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लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy (भाग-14)

                                                                -:ओ३म्:-                                                     लोकतंत्र में राजतंत्र ( भाग 14 )             आचार्य से प्राप्त ज्ञान को अपने व्यवहारिक जीवन में, समाज में, सभ्यता संस्कृति में, परंपराओं में, सामाजिक पद्धतियों में, लोकगीतों में, कविताओं में, कथाओं में, धार्मिक मान्यताओं में प्रवेश कराने का कार्य पुरोहित का होता है । आचार्य के बाद पुरोहित का ही समाज के प्रत्येक घरों के आंगन तक उनका पैठ होता है । पुरोहित वह है जो बिन बताए समाज के हित एवं राष्ट्र के कल्याण में अपनी पूर्णाहुति देने के लिए हमेशा तत्पर रहते है ।                     आर्थिक, प्राकृतिक, ...

लोकतंत्र में राजतंत्र भाग-17 (फूट डालो राज करो भाग-1)

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                                                                                   बिल्कुल सीधी, सरल   और  आसान सी  बात है  अगर  आप   किसी  समुदाय  विशेष को   लूटना  चाहते हैं  तो  उसका  सबसे सरल और  आसान  तरीका  यह है कि उस  समुदाय  के  बीच  आपस में  किसी  विवाद  या  किसी अन्य  तरीके से उन्हें लड़ा दे फिर आप उन्हें बहुत आसानी से लूट सकते हैं ।  जब रानी का सरकार 1857 के बाद भारत में बना तब वे ये जानना चाहते थे कि वह कौन सा ऐसा तरीका है जिसके माध्यम से हम भारतीय समान्य- जन को आपस में लड़ा कर उन्हें लूट सकते हैं ।                हालांकि इसके पूर्व ब्रिटेन भारत के विभिन्न अलग-अलग मुस्लिम एवं ह...

लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy (भाग -3)

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                                                                 -:ओ३म्:-                 लोकतंत्र में राजतंत्र (भाग -3)                    अपने देश भारत को गुलाम बनाना इतना आसान नहीं था । इसलिए अंग्रेजों ने भारत वर्ष को गुलाम बनाने के लिए 500 साल की रणनीति बनाई । प्रथम 100 वर्ष में तो भारतवर्ष की भारतीयता को समझने की कोशिश की । अगले 100 वर्ष में भारतीय राजाओं का मुगल राजाओं से, मुगल राजाओं का भारतीय राजाओं से, आपस में एक दूसरे के बीच लड़ा कर उनको विध्वंस कराया । उसके बाद रॉबर्ट क्लाइव बंगाल का शासक बना तब बहुत तेजी से भारत वर्ष में कंपनी सरकार फैलने लगा और रानी का सरकार सही सलामत चल सके इसके लिए पृष्ठभूमि तैयार की तथा नशाखोरी के गर्त में भारतीय समाज को धकेलना प्रारंभ किया । कंपनी सरकार के बाद 1857 से रानी का सरकार इस देश में बना । रानी...

लोकतंत्र में राजतंत्र भाग -18(फूट डालो राज करो भाग -2)

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            आधुनिकता से प्रभावित आधुनिक सामान्य जन अक्सर यह कहा करती है । कि भारतीय समाज जातियों में बटीं हुई है । जातिगत विवाद हमें मजबूत नहीं होने देते । हम आपस में बिखरे हुए हैं ।यह जातिगत भेदभाव समाप्त होने चाहिए ।              मेरा सवाल यह है कि यह जातिगत भेदभाव किसने उत्पन्न किया ? कौन इसको आश्रय और बल दे रहा है ? किसके बल पर यह टिका हुआ है ? हमें अपने दैनिक जीवन में कब अपने किसी विशेष जाति के होने का महत्व समझ में आता है ? यह जानना अत्यंत आवश्यक है ।             आप बाजार में दूध, दही, घी, मक्खन, लस्सी, सब्जी, कपड़ा आदि किराने का कोई भी सामान, कंस्ट्रक्शन का कोई भी सामान खरीदने जाए या और भी बहुत कुछ, कुछ भी खरीदने जाएं तो आपसे कोई जाति नहीं पूछता । वस्तु का दाम मोलभाव होता है और आप आसानी से खरीद लेते हैं । दुकानदार आपको बेज देते है । आप किसी गैर सरकारी कंपनी में जॉब करने के लिए जाते हैं उस समय भी आपके टैलेंट की परीक्षा ली जाती है । न कि ...

