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महिला -2

               शास्त्रों के अनुसार 4 अरब 32 करोड़ वर्ष सृष्टि कि आयु है जिसमें 2 अरब 16 करोड़ वर्ष तक यह सृष्टि अपने केन्द्र से निरंतर दूर जाऐगी पुनः अगले 2 अरब 16 करोड़ वर्ष तक अपने केन्द्र की ओर निकट आएगी । यही सृष्टि काल चक्र है । अर्थात् सृष्टि में कालचक्र की गति लंबवत है वृताकार नहीं । मतलब आप समय यात्रा भौतिक शरीर के साथ नहीं कर सकते। हां अगर वृताकार गति होती तो शायद आप कर भी लेते । लेकिन वृताकार गति में सृष्टि संरचना अकल्पनीय है । प्रथम 2 अरब 16 करोड़ में 1 अरब 97 करोड़ वर्ष से कुछ अधिक बीत चुके हैं । अर्थात् लगभग 19 करोड़ वर्ष तक सृष्टि अपने केन्द्र से और दूर जाने वाली है ।  अब यहां एक बात समझना जरूरी है ।                      आप अपने मूल स्थान से जितना ही दूर जाएंगे उतना ही दुर्बल होते चले जाएंगे। आपकी शक्ति आपके मूल में ही निहित है। अर्थात् अगले 19 करोड़ वर्ष तक हम और पतन की ओर जाने वाले है । हमारा बौद्धिक स्तर धीरे-धीरे निरंतर कम होने वाला है । यही प्रकृति है । प...

सुत्रधार भारत के भविष्य का।

 भारत के भविष्य का  सूत्रधार कई बार हम यह भूल जाते हैं , पद के साथ-साथ जिम्मेदारियां बढ़ जाती है । जो राज सिंहासन पर  नहीं बैठे हों उन्हें राज सिंहासन पर बैठने की बड़ी लालसा रहती है । पर राज्य एवं राज सिंहासन  सुरक्षित बचा के रखना कितना कठिन और दुष्कर कार्य है यह उनकी कल्पना से भी परे की बात  है जो लोभ को आधार बनाकर शासक बनना चाहते हैं । मीर जाफर उन गद्दारों में प्रमुख था जो  सिराजुद्दैला से गद्दारी करके बंगाल का शासक बनना चाहता था। कहते हैं कि इस गद्दारी के बाद भारत की दासता की कहानी आरंभ होती है और ईस्ट इंडिया कंपनी  बंगाल का शासक बन जाता है । धीरे-धीरे सभी गद्दार मार दिए जाते है जो शासक बनना चाहते थे । क्योंकि उन्हें पता था जो अपनी  मिट्टी से गद्दारी कर सकता है वह हमारा कभी नहीं हो सकता ।   मतलब स्पष्ट है लोभी का कोई साथी नहीं होता । विस्तारवादी नीति आरंभ हुई धीरे-धीरे ईस्ट इंडिया कंपनी देश के अन्य राजवाडों को अपने अंतर्गत लेती  चली गई । आधार छल-कपट,षड्यंत्र एवं संधि को बनाया गया ।‌ "अतिथि देवो भव:" वाला यह देश  फिरंगियों को ...

महिला

               बहिर्मुखी-अंतर्मुखी मनुष्य दो प्रकार के होते है । मन के पांच दोष है काम, क्रोध, लोभ, मोह और इर्ष्या। ये पांचों दोष बहिर्मुखी प्रवृत्ति वाले मनुष्यों में अधिक एवं अंतर्मुखी वालों में कम पाए जाते । बहिर्मुखी प्रवृत्ति वाले लोगों का स्वभाव भौतिकवादी, श्रृंगारप्रिय , वस्तुओं में मोह , अत्यधिक संसाधनों को इक्कठा करना एवं दुसरों में दोष देखने की प्रवृत्ति अधिक होती है। ये लोग जीवन में कभी भी सुखी नहीं होते चाहे कितना भी संसाधन इनके पास क्यों न हो । ये लोग खुद दुखी रहते हैं और दुसरों को भी दु:खी करते रहते है। ऐसे लोग सदा सामने वाले को अपने अधीन रखना चाहते है । आलस्य, प्रमाद, बहाने ऐसे लोगों में आपको खूब मिलेंगे ।                 अंतर्मुखी प्रवृत्ति वाले लोगों में मन के पांचों दोष कम पाए जाते है । ये लोग आध्यात्मिक, कम श्रृंगारप्रिय, वस्तुओं में कोई मोह नहीं, कम से कम संसाधनों में जीवन व्यतीत करना और दुसरो में नहीं पर स्वयं में दोष देखना एवं गलती स्वीकार करने की प्रवृत्ति होती है। ऐसे ल...

नवरात्र (भाग -2)

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                                 वाइट ब्लड कॉर्पल्स, रेड ब्लड कार्पल्स और डिऑक्सिजिनेटेड ब्लड । मां दुर्गा के तीन रूप है । शक्ति के तीन रूप, मां सरस्वती, मां लक्ष्मी और मां काली। व्हाइट ब्लड कॉर्पल्स अर्थात् बी सेल्स, टी सेल्स शरीर को सुरक्षा प्रदान करते हैं। रेड ब्लड कॉर्पल्स स्थानांतरण का काम करते है इनको पोषक तत्व,ऑक्सीजन चाहिए। डिऑक्सिजिनेटेड ब्लड को और ज्यादा रक्त चाहिए, ऑक्सीजन चाहिए क्योंकि वह दुषित हो रही है लगातार । इसलिए मां दुर्गा को अड़हुल का फूल पसंद है । इसके कलि को खाने से शरीर में रक्त तेजी से बनता है । वहां नव घड़े के नीचे जौ के अंकुरित फलि को खाना है । ताकी शरीर को पोषण मिले । जो रोगाणु अर्थात् एन्टिजन अपनी संख्या बहुत ही से बढ़ा रहे है। मां काली उस एन्टिजन को बहुत तेज़ निगल सके । और आपसे मां काली को ऑक्सिजिनेटेड रक्त मिलता रहे। जिसमें एंटीबॉडी खूब मात्रा में हो। अर्थात् आपको उपवास करते हुए उचित मात्रा में कफ नाशक या पित्त नाशक भोज्यपदार्थ ही लेना है मौसम अनुसार। ताकि आपका यह...

नवरात्र

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                    नवरात्र अर्थात् प्रतिपदा से लेकर अगले नवरात्रि तक चांद के प्रकाश में बैठना है । और जिस भी पूजा पद्धति को मानते हो उसका पालन करते हुए अपने इष्ट देव को याद करना, मन्त्रों का जाप करना , ध्यान लगाना, मतलब जो आपको उचित लगे।                       चांद के प्रकाश में ही क्यों ? क्योंकि चांद का प्रकाश ही फलों, सब्जियां ,औषधियों और फूलों में मिठास लाता है, रस भरता है, सुगंध भरता है , इसलिए चंद्रमा को हम मामा कहते हैं । और फिर हमारे शरीर में जल की अधिकता होने से हम चंद्रमा को अधिक प्रिय है । चंद्रमा अपना प्रभाव हम पर छोड़े बिन नहीं रह सकता ।                        अब वर्ष में दो बार क्यों ? वासंतिय एवं शारदीय नवरात्र । मोटे तौर पर अगर हम वर्ष को विभाजित करें तो ठंडी और गर्मी दो मौसम बनते हैं । जिसे हम शरद , गरम भी कहते हैं । चैत्र शुक्ल और आश्विन शुक्ल के प्रथम नवरात्र में ही नवरात्रि क्यों...