संदेश

भारत ।

भारत में व्यापार सब कुछ नहीं है । व्यापार जीवन का मूल उद्देश्य भी नहीं है । भारत में व्यापार केवल इसलिए की जाती है ताकी कुछ एक वस्तु जो हमारे पास नहीं है उसको हम आसपास के निकट के गांव से प्राप्त कर लें ।               पैसा कमाना भारत में ठीक नहीं माना जाता । वैश्य और वैश्या शब्द में केवल एक मात्र का अंतर है । पैसा कमाते समय अगर आपकी नीयत ठीक है तब तो ठीक है अन्यथा अगर नियत डोल गया तो वही वैश्य, वैश्या बन जाता है ।  भारत में लोग वास्तु कमाते हैं । यहां वस्तु विनिमय का प्रचलन है अर्थात एक वस्तु से दूसरी वस्तु कमाई जाती है । फसल धन, गेहूं, मक्का, ज्वार, बाजार, सोना, चांदी, हीरा, मोती, मान-प्रतिष्ठा, इज्जत-सम्मान यह सब कुछ अर्जित करना पैसे कमाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है । इन सबों में भी स्वाभिमान सबसे बड़ा है।  अपने देश भारत में स्वधर्म का पालन, मूंछ का ताव और सर की पगड़ी की लाज बचाकर जीवन जीना सबसे बड़ी बात है ।             भारत में इन चीजों के सामने जीवन का कोई महत्व नहीं है । स्वाभिमान और धर्म के लिए मरन...

क्या बनें, मलिक या नौकर -5 ?

          आगे जाने से पहले अब अतीत में पीछे झांक कर देखते हैं। पश्चिमी इंग्लैंड के एक छोटे से गांव स्टाइक में एक पादरी रिचर्ड क्लाइव के 13 बच्चों में रॉबर्ट क्लाइव सबसे बड़ा था। पढ़ाई में उसका मन नहीं लगा स्वभाव में वह बहुत ही आक्रामक, अड़ियल, लड़ाकू पर मजबूत इरादे वाला इंसान शुरू से ही था। किसी भी तरह आरंभिक पढ़ाई पूरी करके वह ईस्ट इंडिया कंपनी में क्लर्क का नौकरी प्राप्त कर लिया। उसकी नियुक्ति मद्रास प्रेसीडेंसी में हो गई। 19 मार्च 1743 को वह लंदन से चला और जल मार्ग से होते हुए 1 जून 1744 को वह मद्रास पहुंचा। वह लड़ाकू स्वभाव का था फलत: उसे क्लर्क की नौकरी अच्छी नहीं लगी। दो बार वह अपने आप को मारने की कोशिश की परंतु बच गया। वह समझ गया मैं किसी और काम के लिए बना हूं। यही से उसके सोच में पंख लग गए ।           एक अंग्रेज सर थॉमस रो 1615 से 1619 तक जहांगीर के दरबार में रहा उसे सूरत में नि:शुल्क व्यापार करने की अनुमति मिल गई। अंग्रेजों ने चंद्रगिरी के हिंदू राजा से अनुमति लेकर मद्रास में सैंटजॉर्ज क़िला 1652 में बनाया प्रेसिडेंट न...

