हा मेरे कारण जलता है, जिसके घर का भोजन मेरे कारण बनता है, जो मेरे आश्रय पर टिका हुआ है, और मेरे यहां से जिनके घर रशद आदि जाता हो, सब कुछ मेरे यहां का दिया हुआ हो, जीवन यापन करने के लिए। मैं अब उसके घर पर जाकर भोजन करूं? तो यह मेरा धर्म नहीं है मेरा दायित्व उनकी जरूरत को पूरा करना है न कि उनकी वस्तुओं में अपना हक ढूंढना है। अगर मैं ऐसा करता हूं तो यह भ्रष्टाचार है और यह बिल्कुल उचित नहीं है। हम उनकी बहुत सारी जरूरत को पूरा करते हैं। बहुत सारी हमारी जरूरतों को वें पूरा करते हैं। मेरे यहां पुत्री का विवाह हो और मड़वा ( विवाह मण्डप ) बनाना हो तो स्वभावतः मडवा बनाने वाला व्यक्ति आकर पूछते है की बाबा मड़वा कहां बनेगा, कितना बड़ा बनेगा और स्वतः जंगल से सब सामान लेकर आते हैं खर, बांस रस्सी सब कुछ और बनाकर चले जाते हैं। उस मड़वा संबंधी जो भी करना है वह स्वतः करके चले जाते हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि यह हमारी जिम्मेदारी है। हमें करना है ठीक उसी प्रकार उनके प्रति हमें जो करना है। हम करते हैं हमारे प्रति उन्हें जो करना है। वें करते हैं। इसी को समाज का ताना-बना कहते है।
भारतीय समाज में जो वर्ग, जिस वर्ग पर अधिक निर्भर है वह स्वतः जब कभी भी उनके परिवार में जाते हैं तो स्वभावतः सेवा संबंधी कार्य करना शुरू कर देते हैं। और ऐसा करके वह स्वयं को सम्मानित महसूस करते हैं। जैसे :- उदाहरण के लिए अगर मां बीमार हो और घर में कोई बहू न हो तो बेटी मां की सेवा करके स्वयं को आनंदित महसूस करती है मां कभी बेटी के लिए बोझ नहीं बनती। ठीक वैसे माँ अपनी बेटी की सेवा बहुत प्रसन्नता से करती है जब वह नानी बनाने वाली हो। इसी प्रकार समाज का कोई प्रतिष्ठित परिवार हो जिस पर आपका संपूर्ण परिवार निर्भर करता है तो आप उनके घर जाकर सेवा करके अपने आप को आनंदित ही महसूस करते हैं। भारतीय समाज में यह सामान्य व्यवहार था। आज भी विद्यार्थी गुरुकुल में अपने अस्वस्थ गुरु की सेवा करके दुःखी नहीं होते।
बाहरी संस्कृति से आए हुए लोगों को यह रास नहीं आया। जिस संस्कृति के लोग एक दूसरे से इस प्रकार भावनात्मक रूप से जुड़े हो तो उन्हें गुलाम बनाना बहुत कठिन है हमें कुछ ऐसा करना पड़ेगा ताकि उनके आपस में यह प्रेम संबंध समाप्त हो जाए तभी हम इन्हें गुलाम बना सकते हैं। इस विषय पर मैं अलग से लेख लिखा हूँ आवश्य पढ़ें https://vaidicsuprabhat.blogspot.com/2025/11/blog-post_21.html
भारतीय समाज में कुछ वर्ग ऐसे भी रहे जिनसे समाज का प्रत्येक वर्ग दूरी बनाकर रखना ही उचित समझा।