प्रेम ( उपन्यासांश )

                    मकान के बाहर दिये धरने की रस्म के बाद जूही मोतीबाई के घर आई। जूही यौवन के वसन्त में थी। बडी आँखो में चमक। नीचे देखने के समय लम्बी बरौनिया लाज के पावडे से डालने वाली। परन्तु कुछ उदास थी। मोतीबाई ने नौकरानी को पौर में विठला दिया और जूही के साथ एकान्त में बातचीत करने लगी। पूछा, 'आज उदास क्यों हो ? क्या बात है ?" जूही ने उत्तर दिया, 'वे आये हुए है विठूर वाले सरदार।'  मोतीबाई - 'तब तो तुम्हें प्रसन्न होना चाहिये था। देखती हूं बिलकुल उल्टा। मुंह लटका हुआ।" जूही - आज पहली बार ही बात हुई रूखे बोले।'  मोतीबाई - किस प्रसंग पर ।" जूही  - 'उन्होंने अपने निवास स्थान पर बुलवाया। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। मुझे संकोच हुआ। परन्तु हिम्मत करके चली गई। सामने पहुंचने पर मैं शरम से डूबने लगी। मुश्किल से मुस्कराकर हाथ जोड़े और चुपचाप खड़ी हो गई।' मोतीबाई - अभिनय तो बुरा नहीं था?" जूही - अभिनय ही तो नहीं था अभिनय करना चाहा, नहीं कर सकी। मैं अपने को भूल गई। उन्होंने भौंहें सिकोड़ कर कहा क्या सेना में जाकर ऐसी ही खड़ी हो जाती हो...

"आओ हम सब गुलाम बने " भाग-4

​                ब्रिटेन के द्वारा जो अर्थव्यवस्था भारत में लाई गई वह पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है साम्यवादी नहीं । जबकि भारत में जो अर्थव्यवस्था विकसित हुई थी, वह साम्यवाद का पोषण करती है पूंजीवाद का नहीं। इसलिए यहां वस्तुओं का निर्माण साझेदारी द्वारा होता था। व्यापार में प्रतिस्पर्धा नहीं था।            भारत के साम्यवाद में आपके परिश्रम पर आपका पारिश्रमिक तय था पूंजीवाद की तरह परंतु परिश्रम करने का अवसर सबको एक जैसा प्राप्त था। अर्थात आप जिस क्षेत्र में भी चाहे उस क्षेत्र में परिश्रम कर सकते हैं यह आपकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर निर्भर करता था और परिश्रम करने का अवसर आप स्वयं ढूंढ सकते हैं । भारत की अर्थव्यवस्था में कोई बाध्यता नहीं था ।            मतलब स्पष्ट है कि जंगल में रहने वाला एक डाकू परिश्रम करके ऋषित्व को प्राप्त कर एक महाकाव्य लिख सकता है। एक नास्तिक व्यक्ति अपने मंतव्य को दर्शनों के रूप में व्यक्त कर सकता है चार्वाक की तरह । जबकि यूरोप में बड़े-बड़े चिंतकों को जेलों में ठूंस...

"आओ हम सब गुलाम बने" भाग-3

​                पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को बल देने के लिए बैंकों का निर्माण हो चुका था। अब इन बैंकों में पूजी का एकीकरण होने लगा। पूजी का प्रयोग कहां हो इसके लिए औद्योगिक क्रांति शुरू हुआ। औद्योगिक क्रांति के लिए पूंजी निवेश अनिवार्य है इस पूंजी निवेश के लिए पूजी प्राप्त हो सके इसलिए बैंकों को लाया गया भारत शुरू से ही उद्योग प्रधान देश रहा है। भारत का उद्योग पशुओं और मनुष्यों पर आधारित था लेकिन अब मशीनी कल कारखानों का प्रयोग करना था इसलिए पूजी चाहिए थी और भारत की मनुष्यों और पशुओं पर आधारित उद्योगों को बंद करना था इसलिए भारत में प्रचार किया गया कि भारत कृषि प्रधान देश है भारत में कृषि व्यवहारिक जीवन पद्धति है लोगों को इससे बाहर निकालकर उद्योगों में लगाना था इसलिए भारत को कृषि प्रधान देश कहना जरूरी था ताकि लोग धीरे-धीरे उद्योगों की ओर अग्रसर हो और ब्रिटेन से लाई गई उद्योग भारत में फल फूल सके। उद्योगों को संचालित करने के लिए जमीन की जरूरत थी इसलिए रानी का सरकार बनने के बाद, भारत में भूमि अधिग्रहण कानून बनाया गया। इंडियन फॉरेस्ट एक्ट, जंगल ...

