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नवरात्र (भाग -2)

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                                 वाइट ब्लड कॉर्पल्स, रेड ब्लड कार्पल्स और डिऑक्सिजिनेटेड ब्लड । मां दुर्गा के तीन रूप है । शक्ति के तीन रूप, मां सरस्वती, मां लक्ष्मी और मां काली। व्हाइट ब्लड कॉर्पल्स अर्थात् बी सेल्स, टी सेल्स शरीर को सुरक्षा प्रदान करते हैं। रेड ब्लड कॉर्पल्स स्थानांतरण का काम करते है इनको पोषक तत्व,ऑक्सीजन चाहिए। डिऑक्सिजिनेटेड ब्लड को और ज्यादा रक्त चाहिए, ऑक्सीजन चाहिए क्योंकि वह दुषित हो रही है लगातार । इसलिए मां दुर्गा को अड़हुल का फूल पसंद है । इसके कलि को खाने से शरीर में रक्त तेजी से बनता है । वहां नव घड़े के नीचे जौ के अंकुरित फलि को खाना है । ताकी शरीर को पोषण मिले । जो रोगाणु अर्थात् एन्टिजन अपनी संख्या बहुत ही से बढ़ा रहे है। मां काली उस एन्टिजन को बहुत तेज़ निगल सके । और आपसे मां काली को ऑक्सिजिनेटेड रक्त मिलता रहे। जिसमें एंटीबॉडी खूब मात्रा में हो। अर्थात् आपको उपवास करते हुए उचित मात्रा में कफ नाशक या पित्त नाशक भोज्यपदार्थ ही लेना है मौसम अनुसार। ताकि आपका यह...

नवरात्र

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                    नवरात्र अर्थात् प्रतिपदा से लेकर अगले नवरात्रि तक चांद के प्रकाश में बैठना है । और जिस भी पूजा पद्धति को मानते हो उसका पालन करते हुए अपने इष्ट देव को याद करना, मन्त्रों का जाप करना , ध्यान लगाना, मतलब जो आपको उचित लगे।                       चांद के प्रकाश में ही क्यों ? क्योंकि चांद का प्रकाश ही फलों, सब्जियां ,औषधियों और फूलों में मिठास लाता है, रस भरता है, सुगंध भरता है , इसलिए चंद्रमा को हम मामा कहते हैं । और फिर हमारे शरीर में जल की अधिकता होने से हम चंद्रमा को अधिक प्रिय है । चंद्रमा अपना प्रभाव हम पर छोड़े बिन नहीं रह सकता ।                        अब वर्ष में दो बार क्यों ? वासंतिय एवं शारदीय नवरात्र । मोटे तौर पर अगर हम वर्ष को विभाजित करें तो ठंडी और गर्मी दो मौसम बनते हैं । जिसे हम शरद , गरम भी कहते हैं । चैत्र शुक्ल और आश्विन शुक्ल के प्रथम नवरात्र में ही नवरात्रि क्यों...

आओ हम सब गुलाम बने

 :-ओ३म्:- "आओ हम सब गुलाम बने" इस लेख का यह टाइटल मैं बहुत सोच समझ कर रखा हूं । "आओ हम सब गुलाम बने" अर्थात कोई ऐसा मार्ग है जो हमें सहज रुप से गुलामी की ओर ले जा रहा है । पर इस बात की अनुभूति समाज के किसी भी वर्ग को शायद ही हो । कोई ऐसा पथ है जिसके हम सभी पथिक है पर उसके अलावा दूसरा कोई मार्ग भी हमारे पास नहीं है । तो आइए एक बार हम समझने की कोशिश करें ।                    प्राचीन समय में वस्तुओं का विनिमय एक दूसरे के साथ व्यापार के लिए वस्तुओं से ही होता था । उस समय सोने के सिक्के का प्रयोग अशर्फी के रूप में वस्तु विनिमय हेतु होता था । समय के साथ कुछ परिवर्तन हुआ दुनिया के विभिन्न अलग-अलग राष्ट्र अपने कोष में सोना रखकर मुद्राओं को छापना प्रारंभ किया । उन कागज की मुद्राओं पर लिखा गया कि  "मैं धारक को इतना रुपया अदा करने का वचन देता हूं"। मतलब यह है कि जो राष्ट्र जितना मुद्रा छापती है । उतने ही मुद्रे के मूल्य का सोना उसके कोष में रखा हुआ होता है ।                 ब्रिटेन दुनिया के विभिन्न...