अगर आप ग़ुलाम बनाना चाहते हैं तो ।

अगर आप किसी समाज को, किसी देश को, किसी राष्ट्र को गुलाम बनाना चाहते हैं, तो सबसे सरल और आसान उपाय यह है कि आप व्यक्ति से व्यक्ति को तोड़ दें। उनके बीच की दूरी को बढ़ा दें । आप ऐसा कुछ करें ताकि उनका नैतिक विकास न हो वरण पतन हो जाए, उनका चरित्रहीन होना भी जरूरी है । हर व्यक्ति महत्वाकांक्षी हो जाए । आप ऐसा कुछ करें ताकि हर व्यक्ति अपने व्यक्तिगत विकास को ही राष्ट्रीय विकास समझें। उसके अंदर अपना कोई आत्मस्वाभिमान न हो। दूसरों के दिए हुए टुकड़ों पर ही पलना उनके लिए आत्म सम्मान होना चाहिए । रिश्ते इतने कमजोर होने चाहिए ताकि बृहद् परिवार तो दूर की बात रही एकल परिवार में भी पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ खुश न रह सकें । आप इस बात का ध्यान रखें उस समाज का हर व्यक्ति अपने आप को मालिक समझे । वह कभी भी किसी की न सुने । शिष्टाचार, संस्कार, विश्वास, ईमानदारी, दिनचर्या आदि इन सभी शब्दों का कोई अर्थ उस समाज में नहीं होना चाहिए जिसे आप ग़ुलाम बनाना चाहते हैं ।              उनको आप नशा के आदि बनाए । हिंसक बना दें, क्रूर, अड़ियल, विश्वासघाती, लालची, कामी, क्रोधी, स्वार्थी, ...

पत्थर

पत्थर हुं साहब  आग उगलता हुं ख़ामोश रह कर भी  चोट करता हुं ।  मत पूछो दर्द मेरा  दुनिया जूता घसीटती है मुझ पर कब्र बनाती है मुझ से ताज हो या किला  महल हो या मक्बरा  मत पूछो आसियाना मेरा  पथिक का पथ हुं मैं राही का राह गिर हुं मैं  अतीत का प्राण हुं मैं  राजा के लिए अर्थ हुं मैं कृषक के लिए व्यर्थ ही मैं  मत पूछो सामर्थ मेरा  शीर्ष हुं मैं दुनिया का पानी को शुद्ध करता हुं हवा को अवरूद्ध करता हुं चट्टान हुं साहब  जो मुझे तोड़ते वही एक दिन पुजते है । मंदिरों में राम हुं मैं घर-घर में श्याम हुं मैं  कालो का काल हूं हर चौराहे पर हलूमान हुं। वैदिक सुप्रभात उत्तम प्रकाश 9416044828

मालिक बने या नौकर-4?

          एक ओर भारत से अवैध रूप से पैसा देश के  बाहर जा रहा है । दूसरी ओर एक बहुत बड़ी  जनसंख्या धन के अभाव में पैसे के किल्लत के कारण आत्महत्या करने के लिए बाध्य है ।             नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2014 में 1,31,666 आत्महत्याएं हो रही है। मतलब 361 प्रतिदिन और घंटे भर में 15 आत्महत्याएं हो रही है । रिपोर्ट के अनुसार आत्महत्याओं के प्रमुख कारण में है पारिवारिक समस्याएं, बीमारी, दिवालियापन या ऋणग्रस्तता, परीक्षा में विफलता विवाह के संबंधित मुद्दे, नशीली दवाओं के सेवन, प्रेम प्रकरण, समाज प्रतिष्ठा में गिरावट, दरिद्रता, बेरोजगारी, संपत्ति विवाद, विवाह से संबन्धित मुद्दे, अज्ञात कारण और अन्य कारण आदि का समावेश है ।            रिपोर्ट के अनुसार 91,820(69.7%) इनका सलाना आय 1 लाख से कम था। 35,405(26.7%) 1-5 लाख के बीच और 785(0.6%) 10 लाख से ऊपर बताया गया है । 70,364(53.5%) शिक्षा 8वीं से कम, 27,002(20.5%) 8व...