भारतीय समाज में कुछ वर्ग ऐसे भी थे जिनके सामान्य जीवन प्रक्रिया में, दिनचर्या में मांस भक्षण और मद्यपान सामान्य रहा। लगभग 150-200 वर्ष पूर्व (19वीं शताब्दी) भारत की प्रमुख शिकारी व खाद्य-संग्राहक जनजातियों में जड़वा (Jarawa) एवं शोंपेन (अंडमान-निकोबार), बिरहोर, मुसहर (झारखंड/बिहार), चेन्चू (आंध्र प्रदेश/तेलंगाना), तथा कादर व मुथुवान (केरल/तमिलनाडु) शामिल थीं। ये जनजातियां मुख्य रूप से हिरण, जंगली सूअर, चुहा, पक्षी, छिपकली, कछुए और मछली जैसे विभिन्न जीव-जंतुओं का शिकार कर अपने भोजन के लिए उन पर निर्भर रहती थीं। कई प्रमुख जनजातियों (जैसे भील, गोंड, संथाल, ओरांव, नागा, और सहरिया) की पारंपरिक जीवनशैली और सामाजिक-सांस्कृतिक अनुष्ठानों में मांसाहार एवं पारंपरिक मद्यपान (जैसे हंडिया, महुआ, या ताड़ी) का प्रचलन रहा है।
कुछ वर्ग ऐसे भी हैं। जिनके लिए मद्यपान करना या मांस भक्षण करना बहुत बड़ा जघन्य अपराध था। तो इनके बीच आपस में दूरी होना तो स्वाभाविक है। आज भी आपको बहुत लोग ऐसे मिल जाएंगे जिनको पता चल जाए की सामने वाला चूहा को भुनकर यह छिपकली को भुनकर खता है तो उसको अपने घर में बैठने न दे उसको अपने घर की थाली में या ग्लास में पानी पीने न दे। भले ही वह मांस मछली खाता हो परन्तु फिर भी उसको अपने घर में जगह नहीं देंगे क्योंकी चूहा और छिपकली खाना उसके लिए सहज नहीं है।
भारतीय सभ्यता संस्कृति में महत्व आपके पद और पैसे का नहीं है यहां पर महत्व आपके आचरण और चरित्र का है। चरित्र और आचरण में आप उत्तम है तो आपको सहज रूप से कोई भी स्वीकार कर सकता है। लेकिन इन दो चीजों में आप ठीक नहीं है। आपका पद चाहे जितना भी बड़ा हो या जितने भी बड़े पैसे वाले हों, उसके लिए कोई महत्व का नहीं है। दिसंबर १९८८, राजीव गांधी अपनी पत्नी सोनिया गांधी के साथ काठमांडू पशुपतिनाथ के दर्शनार्थ पहुंचे। सोनिया गांधी को प्रवेश नहीं मिला। जबकि भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की वह पत्नी थी और अपने पति के साथ पहुंची थी। और इंदिरा गांधी को 1984 में जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया था। मंदिर के सेवायतों ने उनके फिरोज गांधी से विवाह को आधार बनाया था। गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक है तो यहां न पैसे काम आया और न पद। उसी तरह बाबा साहब अंबेडकर जब किराए के लिए बड़ौदा में मकान ढुंढ रहे थे, उनको मकान नहीं मिला। क्योंकि वें महार जाती के थे और वें शुद्ध मांसाहारी होते है, सप्ताह में इनको दो-तीन बार मांस चाहीए ही चाहीए। और ऐसा भी नहीं है कि सभी ब्राह्मण और क्षत्रिय शुद्ध शाकाहारी हो बहुत सारे ऐसे ब्राह्मण भी थे जो मांसाहारी थे और बहुत सारे क्षत्रिय थे जो मांसाहारी के साथ-साथ मद्यपान भी किया करते थे
दूसरी ओर ऐसा भी नहीं है की भारतीय जन मानस मांस खाने वाले लोगों को अपना पथ प्रदर्शक न बनाया हो परन्तु कब जब उनके अंदर बदलाव हुआ और उनका आचरण शुद्ध पवित्र हुआ इसके शुद्ध उदाहरण है स्वामी श्रद्धानंद स्वामी श्रद्धानंद पेशे से वकील थे और मांस खाना उनके दैनिक जीवन में शामिल था लेकिन उसको त्याग करने के बाद भारतीय जनमानस ने उनको आगे किया और अपना स्वामी के रूप में स्वीकार किया।