लोकतंत्र में राजतंत्र भाग-20 ("फूट डालो राज करो" भाग-4)

                बहुत लोगों का यह आरोप होता है कि महाभारत काल में द्रोणाचार्य एकलव्य को केवल इसलिए उन्होंने अपना धनुर्विद्या नहीं सिखाया ताकि अर्जुन का कोई प्रतिद्वंदी खड़ा न हो सके। दूसरा एकलव्य स्वयं शूद्र जाति के थे और आचार्यद्रोण एकलव्य को शूद्र होने के कारण धनुर्विद्या नहीं सिखाए। हालांकि एकलव्य के नाम के पीछे कोई जाति सूचक शब्द नहीं है फिर भी वह शूद्र जाति के थे ऐसा लोग मानते हैं इसका आधार क्या है पता नहीं । तत्कालीन समाज में वर्ण व्यवस्था थी । जाति व्यवस्था उस समय नहीं था                खैर जो भी हो एक संस्कृति जब दूसरी संस्कृति पर हावी होती है तो वह सेंध मारने के लिए जरूर कोई न कोई उपाए ढूंढती है, खोजती है, और किसी भी प्रकार से वह चाहती है कि हम उस पर हावी हो जाए इसके लिए वह तरह-तरह का उपाय ढूंढते है।               अब आइए उस समय के तत्कालीन परिस्थिति को वर्तमान से घटाकर देखते हैं कि आचार्यद्रोण कितने दोषी थे। कृपाचार्य हस्तिनापुर के कुल गुरु थे और उनकी बहन का विवाह द...

लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy (भाग-14)

                                                                -:ओ३म्:-                                                     लोकतंत्र में राजतंत्र ( भाग 14 )             आचार्य से प्राप्त ज्ञान को अपने व्यवहारिक जीवन में, समाज में, सभ्यता संस्कृति में, परंपराओं में, सामाजिक पद्धतियों में, लोकगीतों में, कविताओं में, कथाओं में, धार्मिक मान्यताओं में प्रवेश कराने का कार्य पुरोहित का होता है । आचार्य के बाद पुरोहित का ही समाज के प्रत्येक घरों के आंगन तक उनका पैठ होता है । पुरोहित वह है जो बिन बताए समाज के हित एवं राष्ट्र के कल्याण में अपनी पूर्णाहुति देने के लिए हमेशा तत्पर रहते है ।                     आर्थिक, प्राकृतिक, ...

लोकतंत्र में राजतंत्र भाग-17 (फूट डालो राज करो भाग-1)

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                                                                                   बिल्कुल सीधी, सरल   और  आसान सी  बात है  अगर  आप   किसी  समुदाय  विशेष को   लूटना  चाहते हैं  तो  उसका  सबसे सरल और  आसान  तरीका  यह है कि उस  समुदाय  के  बीच  आपस में  किसी  विवाद  या  किसी अन्य  तरीके से उन्हें लड़ा दे फिर आप उन्हें बहुत आसानी से लूट सकते हैं ।  जब रानी का सरकार 1857 के बाद भारत में बना तब वे ये जानना चाहते थे कि वह कौन सा ऐसा तरीका है जिसके माध्यम से हम भारतीय समान्य- जन को आपस में लड़ा कर उन्हें लूट सकते हैं ।                हालांकि इसके पूर्व ब्रिटेन भारत के विभिन्न अलग-अलग मुस्लिम एवं ह...

लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy (भाग -3)

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                                                                 -:ओ३म्:-                 लोकतंत्र में राजतंत्र (भाग -3)                    अपने देश भारत को गुलाम बनाना इतना आसान नहीं था । इसलिए अंग्रेजों ने भारत वर्ष को गुलाम बनाने के लिए 500 साल की रणनीति बनाई । प्रथम 100 वर्ष में तो भारतवर्ष की भारतीयता को समझने की कोशिश की । अगले 100 वर्ष में भारतीय राजाओं का मुगल राजाओं से, मुगल राजाओं का भारतीय राजाओं से, आपस में एक दूसरे के बीच लड़ा कर उनको विध्वंस कराया । उसके बाद रॉबर्ट क्लाइव बंगाल का शासक बना तब बहुत तेजी से भारत वर्ष में कंपनी सरकार फैलने लगा और रानी का सरकार सही सलामत चल सके इसके लिए पृष्ठभूमि तैयार की तथा नशाखोरी के गर्त में भारतीय समाज को धकेलना प्रारंभ किया । कंपनी सरकार के बाद 1857 से रानी का सरकार इस देश में बना । रानी...