आओ हम सब गुलाम बने

 :-ओ३म्:- "आओ हम सब गुलाम बने"                       इस लेख का यह टाइटल मैं बहुत सोच समझ कर रखा हूं । "आओ हम सब गुलाम बने" अर्थात कोई ऐसा मार्ग है जो हमें सहज रुप से गुलामी की ओर ले जा रहा है । पर इस बात की अनुभूति समाज के किसी भी वर्ग को शायद ही हो । कोई ऐसा पथ है जिसके हम सभी पथिक है पर उसके अलावा दूसरा कोई मार्ग भी हमारे पास नहीं है । तो आइए एक बार हम समझने की कोशिश करें ।                    प्राचीन समय में वस्तुओं का विनिमय एक दूसरे के साथ व्यापार के लिए वस्तुओं से ही होता था । उस समय सोने के सिक्के का प्रयोग अशर्फी के रूप में वस्तु विनिमय हेतु होता था । समय के साथ कुछ परिवर्तन हुआ दुनिया के विभिन्न अलग-अलग राष्ट्र अपने कोष में सोना रखकर मुद्राओं को छापना प्रारंभ किया । उन कागज की मुद्राओं पर लिखा गया कि  "मैं धारक को इतना रुपया अदा करने का वचन देता हूं"। मतलब यह है कि जो राष्ट्र जितना मुद्रा छापती है । उतने ही मुद्रे के मूल्य का सोना उसके कोष में रखा हुआ होता है । ...

ब्रह्मचारी

​            घनघोर जंगल था 2 दिन से कुछ भी खाने को नहीं मिला । क्योंकि रास्ते में कहीं भी फलदार वृक्ष नहीं थे । थकान इतना हो गया था कि आगे चल न सका वे ब्रह्मचारी वहीं पेड़ के नीचे सो गए । तीसरे दिन अचानक सामने से दो भालू पास आते हुए नज़र आए अपने बचाव के लिए ब्रह्मचारी ने कोई प्रयत्न नहीं किया मन में विचार आया शायद मैं इनके काम आ जाऊं । दोनों भालू पास आए और सुंघ कर चले गए । कुछ देर बाद उनमें से एक भालू पुनः आया लेकिन उसके मुंह में मधुमक्खी का छत्ता था । वह वही ब्रह्मचारी के पास छत्ता रख चला गया । ब्रह्मचारी ईश्वर को लाख-लाख धन्यवाद देकर भरपेट शहद को खाया और आगे चल दिया ।            दूसरी घटना है । शाम हो गया था धीरे-धीरे रात होने को था आगे कुछ ठीक से दिख नहीं रहा था । अचानक दाहिना पैर गड्ढे में पड़ा और नीचे गड्ढे में गिर गए । दाहिने पैर में बहुत चोट आई चिल्लाने पर व्याध वहां पहुंचे और वे अपने साथ एक कुटिया में लेगए उन्होंने 3 दिन तक ब्रह्मचारी का उपचार किया और खाने को फल दिया । खूब सेवा कि जब स्वस्थ हो गए तो सुलभ रास्ते पर छ...

क्या बने, मालिक या नौकर ? भाग -3

    ब्रिटेन ने भारत से जो लुटा उसकी एक अनुमानित आंकड़ा मुग़ल काल से दादा भाई नौरोजी के समय 1885 तक लगभग 350 लाख पाउंड स्टर्लिंग प्रतिवर्ष बताई गई है। एक आकलन के अनुसार (Colonial Damage in Numbers by Vishal Kale) • मीर जाफर ने 1757 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को 39 लाख पाउण्ड का भुगतान किया। • मीरजाफर के उत्तराधिकारी 23 लाख पाउण्ड प्रतिवर्ष का भुगतान करते रहे। • बंगाल, बिहार और उड़िसा से प्रतिवर्ष 1932900 पाउण्ड ले जाया गया। • 1793 से बंगाल का वार्षिक राजस्व 26.8 लाख पाउण्ड । • उपनिवेशी शासन बढ़ने के साथ-साथ अकालों का प्रकोप बढ़ा • इलाहाबाद से प्रतिवर्ष राजस्व 1682306 पाउण्ड (1800 के आसपास) • मराठा क्षेत्रों से प्रतिवर्ष राजस्व 1,500,000 पाउण्ड (1800 के आसपास) • 1857 में भारत पर कर्ज 51000,000 पाउण्ड • 1862 में भारत पर कर्ज 97,000,000 पाउण्ड • 1901 में भारत पर कर्ज 200,000,000 पाउण्ड • 440 लाख पाउण्ड वार्षिक भारत से इग्लैण्ड को। इस आँकड़े को 150 से गुणा किया जाय तो करीब 6.6 अरब पाउण्ड । अब पुनः इस आँकड़े पर 8% चक्रवृद्धि ब्याज किया जाय तो यह हो जायेगा 370 खरब पाउण्ड-य...