आओ हम सब गुलाम बने भाग -2

​                बाहुबल का प्रयोग करके आप गुलाम बना सकते हैं परंतु वे मजबूत होकर अपनी स्वतंत्रता को पुनः प्राप्त कर सकते है। आप बहुत लंबे समय तक किसी को गुलाम नहीं बना सकते परंतु अगर सदा के लिए आप उन्हें गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं तो इसका सबसे सरल और आसान तरीका है । उनके व्यापार के केंद्र में प्रयोग किए जाने वाले विनिमय के संसाधन को ही अपने अधिकार में कर लें । ताकि उसका संपूर्ण व्यापारिक तंत्र आपके अधीन हो जाए । उसके व्यापार में प्रयोग किए जाने वाले संसाधन आपके द्वारा उत्पादित की जाए और आपसे लेकर वह अपना व्यापार चलाएं । अगर यह आपने कर लिया तो समझ लीजिए सदा सदा के लिए वें आपके गुलाम हो ही जाएंगे ।              अपने देश भारत में वस्तु विनिमय हेतु   सोने - चांदी के सिक्के का प्रयोग लंबे समय तक होता रहा । उन सोने - चांदी के सिक्के अलग-अलग रियासतों का अपना-अपना अलग-अलग होता था  जिसके मूल्य भी आपस में भिन्न होते थे।               चुकी देश को गुलाम बनाना था इसल...

लोकतंत्र में राजतंत्र Monarchy in democracy(भाग-1)

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  -:ओ३म्:-                           लोकतंत्र में राजतंत्र ( भाग-1 ) Monarchy in democracy                                 "जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन" लोकतंत्र की एक नई परिभाषा गढ़ी गई । एक के बाद एक विभिन्न अलग-अलग देशों पर ब्रिटेन ने अपना साम्राज्य धीरे-धीरे स्थापित करता गया । जब उन सभी देशों में क्रांति की लहर जगीे । उन्होंने स्वतंत्र होना चाहा तब ब्रिटेन, लोकतंत्र का हवाला देकर वहां के राजतंत्र को समाप्त किया और उन सभी देशों में धीरे-धीरे लोकतंत्र स्थापित किया ।  लोकतंत्र लाने के लिए राजतंत्र की अनेकों बुराइयां आम जनता के सामने परोसी गई । दूसरी ओर जनता खुद मालिक होना चाहती थी परिणाम यह हुआ क्रांतिकारी विचारधारा के लोग लोकतंत्र में नेता बनकर उभरे हालांकि वें सभी नेता अंग्रेजों द्वारा चलाए गए शिक्षा तंत्र से ही पढ़ कर निकले थे । अब आप सोच सकते हैं कि अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था से निकले हुए लोग देश को किस द...

शतरंज , Chess

स्वामी जी के दर्शन के लिए एक दिन केदारनाथ खत्री, गुरुसहायमल के साथ पाठशाला में पहुंचे।  स्वामी जी भांप गये, गुरुसहायमल से बोले इन्हें कह दो यहां शतरंज नहीं है ।           उत्साह से खत्री जी, मैं अभी लिये आता हुं। अब स्वामी जी क्या करते ? खत्री जी शतरंज लाए ।  स्वामी जी ने आठ प्रकार के भिन्न-भिन्न शतरंजों के विषय में बताया।           फिर नयनसुख ( एक नगर वासी रत्नाकार  जो स्वामी जी मिलने आता रहता था ) को निर्देश दिए - नयनसुख देखो तुम दो काम करना , जो मोहर मैं कहूं वह चलना और लाला (खत्री जी ) जो मोहर चलें वह मुझे बता देना।  नयनसुख - हां जी   स्वामी जी - अब बादशाह का प्यादा चलो।  नयनसुख, चल दिया, महाराज ।  स्वामी जी, लाला क्या चले हैं ?  नयनसुख, वह भी बादशाह का प्यादा ही चले हैं।                     इस प्रकार नयनसुख स्वामी जी के आदेशानुसार उनके मोहरे चलाते रहे। कुछ समय पश्चात् खेल समाप्ति पर था।  स्वामी जी ने कहा अब तक हम द...