लोकतंत्र में राजतंत्र भाग -18(फूट डालो राज करो भाग -2)

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            आधुनिकता से प्रभावित आधुनिक सामान्य जन अक्सर यह कहा करती है । कि भारतीय समाज जातियों में बटीं हुई है । जातिगत विवाद हमें मजबूत नहीं होने देते । हम आपस में बिखरे हुए हैं ।यह जातिगत भेदभाव समाप्त होने चाहिए ।              मेरा सवाल यह है कि यह जातिगत भेदभाव किसने उत्पन्न किया ? कौन इसको आश्रय और बल दे रहा है ? किसके बल पर यह टिका हुआ है ? हमें अपने दैनिक जीवन में कब अपने किसी विशेष जाति के होने का महत्व समझ में आता है ? यह जानना अत्यंत आवश्यक है ।             आप बाजार में दूध, दही, घी, मक्खन, लस्सी, सब्जी, कपड़ा आदि किराने का कोई भी सामान, कंस्ट्रक्शन का कोई भी सामान खरीदने जाए या और भी बहुत कुछ, कुछ भी खरीदने जाएं तो आपसे कोई जाति नहीं पूछता । वस्तु का दाम मोलभाव होता है और आप आसानी से खरीद लेते हैं । दुकानदार आपको बेज देते है । आप किसी गैर सरकारी कंपनी में जॉब करने के लिए जाते हैं उस समय भी आपके टैलेंट की परीक्षा ली जाती है । न कि ...

प्रेम ( उपन्यासांश )

                    मकान के बाहर दिये धरने की रस्म के बाद जूही मोतीबाई के घर आई। जूही यौवन के वसन्त में थी। बडी आँखो में चमक। नीचे देखने के समय लम्बी बरौनिया लाज के पावडे से डालने वाली। परन्तु कुछ उदास थी। मोतीबाई ने नौकरानी को पौर में विठला दिया और जूही के साथ एकान्त में बातचीत करने लगी। पूछा, 'आज उदास क्यों हो ? क्या बात है ?" जूही ने उत्तर दिया, 'वे आये हुए है विठूर वाले सरदार।'  मोतीबाई - 'तब तो तुम्हें प्रसन्न होना चाहिये था। देखती हूं बिलकुल उल्टा। मुंह लटका हुआ।" जूही - आज पहली बार ही बात हुई रूखे बोले।'  मोतीबाई - किस प्रसंग पर ।" जूही  - 'उन्होंने अपने निवास स्थान पर बुलवाया। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। मुझे संकोच हुआ। परन्तु हिम्मत करके चली गई। सामने पहुंचने पर मैं शरम से डूबने लगी। मुश्किल से मुस्कराकर हाथ जोड़े और चुपचाप खड़ी हो गई।' मोतीबाई - अभिनय तो बुरा नहीं था?" जूही - अभिनय ही तो नहीं था अभिनय करना चाहा, नहीं कर सकी। मैं अपने को भूल गई। उन्होंने भौंहें सिकोड़ कर कहा क्या सेना में जाकर ऐसी ही खड़ी हो जाती हो...

"आओ हम सब गुलाम बने " भाग-4

​                ब्रिटेन के द्वारा जो अर्थव्यवस्था भारत में लाई गई वह पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है साम्यवादी नहीं । जबकि भारत में जो अर्थव्यवस्था विकसित हुई थी, वह साम्यवाद का पोषण करती है पूंजीवाद का नहीं। इसलिए यहां वस्तुओं का निर्माण साझेदारी द्वारा होता था। व्यापार में प्रतिस्पर्धा नहीं था।            भारत के साम्यवाद में आपके परिश्रम पर आपका पारिश्रमिक तय था पूंजीवाद की तरह परंतु परिश्रम करने का अवसर सबको एक जैसा प्राप्त था। अर्थात आप जिस क्षेत्र में भी चाहे उस क्षेत्र में परिश्रम कर सकते हैं यह आपकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर निर्भर करता था और परिश्रम करने का अवसर आप स्वयं ढूंढ सकते हैं । भारत की अर्थव्यवस्था में कोई बाध्यता नहीं था ।            मतलब स्पष्ट है कि जंगल में रहने वाला एक डाकू परिश्रम करके ऋषित्व को प्राप्त कर एक महाकाव्य लिख सकता है। एक नास्तिक व्यक्ति अपने मंतव्य को दर्शनों के रूप में व्यक्त कर सकता है चार्वाक की तरह । जबकि यूरोप में बड़े-बड़े चिंतकों को जेलों में ठूंस...