क्या बने, मालिक या नौकर ? भाग - 2

             अब तो ऐसा है कि मालिक बनने के लिए कुछ भी जायज़ है । दुनिया का सारा कुकर्म ठीक है बस किसी तरह पद मिल जाए। मालिक बन जाऊं । वोट खरीदना पड़े या समान बांटना पड़े। शराब से मिले या मांस से, अगर नाच करवाया पड़े तो वो भी ठीक है । किसी भी धर्म का चादर क्यों न ओढ़ना पड़े सब ठीक है । झूठी दीलाशा और तुष्टीकरण तो आम बात है । दंगे हो रहा हो तो होने दें। नशाखोरी, फ़रेबी, व्याविचार भी चलेगा। चुनाव के लिए पैसा चाहिए कहीं से भी मिले सब ठीक है । चाहे वो पुर्व से आए या पश्चिम से, शराब बेच कर आए या ड्रक्स से, किसी भी तरह से बस आना चाहिए मुझे मेरा कुर्सी चाहिए ।   केवल इस लिए क्योंकि मुझे मालिक बनना है। चुनाव में अगर पैसा कम पड़ा तो कोई बात नहीं ज़मीन बेच दो, गाड़ी बेच दो, नौकरी को दांव पर लगाना पड़े तो लगा दो क्योंकि पुरा गांव मेरे साथ है । वैसे भी जीतने पर पुरा वसूल लुंगा बस एक बार मौका तो मिले । मालिक बनने के चक्कर में कई लोग बर्बाद हो गए । ज़मीन गया, घर गया कर्ज ऊपर से। इनमें से किसी को भी देश धर्म से कोई मतलब नहीं है । मतलब है तो केवल व्यक्तिगत स्...

क्या बनें मालिक या नौकर ?

               क्या बने मलिक या नौकर ? कुछ लोगों का यह मंतव्य है कि बनना ही है तो मालिक बने नौकर क्यों ? यह विचार पश्चिम से आया है बाहरी सभ्यता-संस्कृति के लोग जब भारत वर्ष में आए तो यह विचारधारा साथ में लेकर आए थे । उन्होंने कहा कि बनना ही है तो मालिक बनो नौकर क्यों ? जबकि भारतीय सभ्यता-संस्कृति को अगर हम समझने की कोशिश करें तो ये हमें पता लगेगा कि यहां सब सेवक बनना चाहते हैं मालिक नहीं । राजा हरिश्चंद्र पलभर में सेवक बन गए । मुर्दा हट्टी में मुर्दा जलाने लगे । शाम को कहा गया कि कल सुबह राज्याभिषेक होगा । पर सुबह होते ही पता चला वनवास जाना है बेहिचक चल पड़े पुरे 14 साल के लिए । सेवक बने वनवासियों के लिए। जिन्हें राज गद्दी मिला उन्होंने कहा मैं तो उनका दास हुं, मैं स्वामी कैसे बन सकता हुं ? मैं तो सेवक हुं उनका ‌। वे नहीं तो उनका चरण पादुका ही सही, मैं उसी कि सेवा करूंगा । मेरे स्वामी वन में रहे और मैं महल में यह कैसे संभव है ? चाहते तो लंका का राजा बन सकते थे या किसी एक भाई को बना भी सकते थे परन्तु भाव तो सेवा वाली थी । राजा को मोह होता है...