अभी थोड़ा और समझने की कोशिश करते हैं। अभी वर्तमान में हमारे घर में नल, कल, मोटर लगा हुआ है। हमारे पास पानी की टंकी है। गवर्नमेंट की सप्लाई किया हुआ पानी है लेकिन पुराने समय में कुआं होता था। तब हम हर तरह से पूर्णतः कुएं की पानी पर ही निर्भर थे। खेत में सिंचाई करना हो या पशु को नहलाना हो इसके लिए कुआं या तालब पर हम निर्भर थे लेकिन दैनिक जीवन में हम अधिकतर कुएं के पानी पर ही निर्भर थे।मंदिर की सफाई करनी हो, स्नान करना हो, कपड़े की सफाई करनी हों, मंदिर का प्रसाद बनाना हो, भोजन बनाना हो, या किसी भी प्रकार के दैनिक जीवन में कोई भी जल संबंधी कार्य हो तो हम कुआं पर ही निर्भर थे। अभी थोड़ा आगे बढ़ते हैं अब आप सामान्य रूप से विचार करें जिनके दैनिक जीवन में मांसाहार एवं मद्यपान स्वाभाविक है। आप सोच कर देखें कुरैशी ( कसाई ) समाज का कोई व्यक्ति बकरी को काटकर उसका मांस उसी कुआं के पास बैठकर साफ कर रहा हो और आप उसी कुआं से जाकर पानी ले रहे है मंदिर की सफाई के लिए यह दोनों कैसे संभव है। स्वभावतः आपको अलग-अलग कुआं रखना ही पड़ेगा। जिसमें वह व्यक्ति अपना काम कर सकें और आप सहज रूप से पानी लेकर मंदिर की सफाई कर सकें, पीने के लिए पानी लें सकें।
मतलब स्पष्ट है तत्कालीन समाज में अगर कहीं किसी रूप में भेद-भाव या छुआ-छूत था तो उसके पीछे कुछ मूल करण थे बिन वजह नहीं था।
जिसके कुछ अलग दृष्टिकोण थे परन्तु उसको तोड़ मरोड़ कर किसी और रूप में प्रस्तुत किया गया जैसे उदाहरण से मैं बताऊं बंगाल में घटी एक घटना को सतीप्रथा के रूप में भारतीय समाज की एक कुप्रथा के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया। जबकि भारतीय समाज में सती प्रथा जन सामान्य के रूप में बिलकुल नहीं था। जबकि महिलाओं के साथ यूरोप में होने वाली मार्च हंटिंग जैसी कुप्रथा वर्षों तक चलती रही, खतना जैसी पिडा दायक प्रथा अभी भी कई जगह प्रचलित है। उन्हें कभी किसी को नहीं बताया गया। एक कोई घटना, राजस्थान या बंगाल सती होने की हुई तो उसको भारतीय समाज में प्रथा के रूप में प्रकट किया गया। जबकि भारतीय समाज में यह प्रथा है ही नहीं ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता और धीरे-धीरे उसको बढ़ावा दिया गया किसी न किसी को आरक्षण देकर या किसी को किसी के प्रति बहुत ही ज्यादा भेदभाव उत्पन्न करके नहीं तो आप सोच कर विचार करें। इसी प्रकार एक भ्रामक प्रसार ब्राह्मणों के विषय में किया गया की प्राचीन समय में ब्राह्मण गोमांस खाते थे, मतलब ब्राह्मणों को अंग्रेजी चश्मा पहन कर देखा गया, मिथिला के ब्राह्मण मछली खाते है इससे यह सिद्ध तो नहीं होता पूरा ब्राह्मण समुदाय मछली खाता हो चाहे वह कही का भी हो।
अब आप ध्यान दें घर में दादाजी की कुर्सी पर, दादाजी की थाली में या दादाजी की प्रयोग में आने वाली वस्तुओं को कभी भी हम अपने लिए प्रयोग नहीं करते है उसे केवल दादाजी ही प्रयोग में लाते हैं। ठीक इसी प्रकार विद्यालय में हम अपने अध्यापक की कुर्सी पर कभी भी नहीं बैठते हैं या गुरुकुल में आचार्य जी की आसन पर हम कभी भी नहीं बैठते हैं यह क्या छुआ-छूत है बिल्कुल नहीं यह एक मर्यादा है। हम यह मानते हैं कि उनके द्वारा प्रयोग की जाने वाली वस्तु भी उन्हीं के जैसा है और वह हमसे औदे में बड़ा है। इसलिए हम उस वस्तु का भी उतना ही सम्मान करते हैं। जितना की हम उनका। जो हमारे गुरुजनों या बड़ों के काम में आता है और हम उसको दादाजी की तरह ही देखते हैं, मानते हैं। उनकी वस्तुओं को सजा संवार कर हम रखते हैं तो यह न छुआ-छूत है न भेदभाव यह केवल मर्यादा है उनके प्रति आदर का भाव है।
झाड़ियां में, तालाब के किनारे, नगर के किनारे, बस्ती के बाहर, जंगलों में अबोध बालक अगर किसी को मिल जाए तो कभी भी किसी ने उसके गोत्र के विषय में जानने का प्रयास नहीं किया। छुआ-छूत का भाव वहां बिल्कुल दिखाई नहीं दिया। किस जाति का बालक है कोई जानने का प्रयास नहीं किया । सीधे लोगों ने उसको अपना कर अपना बेटा मान लिया, अपने घर का अंग मान लिया, अपने खून का अंग मान लिया और बेटे की तरह प्यार देखकर उसको पाला यह, इसी भारतीय समाज में होता है।
भारतीय समाज में दिनचर्या के कारण, धार्मिक मान्यताओं के कारण, भोजन में अंतर के कारण, व्यापार में अंतर के कारण, सांस्कृतिक अंतर के कारण, समाज के प्रत्येक वर्ग का प्रत्येक वर्ग के बीच एक मजबूत दीवार रहा। जो उनके उन दोनों के अंतर को बताता रहा, उन दोनों की कार्य करने के तरीके को बताता रहा है और वे लोग हमेशा इस दीवार को बनाकर रखें और वह दीवार छुआ-छूत का नहीं था। वह दीवार मर्यादा का था। वह दीवार आदर का था, सम्मान का था, वह दीवार एक तरह से एक दूसरे को बचाने के लिए बनाया गया था ताकि कभी भी कोई व्यक्ति एक दूसरे के रोजगार को, उनके पैत्रिक व्यापार या एक दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण न कर सके या एक दूसरे के साथ कोई भी भ्रष्टाचार न कर सके इसलिए यह सब बनाया गया था आज आपको पेटेंट, प्रोसेस पेटेंट, प्रोडक्ट पेटेंट, कॉपीराइट आदि कानूनों के रूप में दिख जायेगा। एक उदहारण देते चलू पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम बताते हैं कि 1799 में श्रीरंगपट्टनम के युद्ध में टीपू सुल्तान की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उनके रॉकेट और रॉकेट-तकनीक अपने कब्जे में ले ली। उपलब्ध विवरण के अनुसार सैकड़ों रॉकेट तथा रॉकेट बनाने/चलाने से संबंधित सामग्री अंग्रेजों के हाथ लगी और उसे इंग्लैंड ले जाया गया। पूर्व राष्ट्रपति कलाम जी इसे आज की भाषा में “reverse engineering” जैसा बताते हैं। इसके बाद उनका महत्वपूर्ण आशय यह है कि उस समय न रॉकेट-तकनीक से संबंधित कोई अंतरराष्ट्रीय समझौता था, न IPR (Intellectual Property Rights) व्यवस्था और न ऐसा पेटेंट कानून, जो उस भारतीय तकनीकी ज्ञान पर भारत का अधिकार सुरक्षित करता। इसलिए अंग्रेज उस तकनीक को अपने साथ ले जाकर उसका अध्ययन और विकास कर सके। आज का वर्तमान समय कागचों पर आधारित है पर उस समय मर्यादा रूपी दीवार ही थे जो हर तरह से सुरक्षा प्रदान करते थे कभी भी कोई किसी दुसरे के रोजगार को नहीं अपनाता था। लेकिन ब्रिटिश या बाहर से आने वाले लोगों ने इसको समझ कर विभिन्न तरह से अलग-अलग तरीके से प्रस्तुत किया और प्रस्तुत करके भेदभाव उत्पन्न करके समाज में फूट डालो राज करो कि राजनीति अपनाई।
नहीं तो आप गंभीरता से विचार करें पंडित जी के द्वारा जो भी धार्मिक कर्मकांड पूजा पाठ कराई जाती है या उसमें प्रयुक्त होने वाले जितनी भी वस्तुएं हैं। उनका निर्माण कोई भी ब्राह्मण समुदाय नहीं करता उन सभी वस्तुओं का निर्माण शुद्र समाज के लोग या अन्य समाज के लोग करते हैं। लेकिन उन वस्तुओं का प्रयोग संस्कारों में बहुधा किया जाता है। अगर छुआ-छूत का भेद होता तो उनके हाथों के द्वारा बनाई गई वस्तु पूजापाठ में क्यों लगाई जाती है। कोई भी मंदिर ऐसा बता दे जिसमें जो भगवान की मूर्ति स्थापित की गई है उस मूर्ति को तरासने का काम किसी ब्राह्मण ने किया हो या कोई भी कुआं बता दें जिसको ब्राह्मणों ने खोदा हो। मां अपने माथे पर जो सिंदूर लगाती है वह सिंदूर कोई ब्राह्मण बनता है। विवाह में प्रयुक्त होने वाला बांस का बना हुआ सूपा , डाला, सुपली मेहुर यह सब कुछ शुद्र समाज के लोग बना कर तैयार करते हैं। और बड़े सम्मान के साथ उन वस्तुओं के साथ विवाह संपन्न होता है अगर छुआ-छूत का भेद होता तो आप यह बताएं यह समाज कैसे आगे बढ़ता और इन वस्तुओं का प्रयोग विवाह में क्यों होता है। बड़े-बड़े घरों में पानी भरने के लिए पनिहारण होती थी। वह पनिहारण कभी भी ब्राह्मण नहीं होती है पनिहारण एक जाती है जिनका काम में कुआं, तालाब से पानी लेकर आना और घर के एक किसी कोने में बने गड्ढे में डाल देना। जो पानी का प्रयोग घर के हर काम में होता था।
आश्चर्य की बात तो यह है कि यह सब सवाल वे लोग उठाते हैं जिनके यहां रंग भेद के कारण लोगों को मार दिया करते थे । बस एक उदहारण नाजी नस्लवादी विचारधारा के अंतर्गत लगभग 60 लाख यहूदियों की हत्या की गई; गले में चेन लगाकर गुलाम को बेचा करते थे वे लोग इस प्रकार के सवाल भारतीय समाज से करते हैं।
मुस्लिम आक्रान्ताओं से बचाले के लिए भारतीयों ने गाँव से बहार अर्थात प्रवेश द्वार पर उन समुदायों को बसाया जो सूअर पालते है ताकि उनका प्रवेश गाँव में न हो सके, सिखों ने अपनी पगड़ी में सूअर का दांत लगाना चालू कर दिया ताकि वें उनके पगड़ी को न छू सकें। भारतीयों में विवाह के समय कन्या को मंगल सूत्र पहनाने से पहले तागपात कन्या के गले में पहनाने की परंपरा है जिसमें सूअर का दांत लगा रहता है ( हालांकि की आजकल अब नाम भर का है पलास्टिक का दांत रहता है ) ताकि उस महिला का शीलभंग मुस्लिम न कर सके।
शिया और सुन्नी दोनों नमाज़ पढ़ते हैं और मूल इस्लामी मान्यताओं में बहुत कुछ साझा है, लेकिन नमाज़ की कुछ विधियों, अज़ान के कुछ प्रयोगों, धार्मिक नेतृत्व और अन्य धार्मिक व्यवहारों में अंतर है। इसलिए जहाँ दोनों समुदाय पर्याप्त संख्या में हैं, वहाँ अक्सर शिया मस्जिद और सुन्नी मस्जिद अलग मिलती हैं। शिया समुदाय में मस्जिद के अतिरिक्त इमामबाड़ा/हुसैनिया भी महत्वपूर्ण धार्मिक-सामुदायिक स्थल होता है, विशेषकर मुहर्रम और मजलिस के लिए। इमामबाड़े को हर स्थिति में मस्जिद का पर्याय नहीं समझना चाहिए। भारत सहित कई क्षेत्रों में शिया और सुन्नी समुदायों के अलग कब्रिस्तान भी पाए जाते हैं। इसका कारण मुख्यतः स्थानीय धार्मिक-सामुदायिक प्रबंधन, वक्फ और दफ़न की परंपराएँ हैं। लेकिन ऐसा इस्लाम में हर जगह अनिवार्य नहीं है कि शिया को सुन्नी कब्रिस्तान में या सुन्नी को शिया कब्रिस्तान में दफनाया ही नहीं जा सकता। इन शिया और सुन्नी के बीच हमेशा संघर्ष होता रहता है। पाठक खुद विचार करें छुआछूत, भेदभाव किस समाज में कितना है ?
अब सबसे बड़ी और अहम बात 1857 की क्रांति में रोटी को क्रांति की सूचना का प्रसारण का माध्यम बनाया गया अर्थात् रोटी देकर के आप क्रांति की सूचना, दिनांक, समय बताते हैं अगले समुदाय को, अगर छुआ-छूत या भेदभाव भारतीय समाज में प्रारंभ से ही रहा है तो वह समाज कैसे विचार कर सकती है की रोटी को हम सूचना प्रसारण का माध्यम बनाएंगे। भारतीय समाज में कमल के साथ-साथ रोटी का चयन क्रांति की सूचना के लिए क्यों किया गया ?
मतलब स्पष्ट है फुट डालो राज करो, जो समुदाय अंग्रेजों के चाटुकार रहें या सरकारी महकमें में अपने आप को सितारा समझते रहें उनको भारतीय जन सामान्य से अधिक विद्द्वेश रहा , इर्ष्या रहा , आज में थोड़ी बहुत अंगेजी आ जाए या थोड़ी सी अमीरी आ जाए, थोड़ी सी पश्चमी हवा लग जाए तो रितेदारों में आपको देखने को मिल जायेगा, ऐसे लोग हर युग में रहें है लेकिन हम उन एकाद लोगों को ध्यान में रख कर पुरे भारतीय समाज का आकलन नहीं कर सकते हमें व्यापक दृष्टिकोण से यह समझाना होगा की ब्राह्मण हो या शुद्र सबको एक ही घाट पर अंतिम संस्कार होता है और सब के लिए शास्त्रों में एक ही मन्त्र है, और हम शुद्र ( चंडाल ) से ही अग्नि लेकर ब्राह्मण हो या शुद्र सब का अंतिम संस्कार करते है। शैव/वैष्णव/जैन/बैद्ध के बीच धार्मिक वैचारिक मतभेद शुरू से ही रहा है पर खुनी संघर्ष रहा हो ऐसा नहीं है और यह भी सही है की शैव/वैष्णव/जैन/बैद्ध/बोन एक साथ कैलाश पर्वत की परक्रमा करते है। यह विषय छुआछूत, भेदभाव से अलग है। हमें भारतीय समाज को अंग्रेजी चश्मा निकाल कर देखना होगा।
वैदिक सुप्रभात
उत्तम प्रकाश
९४१६०४४८२८
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